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भारतवर्ष की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली – भाग २

भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति की बहुत लंबी परंपरा रही है। गुरुकुल में विद्यार्थी विद्या अर्जित करते थे। तपोस्थली में सभा, सम्मेलन एवं प्रवचन होते थे जबकि परिषद् में विशेषज्ञों द्वारा शिक्षा दी जाती थी। प्राचीनकाल में धौम्य, च्यवन ऋषि, द्रोणाचार्य, सांदीपनि(उज्जैन), वशिष्ठ, विश्वामित्र, वाल्मीकि, गौतम, भारद्वाज आदि ऋषियों के आश्रम प्रसिद्ध थे। बौद्धकाल में बुद्ध, महावीर व शंकराचार्य की परंपरा से जुड़े गुरुकुल जगप्रसिद्ध थे, जहां विश्वभर से मुमुक्षु ज्ञान प्राप्त करने आते थे तथा जहां गणित, ज्योतिष, खगोल, विज्ञान, भौतिक आदि सभी तरह की शिक्षा दी जाती थी।

कई बार कहाँ जाता है कि भारत में विज्ञान पर इतना शोध किस प्रकार होता था ? इसके मूल में है भारतीयों की जिज्ञासा एवं तार्किक क्षमता, जो अतिप्राचीन उत्कृष्ट शिक्षा तंत्र एवं अध्यात्मिक मूल्यों की देन है। “गुरुकुल” प्रणाली के विषय में बहुत से विदेशी व वामपंथियों को यह भ्रम है की वहाँ केवल संस्कृत की शिक्षा दी जाती थी जो कि यह उनकी अधूरी जानकारी है।

भारत में विज्ञान की २० से अधिक शाखाएं रही हैं जो कि बहुत पुष्पित पल्लवित रही हैं जिसमें प्रमुख १. खगोल शास्त्र २. नक्षत्र शास्त्र ३. बर्फ़ बनाने का विज्ञान ४. धातु शास्त्र ५. रसायन शास्त्र ६. स्थापत्य शास्त्र ७. वनस्पति विज्ञान ८. नौका शास्त्र ९. यंत्र विज्ञान आदि इसके अतिरिक्त शौर्य (युद्ध) शिक्षा आदि कलाएँ भी प्रचुरता में रही हैं। संस्कृत भाषा मुख्यतः माध्यम के रूप में, उपनिषद एवं वेद छात्रों में उच्चचरित्र एवं संस्कार निर्माण हेतु पढ़ाई जाते थे।

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भारतवर्ष की प्राचीन गुरुकुल प्रणाली

थोमस मुनरो सन १८१३ के आसपास मद्रास प्रांत के राज्यपाल थे, उन्होंने अपने कार्य विवरण में लिखा है कि मद्रास प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण आंद्रप्रदेश, पूर्ण तमिलनाडु, पूर्ण केरल एवं कर्णाटक का कुछ भाग ) में ४०० लोगों पर न्यूनतम एक गुरुकुल है। उत्तर भारत (अर्थात आज का पूर्ण पाकिस्तान, पूर्ण पंजाब, पूर्ण हरियाणा, पूर्ण जम्मू कश्मीर, पूर्ण हिमाचल प्रदेश, पूर्ण उत्तर प्रदेश, पूर्ण उत्तराखंड) के सर्वेक्षण के आधार पर जी.डब्लू.लिटनेर ने सन १८२२ में लिखा है, उत्तर भारत में २०० लोगों पर न्यूनतम एक गुरुकुल है।

माना जाता है कि मैक्स मूलर ने भारत की शिक्षा व्यवस्था पर सबसे अधिक शोध किया है, वे लिखते हैं कि “भारत के बंगाल प्रांत (अर्थात आज का पूर्ण बिहार, आधा उड़ीसा, पूर्ण पश्चिम बंगाल, आसाम एवं उसके ऊपर के सात प्रदेश) में ८० सहस्त्र (हज़ार) से अधिक गुरुकुल हैं जो कि कई सहस्त्र वर्षों से निर्बाधित रूप से चल रहे है”।

उत्तर भारत एवं दक्षिण भारत के आंकड़ों के कुल पर औसत निकालने से यह ज्ञात होता है कि भारत में १८वीं शताब्दी तक ३०० व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल था। एक और वास्तविक तथ्य यह है कि १८वीं शताब्दी में भारत की जनसंख्या लगभग २० करोड़ थी, ३०० व्यक्तियों पर न्यूनतम एक गुरुकुल के अनुसार भारत में ७ लाख ३२ सहस्त्र गुरुकुल होने चाहिए।

अब रोचक बात यह भी है कि अंग्रेज प्रत्येक दस वर्ष में भारत में भारत का सर्वेक्षण करवाते थे उसी के अनुसार १८२२ के लगभग भारत में कुल गांवों की संख्या भी लगभग ७ लाख ३२ सहस्त्र थी, अर्थात प्रत्येक गाँव में एक गुरुकुल। १६ से १७ वर्ष भारत में प्रवास करने वाले शिक्षाशास्त्री लुडलो ने भी १८वीं शताब्दी में यहीं लिखा कि “भारत में एक भी गाँव ऐसा नहीं जिसमें गुरुकुल नहीं एवं एक भी बालक ऐसा नहीं जो गुरुकुल जाता नहीं”।

रामधारी सिंह दिनकर की पुस्तक, “संस्कृति के चार अध्याय” के पृष्ठ ३६२ में अंग्रेजों के आने से पहले की शिक्षा पद्धति पर लिखा कि “तत्कालीन संस्कृत-विद्यालय आज की तरह सुसंगठित तो नहीं थे, किन्तु उनकी संख्या काफी अच्छी थी और प्राथमिक पाठशालाओं की संख्या तो बहुत अधिक थी। जिनमें पढ़-लिखकर लोग व्यवहारिक काम-काज में लग जाते थे।

इनके अतिरिक्त उच्च विद्यालय भी थे, जिनका उद्देश्य न्याय, व्याकरण, दर्शन, साहित्य और ज्योतिष तथा आयुर्वेद की उच्च शिक्षा देना था। तत्कालीन शैक्षणिक स्थिति पर ऐडम की जो रिपोर्ट निकली थी, उसमें कहा गया था कि बंगाल-बिहार में हर चार सौ व्यक्तियों पर एक स्कूल था। सन् १८२१ ई. में मद्रास के गवर्नर सर टामस मनरो ने जो जाँच करवाई थी, उससे यह पता चलता था कि मद्रास की सवा करोड़ जनसंख्या में से कोई दो लाख लोग विद्यालयों में पढ़ रहे थे। श्री एम. आर. परांजपे ने लिखा है कि उस समय मद्रास के प्रत्येक गाँव में एक स्कूल था।”

वहीं महर्षि दयानंद सरस्वती ने भी अपनी पुस्तक “सत्यार्थप्रकाश” के तृतीयसमुल्लास में भारत की गुरूकुल शिक्षा पद्धति पर विस्तार से प्रकाश डाला है। जिसमें बालक-बालिका के लिए शिक्षा की अनिवार्यता व उसकी विभिन्न पद्धतियाँ बताई है। गुरूकुल जिन्हें पाठशाला अपनी पुस्तक में कहा है, उसके विषय में यहां तक बताया है कि पाठशालाएं गाँव से कितनी दूर होना चाहिए तथा बालक-बालिकाओं की पाठशालाओं में कितनी दूरी होनी चाहिए। साथ ही वेद, स्मृति, उपनिषद, विभिन्न शास्त्रों के माध्यम से प्राचीन गुरूकुल शिक्षा प्रणाली पर सहप्रमाण प्रकाश डाला है।

राजा की सहायता के अपितु, समाज से पोषित इन्ही गुरुकुलों के कारण १८वीं शताब्दी तक भारत में साक्षरता ९७% थी, बालक के ५ वर्ष, ५ माह, ५ दिवस के होते ही उसका गुरुकुल में प्रवेश हो जाता था। प्रतिदिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक विद्यार्जन का क्रम १४ वर्ष तक चलता था। जब कोई बालक सभी वर्गों के बालकों के साथ नि:शुल्कः २० से अधिक विषयों का अध्ययन कर गुरुकुल से निकलता था तब आत्मनिर्भर, देश एवं समाज सेवा हेतु सक्षम हो जाता था।

इसके उपरांत विशेषज्ञता (पांडित्य) प्राप्त करने हेतु भारत में विभिन्न विषयों वाले जैसे शल्य चिकित्सा, आयुर्वेद, धातु कर्म आदि के विश्वविद्यालय थे, नालंदा एवं तक्षशिला तो २००० वर्ष पूर्व के हैं परंतु मात्र १५०-१७० वर्ष पूर्व भी भारत में ५००-५२५ के लगभग विश्वविद्यालय थे। थोमस बेबिगटन मैकोले (टी.बी.मैकोले) जब सन १८३४ में भारत आये तो कई वर्षों भारत में यात्राएँ एवं सर्वेक्षण करने के उपरांत समझ गए कि अंग्रेजों से पहले के आक्रांताओं अर्थात यवनों, मुगलों आदि ने भारत के राजाओं, संपदाओं एवं धर्म का नाश करने की जो भूल की है, उससे पुण्यभूमि भारत को कदापि पददलित नहीं किया जा सकेगा, अपितु संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता का संहार करें तो इन्हें पराधीन करने का हेतु सिद्ध हो सकता है।

इसी कारण “इंडियन एज्यूकेशन एक्ट” बना कर समस्त गुरुकुल बंद करवाए गए। हमारे शासन एवं शिक्षा तंत्र को इसी लक्ष्य से निर्मित किया गया ताकि नकारात्मक विचार, हीनता की भावना, जो विदेशी है वह अच्छा, बिना तर्क किये रटने के बीज आदि बचपन से ही बाल मन में घर कर ले और अंग्रेजों को प्रतिव्यक्ति संस्कृति, शिक्षा एवं सभ्यता के पतन का परिश्रम न करना पड़े।

साभार- https://www.indictoday.com/bharatiya-languages/hindi/ से

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