मनुष्य सदियों से एक बुनियादी प्रश्न पूछता आया है—मैं कौन हूँ? मेरे भीतर विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ और अनुभव कैसे उत्पन्न होते हैं? और सबसे महत्त्वपूर्ण बात, मुझे अपने अस्तित्व का एहसास क्यों होता है?

हम जानते हैं कि हमारा मस्तिष्क देखने, सुनने, सोचने, याद रखने और निर्णय लेने जैसी अनेक प्रक्रियाओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लेकिन एक प्रश्न अब भी वैज्ञानिकों और दार्शनिकों को चुनौती देता है: मस्तिष्क की भौतिक गतिविधियों के साथ अनुभव करने का एहसास कैसे जुड़ा है?

जब हम लाल रंग देखते हैं, संगीत सुनते हैं, दर्द महसूस करते हैं या अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक होते हैं, तब केवल सूचना का प्रसंस्करण नहीं हो रहा होता; हमारे लिए कुछ अनुभव भी हो रहा होता है। चेतना का अध्ययन इसी अनुभवात्मक पक्ष को समझने का प्रयास है।

भारतीय दर्शन, विशेषकर अद्वैत वेदांत, चेतना को वास्तविकता के मूल आधार के रूप में देखता है। दूसरी ओर, आधुनिक न्यूरोसाइंस चेतन अनुभव और मस्तिष्क की गतिविधियों के बीच संबंधों की प्रयोगात्मक जाँच करता है।

क्या ये दोनों दृष्टिकोण एक-दूसरे के विरोधी हैं? क्या आधुनिक विज्ञान ने भारतीय दर्शन की चेतना-संबंधी धारणाओं को प्रमाणित कर दिया है? या चेतना का रहस्य अभी भी हमारी समझ से परे है?

इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए हमें दर्शन, वैज्ञानिक शोध और प्रमाणों की सीमाओं को अलग-अलग समझना होगा।

1. भारतीय दर्शन में चेतना और आत्मा की अवधारणा

भारतीय दर्शन में चेतना को लेकर एक ही विचार नहीं मिलता। विभिन्न दार्शनिक परंपराओं ने आत्मा, मन, अनुभव और वास्तविकता के विषय में अलग-अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किए हैं।

अद्वैत वेदांत: चेतना ही मूल वास्तविकता है

अद्वैत वेदांत के अनुसार, विशेषकर आदि शंकराचार्य की परंपरा में, आत्मन् का अंतिम स्वरूप ब्रह्म से अभिन्न है। ब्रह्म को परम वास्तविकता और आत्मन् को व्यक्ति का मूल स्वरूप माना जाता है।

इस दृष्टिकोण को समझने के लिए मनुष्य के अनुभवों पर विचार कीजिए। हमारे विचार बदलते रहते हैं, भावनाएँ बदलती हैं, शरीर बदलता है और स्मृतियाँ भी समय के साथ बदल सकती हैं। अद्वैत वेदांत पूछता है कि इन सभी परिवर्तनों को जानने वाला कौन है।

इस प्रश्न के उत्तर में वह शुद्ध चेतना या साक्षी-चेतना की अवधारणा प्रस्तुत करता है। इस विचार के अनुसार, चेतना को केवल विचारों, भावनाओं या मानसिक गतिविधियों के समान नहीं माना जा सकता।

अद्वैत का दावा इससे आगे जाता है: चेतना केवल किसी व्यक्ति के मस्तिष्क में घटने वाली घटना नहीं, बल्कि अंतिम वास्तविकता का आधार है।

यह एक दार्शनिक और आध्यात्मिक दावा है। इसे भारतीय दर्शन के भीतर तर्क, अनुभव और आध्यात्मिक साधना के आधार पर विकसित किया गया है, लेकिन इसे आधुनिक विज्ञान द्वारा स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।

स्रोत:

सांख्य दर्शन: पुरुष और प्रकृति

सांख्य दर्शन चेतना और मानसिक-भौतिक प्रक्रियाओं के बीच अंतर करता है। इसमें पुरुष को चेतन साक्षी और प्रकृति को मन, बुद्धि, इंद्रियों तथा भौतिक जगत सहित परिवर्तनशील तत्त्वों का आधार माना जाता है।

इस दृष्टिकोण में चेतना और मन एक ही चीज नहीं हैं। मन में विचार उत्पन्न होते हैं, लेकिन पुरुष को इन परिवर्तनों का साक्षी माना जाता है।

यह विचार अद्वैत वेदांत से मिलता-जुलता दिखाई दे सकता है, लेकिन दोनों की दार्शनिक व्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं।

स्रोत: Internet Encyclopedia of Philosophy, Samkhya: https://iep.utm.edu/sankhya/

बौद्ध दर्शन: क्या स्थायी आत्मा आवश्यक है?

बौद्ध दर्शन की अनेक परंपराएँ किसी स्थायी, अपरिवर्तनीय आत्मा को स्वीकार नहीं करतीं। वे अनुभव, विचार और चेतना को कारणों तथा परिस्थितियों पर निर्भर परिवर्तनशील प्रक्रियाओं के रूप में समझती हैं।

इस दृष्टिकोण में भी चेतना पर गहन विचार किया गया है, लेकिन निष्कर्ष अद्वैत से अलग हैं।

इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि पूरा भारतीय दर्शन चेतना को शरीर से स्वतंत्र आत्मा मानता है। भारतीय दर्शन के भीतर इस प्रश्न पर विविध मत हैं।

स्रोत: Stanford Encyclopedia of Philosophy, Buddha: https://plato.stanford.edu/entries/buddha/

2. आधुनिक न्यूरोसाइंस चेतना के बारे में क्या बताता है?

आधुनिक विज्ञान चेतना का अध्ययन मुख्यतः मस्तिष्क, शरीर, व्यवहार और व्यक्ति के अनुभवों के बीच संबंधों की जाँच करके करता है।

इसके लिए वैज्ञानिक EEG, fMRI, MEG और अन्य तकनीकों का उपयोग करते हैं। इनसे मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि, रक्त प्रवाह से जुड़े संकेत और विभिन्न मस्तिष्कीय क्षेत्रों के बीच समन्वय का अध्ययन किया जा सकता है।

इन शोधों से कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं।

पहला, जागने, सोने, एनेस्थीसिया और चेतना के विकारों के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियों में व्यवस्थित बदलाव देखे जाते हैं।

दूसरा, मस्तिष्क की कुछ चोटों से व्यक्ति की स्मृति, आत्म-पहचान, ध्यान और जागरूकता प्रभावित हो सकती है।

तीसरा, सामान्य मानवीय चेतना का अनुभव मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से गहराई से जुड़ा हुआ है।

लेकिन इन निष्कर्षों के बावजूद चेतना का पूरा रहस्य नहीं सुलझा है। वैज्ञानिक अभी भी इस बात पर शोध कर रहे हैं कि मस्तिष्क की भौतिक गतिविधियों के साथ व्यक्तिपरक अनुभव का संबंध किस प्रकार समझा जाए।

स्रोत: Stanford Encyclopedia of Philosophy, The Neuroscience of Consciousness:
https://plato.stanford.edu/archives/sum2024/entries/consciousness-neuroscience/

3. चेतना के प्रमुख वैज्ञानिक सिद्धांत

चेतना को समझाने के लिए कई सिद्धांत प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें दो प्रमुख सिद्धांत हैं।

ग्लोबल न्यूरोनल वर्कस्पेस थ्योरी

इस सिद्धांत के अनुसार, जब किसी सूचना को मस्तिष्क के अनेक क्षेत्रों में व्यापक रूप से उपलब्ध कराया जाता है, तब वह सचेत अनुभव और रिपोर्ट का हिस्सा बन सकती है।

उदाहरण के लिए, किसी दृश्य को देखने के बाद उसकी पहचान करना, उसके बारे में निर्णय लेना और उसे याद रखना कई मस्तिष्कीय प्रक्रियाओं के समन्वय से जुड़ा होता है।

इंटीग्रेटेड इन्फॉर्मेशन थ्योरी

इस सिद्धांत के अनुसार, चेतना को समझने में किसी तंत्र के भीतर सूचना के एकीकरण और उसके घटकों के बीच कारणात्मक संबंध महत्त्वपूर्ण हैं।

दोनों सिद्धांत चेतना की व्याख्या करने का प्रयास करते हैं, लेकिन दोनों के कुछ दावे विवादित हैं और इनके बीच अभी वैज्ञानिक सहमति नहीं बनी है।

2025 में Nature में प्रकाशित एक बड़े सहयोगात्मक अध्ययन ने इन दोनों सिद्धांतों की कुछ भविष्यवाणियों की सीधे तुलना की। अध्ययन में दोनों के समर्थन में कुछ परिणाम मिले, लेकिन दोनों की कुछ प्रमुख भविष्यवाणियों को अपेक्षित समर्थन नहीं मिला।

इससे पता चलता है कि चेतना पर वैज्ञानिक शोध आगे बढ़ रहा है, लेकिन अभी कोई एक सिद्धांत इस समस्या का सर्वमान्य समाधान नहीं बन पाया है।

मूल शोध-पत्र:

https://www.nature.com/articles/s41586-025-08888-1

4. क्या चेतना केवल मस्तिष्क की उपज है?

यह पूरे विषय का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न है।

मस्तिष्क और चेतना के बीच गहरा संबंध स्थापित करने वाले प्रमाण मौजूद हैं। लेकिन यह पूछना कि क्या मस्तिष्क चेतना उत्पन्न करता है, या चेतना किसी गहरी वास्तविकता का हिस्सा है, एक व्यापक दार्शनिक प्रश्न भी है।

इसे समझने के लिए दो दृष्टिकोणों पर विचार किया जा सकता है।

पहले दृष्टिकोण के अनुसार, चेतना मस्तिष्क की जैविक प्रक्रियाओं से उत्पन्न होती है या उन्हीं पर निर्भर करती है। मस्तिष्क की गतिविधि में परिवर्तन होने पर अनुभव बदल जाता है। यह दृष्टिकोण अनेक प्रयोगात्मक निष्कर्षों के अनुरूप है।

दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार, चेतना को केवल मस्तिष्क की गतिविधियों तक सीमित नहीं किया जा सकता। अद्वैत वेदांत में चेतना को मूल वास्तविकता माना जाता है। कुछ अन्य दार्शनिक दृष्टिकोण भी चेतना को वास्तविकता का मूलभूत पहलू मानते हैं।

लेकिन इन दोनों के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर है। मस्तिष्क की गतिविधियों और अनुभव के बीच संबंध मिलना यह सिद्ध नहीं करता कि चेतना की अंतिम प्रकृति क्या है। उसी प्रकार, चेतना की पूरी वैज्ञानिक व्याख्या अभी अधूरी होने से यह सिद्ध नहीं होता कि चेतना मस्तिष्क से स्वतंत्र है।

अर्थात्, किसी प्रश्न का अभी अनसुलझा होना किसी एक विशेष उत्तर का प्रमाण नहीं होता।

5. मृत्यु के निकट अनुभव और शरीर से स्वतंत्र चेतना का प्रश्न

शरीर से स्वतंत्र चेतना के दावे की जाँच करने के लिए निकट-मृत्यु अनुभवों पर भी शोध हुआ है।

इन अनुभवों में कुछ लोग हृदयगति रुकने या गंभीर चिकित्सा संकट के बाद प्रकाश दिखाई देने, शरीर से अलग होने, समय की अनुभूति बदलने या असामान्य जागरूकता महसूस करने की रिपोर्ट देते हैं।

ऐसे अनुभवों का अध्ययन महत्त्वपूर्ण है, लेकिन उनकी व्याख्या में सावधानी आवश्यक है।

AWARE-I अध्ययन

2014 में Resuscitation में प्रकाशित AWARE-I अध्ययन में अस्पतालों में हृदयगति रुकने के मामलों और पुनर्जीवित हुए लोगों के अनुभवों की जाँच की गई।

शोध में कुछ लोगों ने पुनर्जीवन के दौरान हुई घटनाओं की याद बताई। एक मामले में रोगी की रिपोर्ट में कुछ बाहरी घटनाओं के साथ उल्लेखनीय समानता पाई गई।

हालाँकि, यह अध्ययन निर्णायक रूप से साबित नहीं कर सका कि अनुभव मस्तिष्क की सामान्य गतिविधि से स्वतंत्र रूप से उत्पन्न हुआ था।

मूल शोध: https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/25301715/

AWARE-II अध्ययन

2023 में प्रकाशित AWARE-II अध्ययन में 25 अस्पतालों के 567 हृदयगति रुकने के मामलों का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने पुनर्जीवन के दौरान EEG, मस्तिष्क में ऑक्सीजन के संकेत और कुछ दृश्य-श्रव्य परीक्षणों का उपयोग किया।

कुछ रोगियों में चेतना से संबंधित हो सकने वाले EEG पैटर्न दर्ज हुए और कुछ जीवित बचे लोगों ने अनुभवों की रिपोर्ट दी। लेकिन छिपी हुई दृश्य छवि की पहचान किसी प्रतिभागी ने सही नहीं की।

इसलिए अध्ययन ने पुनर्जीवन के दौरान मस्तिष्कीय गतिविधि और अनुभवों को समझने में योगदान दिया, लेकिन शरीर से स्वतंत्र चेतना को निर्णायक रूप से स्थापित नहीं किया।

मूल शोध: https://pubmed.ncbi.nlm.nih.gov/37423492/

इन अध्ययनों से यह निष्कर्ष निकालना उचित है कि मृत्यु के निकट अनुभव वैज्ञानिक जाँच के योग्य हैं। लेकिन उन्हें मृत्यु के बाद चेतना के अस्तित्व का अंतिम प्रमाण कहना उपलब्ध परिणामों से आगे जाना होगा।

6. क्या ध्यान से शुद्ध चेतना का अनुभव किया जा सकता है?

भारतीय ध्यान-परंपराओं में विचारों, भावनाओं और मानसिक गतिविधियों का निरीक्षण करने पर विशेष बल दिया जाता है। कुछ साधक गहरे ध्यान के दौरान अपने सामान्य आत्म-बोध में परिवर्तन या ऐसी जागरूकता का अनुभव बताते हैं जिसमें विचारों की भूमिका कम महसूस होती है।

आधुनिक मनोविज्ञान में इनसे मिलते-जुलते अनुभवों का अध्ययन मेटाकॉग्निशन, मेटा-अवेयरनेस और डीसेंटरिंग जैसी अवधारणाओं के माध्यम से किया जाता है।

ध्यान के दौरान ध्यान-नियंत्रण, आत्म-जागरूकता और भावनात्मक प्रक्रियाओं में बदलावों के वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं। मस्तिष्क की गतिविधियों पर ध्यान के प्रभावों का अध्ययन भी किया गया है।

फिर भी, दो बातें अलग रखना आवश्यक है।

पहली, किसी व्यक्ति को शुद्ध चेतना या साक्षी होने का अनुभव हो सकता है। यह उसके लिए गहरा और अर्थपूर्ण अनुभव हो सकता है।

दूसरी, उस अनुभव से यह निष्कर्ष निकालना कि चेतना शरीर या मस्तिष्क से स्वतंत्र है, एक अलग दावा है। उसके लिए अतिरिक्त प्रमाण चाहिए।

ध्यान के दौरान मस्तिष्क में परिवर्तन मिलना न तो अद्वैत के सभी दावों को सिद्ध करता है, न ही उन्हें अपने आप खारिज करता है।

स्रोत:
Nature Reviews Neuroscience, The Neuroscience of Mindfulness Meditation:
https://www.nature.com/articles/nrn3916

7. अद्वैत वेदांत और आधुनिक विज्ञान: विरोध या अलग-अलग स्तर?

अब हम मूल प्रश्न पर लौटते हैं। क्या अद्वैत का यह दावा कि चेतना मूल वास्तविकता है, और न्यूरोसाइंस का यह निष्कर्ष कि चेतन अनुभव मस्तिष्क की गतिविधियों से गहराई से जुड़ा है, एक-दूसरे के विरोधी हैं?

उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस स्तर की बात कर रहे हैं।

पहला स्तर: अनुभव का अध्ययन

अद्वैत अनुभव करने वाले और अनुभव के संबंध पर विचार करता है। न्यूरोसाइंस यह जाँचता है कि अनुभव के दौरान मस्तिष्क में क्या होता है।

इस स्तर पर दोनों दृष्टिकोण साथ-साथ उपयोगी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, ध्यान के दौरान व्यक्ति के अनुभव और उसकी मस्तिष्कीय गतिविधि का अध्ययन एक ही घटना के दो अलग पहलुओं को समझने में मदद कर सकता है।

दूसरा स्तर: सामान्य मानवीय चेतना

न्यूरोसाइंस में सामान्य मानवीय अनुभव के मस्तिष्क पर निर्भर होने के पर्याप्त प्रमाण हैं। अद्वैत इसके बावजूद शुद्ध चेतना को मन और शरीर से अलग मानता है।

यदि अद्वैत यह दावा करता है कि मस्तिष्क का सामान्य अनुभवों को आकार देने में कोई महत्त्वपूर्ण योगदान नहीं है, तो वह वैज्ञानिक प्रमाणों से टकराएगा। लेकिन यदि उसका दावा चेतना की अंतिम वास्तविकता के बारे में है, तो वह एक अतिरिक्त दार्शनिक प्रश्न उठाता है।

तीसरा स्तर: अंतिम वास्तविकता

अद्वैत कहता है कि चेतना मूल वास्तविकता है। न्यूरोसाइंस की प्रयोगात्मक विधियाँ मुख्यतः मस्तिष्क, व्यवहार और रिपोर्ट किए गए अनुभवों के बीच संबंधों का अध्ययन करती हैं।

मस्तिष्क की गतिविधि माप लेने से अपने आप यह तय नहीं हो जाता कि अंतिम वास्तविकता क्या है। लेकिन विज्ञान की यह सीमा अद्वैत को सही भी सिद्ध नहीं करती।

इसलिए दोनों के बीच कुछ प्रश्नों पर संवाद संभव है, जबकि उनके मूल दार्शनिक दावे समान नहीं हैं।

8. क्या मस्तिष्क चेतना पैदा करता है या उसे व्यक्त करने का माध्यम है?

एक प्रसिद्ध उपमा रेडियो की है। रेडियो किसी संकेत को ग्रहण करके ध्वनि के रूप में व्यक्त करता है। यदि रेडियो खराब हो जाए, तो ध्वनि बंद हो सकती है। इस आधार पर कोई व्यक्ति यह कल्पना कर सकता है कि मस्तिष्क भी चेतना को उत्पन्न करने के बजाय उसका माध्यम हो सकता है।

लेकिन इस उपमा की एक गंभीर सीमा है: रेडियो संकेतों और उनके प्रसारण का स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद है। चेतना के मामले में मस्तिष्क से स्वतंत्र किसी ऐसे स्रोत का प्रमाण स्थापित नहीं हुआ है।

दूसरी ओर, मस्तिष्क की चोटों, एनेस्थीसिया और अन्य अवस्थाओं के दौरान अनुभवों में होने वाले परिवर्तन मस्तिष्क की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शाते हैं।

इसलिए रेडियो की उपमा को एक दार्शनिक संभावना के रूप में समझा जा सकता है, न कि स्थापित वैज्ञानिक सिद्धांत के रूप में।

यदि भविष्य में कोई ऐसा प्रयोग हो जो सामान्य इंद्रियों और सूचना के अन्य संभावित स्रोतों को नियंत्रित करते हुए मस्तिष्क से स्वतंत्र जानकारी-प्राप्ति का विश्वसनीय और दोहराया जा सकने वाला प्रमाण दे, तो वह वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण होगा।

9. विज्ञान और दर्शन के बीच संवाद कैसे आगे बढ़ सकता है?

भारतीय दर्शन और आधुनिक विज्ञान के बीच सार्थक संवाद के लिए दोनों के योगदान और सीमाओं को समझना आवश्यक है।

भारतीय दर्शन अनुभव, आत्म-बोध और वास्तविकता की प्रकृति के बारे में गहरे प्रश्न उठाता है। वह यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम स्वयं को किस आधार पर जानते हैं और अनुभव करने वाले की अवधारणा क्या है।

आधुनिक विज्ञान इन प्रश्नों से संबंधित उन पहलुओं की जाँच करता है जिन्हें मापा, तुलना किया और नियंत्रित परिस्थितियों में परखा जा सकता है।

उदाहरण के लिए, यदि दावा किया जाए कि ध्यान से व्यक्ति की आत्म-जागरूकता में परिवर्तन होता है, तो इसे व्यवस्थित अध्ययन से जाँचा जा सकता है। यदि दावा किया जाए कि चेतना शरीर से स्वतंत्र रूप से जानकारी प्राप्त कर सकती है, तो उसके लिए ऐसे प्रयोग आवश्यक होंगे जिनमें जानकारी का स्रोत छिपा हो और सामान्य इंद्रियों से जानकारी प्राप्त करने की संभावना नियंत्रित की गई हो।

इसके विपरीत, यदि कोई दावा परम वास्तविकता या आत्मन् और ब्रह्म की अभिन्नता के बारे में है, तो वह केवल EEG या fMRI के परिणामों से सीधे स्थापित नहीं किया जा सकता।

यह अंतर विज्ञान और दर्शन के बीच दीवार खड़ी नहीं करता। बल्कि यह स्पष्ट करता है कि किस प्रश्न के लिए किस प्रकार के तर्क और प्रमाण उपयुक्त हैं।

निष्कर्ष: चेतना का रहस्य अभी खुला है

चेतना मानव अनुभव की सबसे बुनियादी और जटिल समस्याओं में से एक है।

आधुनिक विज्ञान ने मस्तिष्क की गतिविधियों, जागरूकता, ध्यान, नींद, एनेस्थीसिया और चेतना के विकारों के बारे में महत्त्वपूर्ण ज्ञान प्राप्त किया है। इन शोधों से यह स्पष्ट हुआ है कि सामान्य मानवीय चेतना का मस्तिष्क की कार्यप्रणाली से गहरा संबंध है।

लेकिन चेतना की पूरी व्याख्या अभी उपलब्ध नहीं है। विशेष रूप से यह प्रश्न कि भौतिक प्रक्रियाओं के साथ व्यक्तिपरक अनुभव कैसे जुड़ता है, वैज्ञानिक और दार्शनिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

अद्वैत वेदांत चेतना को मूल वास्तविकता मानता है। यह एक गहरी दार्शनिक परिकल्पना है, लेकिन आधुनिक न्यूरोसाइंस ने इसे निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं किया है। उसी प्रकार, चेतना की पूरी व्याख्या का अभाव अपने आप में अद्वैत की पुष्टि नहीं है।

सबसे संतुलित निष्कर्ष यह है कि दोनों दृष्टिकोण कुछ प्रश्नों पर एक-दूसरे को उपयोगी चुनौती दे सकते हैं। दर्शन हमें यह पूछने में मदद करता है कि चेतना और वास्तविकता के बारे में हमारे मूल विचार क्या हैं। विज्ञान उन दावों को परखता है जिनसे स्पष्ट, मापने योग्य भविष्यवाणियाँ निकाली जा सकती हैं।

अंततः, किसी अनुभव की गहराई, किसी दार्शनिक विचार की प्राचीनता और किसी वैज्ञानिक सिद्धांत की प्रयोगात्मक सफलता—तीनों अलग-अलग प्रकार की बातें हैं। उन्हें एक-दूसरे का विकल्प मानने के बजाय उनके बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना ही चेतना के रहस्य को समझने का अधिक विश्वसनीय मार्ग है।

शायद सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न अभी भी वही है: मस्तिष्क की गतिविधियों के साथ अनुभव का संबंध तो हम काफी हद तक देख सकते हैं, लेकिन अनुभव होने का तथ्य स्वयं क्या है?

इस प्रश्न का अंतिम उत्तर अभी हमारे पास नहीं है। और यही कारण है कि चेतना पर वैज्ञानिक शोध तथा दार्शनिक चिंतन, दोनों आगे भी महत्त्वपूर्ण बने रहेंगे।