जब पत्थर पर हुआ था भारत का अनोखा ब्रांड प्रमोशन

जिस पत्थर ने 1500 साल पहले बताया था—“हमारे रेशम की खासियत क्या है!”

मध्य प्रदेश के मंदसौर (प्राचीन दशपुर) से प्राप्त कुमारगुप्त प्रथम के समय के प्रसिद्ध मंदसौर शिलालेख (436 ईस्वी, जीर्णोद्धार 473 ईस्वी) को विश्व का पहला विज्ञापन (Advertisement) माना जाता है। इस शिलालेख की रचना कवि वत्सभट्टि ने की थी। इसमें लाट (गुजरात) देश से आकर दशपुर में बसे रेशम बुनकरों के संघ (गिल्ड) द्वारा एक भव्य सूर्य मंदिर के निर्माण और उनके द्वारा बुने गए रेशम के कपड़ों की विशेषताओं का सुंदर वर्णन है। 

 इस शिलालेख में लिखा गया है कि बुनकरों की रेशमी साड़ियाँ इतनी सुंदर और आकर्षक होती हैं कि युवतियां सोने के आभूषण और फूलों की माला पहनने के बावजूद, उन खास रेशमी साड़ियों को पहने बिना अपने प्रेमियों से मिलने नहीं जाती थीं।

इस विज्ञापन रूपी शिलालेख में रेशमी वस्त्रों की महत्ता और उनके आकर्षण को बढ़ावा देने वाले प्रमुख श्लोक और  अर्थ इस प्रकार है :

1. तरुण-तरुणी के आकर्षण पर श्लोक (वस्त्रों की सुंदरता का विज्ञापन)

संस्कृत श्लोक:

तरुणतरुणीजनस्य वोढुमभिलषणीय देशजात्यवयवैः।
प्रमदाजनप्रियतमो रेशमपट्टवस्त्रमिदं सर्वतो भाति॥

अर्थ:
"देश की उत्तम जातियों और विभिन्न आकृतियों के अंगों को सुशोभित करने वाला, युवा पुरुषों और स्त्रियों द्वारा धारण करने योग्य तथा सुंदरियों (प्रमदाजन) को सबसे अधिक प्रिय लगने वाला यह रेशमी वस्त्र (पट्टवस्त्र) सब ओर अपनी आभा बिखेर रहा है।"

 विज्ञापन की पंक्तियां हैं -

"तारुण्य कान्यु पछितौ पि सुवर्ण हार

ताम्बूल पुष्प विधिना समल को पि। 

नारी जनः प्रिय भूपेति न तावदस्या

यावन्न पट्टमाय वस्त्र युन्गानि निधत्ते।।"

इसका अर्थ है कि आपका शारीरिक यौवन कितना ही अच्छा क्यों न हो, आपने भलेही फूलों की माला, अच्छे आभूषण ही क्यों न पहने हो, भले ही आपके ताम्बूल के समान होंठ हो, पर एक नारी आपके पास तब तक नहीं आएगी, जब तक आप अच्छे वस्त्र धारण नहीं करते हैं।

रूप-सौंदर्य और आभूषणों की पूरकता पर श्लोक

इस श्लोक में तुलनात्मक रूप से विज्ञापन कला का प्रदर्शन है कि आभूषण भी बिना रेशमी वस्त्र के अधूरे हैं। 

संस्कृत श्लोक:

यथा च हाराः कुसुमैः पयोधरा अतीव रम्याः कुसुमैश्च पादपाः।
तथा त्विदं पट्टमयं वस्त्रं तरुणजनस्य भूषणाय भवति॥

अर्थ:
"जिस प्रकार पुष्पों के हार से सुंदरियों के वक्षस्थल और फूलों से वृक्ष अत्यंत रमणीय लगते हैं, ठीक उसी प्रकार यह रेशमी (पट्टमय) वस्त्र भी युवा लोगों के सौंदर्य और उनके आभूषणों की शोभा बढ़ाने के लिए सर्वथा उपयुक्त है।"

कल्पना कीजिए, आप करीब 1500 वर्ष पीछे चले जाएँ। न अखबार हैं, न रेडियो, न टेलीविजन और न सोशल मीडिया। किसी व्यापारी को अपने उत्पाद की विशेषता लोगों तक पहुँचानी है। वह क्या करेगा?

आज इसका जवाब आसान है—विज्ञापन बनाइए, वीडियो बनाइए, सोशल मीडिया पर पोस्ट कीजिए। लेकिन गुप्तकालीन भारत में इसका एक अलग ही तरीका था। मध्य प्रदेश के वर्तमान मंदसौर में एक ऐसा शिलालेख सामने आया, जिसमें रेशम बुनने वाले एक संगठित व्यवसायिक समुदाय ने अपने कौशल, अपने उत्पाद और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा का ऐसा काव्यात्मक वर्णन कराया कि आधुनिक इतिहासकारों और प्रतियोगी परीक्षाओं में उसे “दुनिया का पहला विज्ञापन” कहा जाने लगा।

यह है प्राचीन दशपुर अर्थात् वर्तमान मंदसौर का रेशम-बुनकर शिलालेख।

लेकिन कहानी केवल इतनी नहीं है। यह पत्थर हमें लगभग 1500 वर्ष पहले के भारत के व्यापार, उद्योग, कारीगरों की आर्थिक शक्ति, गुजरात से मालवा तक होने वाले प्रवास और सामुदायिक संगठन की भी कहानी सुनाता है।

लाट से दशपुर पहुँचे थे रेशम के कारीगर

आज जिस क्षेत्र को हम मंदसौर कहते हैं, गुप्तकाल में वह दशपुर के नाम से जाना जाता था। इसी दशपुर में लाट प्रदेश से रेशम-बुनकरों का एक समूह आकर बसा।

लाट प्रदेश को सामान्यतः वर्तमान गुजरात क्षेत्र से जोड़ा जाता है। ये बुनकर अकेले नहीं आए थे। वे अपने परिवारों और समुदाय के साथ यहाँ आए और धीरे-धीरे दशपुर के आर्थिक तथा सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए।

यह तथ्य अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है कि उस समय कुशल कारीगरों के संगठित समूह एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाकर बसते थे और अपनी कला के आधार पर नई जगह आर्थिक पहचान बनाते थे।

आज हम इसे skilled migration और business community जैसे शब्दों से समझते हैं। लगभग डेढ़ हजार वर्ष पहले इसका एक रूप भारत में मौजूद था।

ये केवल बुनकर नहीं, एक संगठित “श्रेणी” थे

प्राचीन भारतीय आर्थिक व्यवस्था में एक ही व्यवसाय से जुड़े लोगों के संगठनों को श्रेणी (guild) कहा जाता था।

मंदसौर का शिलालेख ऐसी ही रेशम-बुनकर श्रेणी का उल्लेख करता है।

यह श्रेणी केवल कपड़ा बनाने तक सीमित नहीं थी। उसके सदस्य आर्थिक रूप से इतने सक्षम थे कि उन्होंने अपनी आय से सूर्य देव का मंदिर बनवाया।

यहीं से कहानी और रोचक हो जाती है।

एक ओर ये लोग उच्च गुणवत्ता का रेशम तैयार कर रहे थे और दूसरी ओर अपनी कमाई का उपयोग धार्मिक तथा सार्वजनिक निर्माण में कर रहे थे।

अर्थात् उनकी पहचान केवल “कपड़ा बनाने वाले कारीगर” की नहीं थी। वे एक आर्थिक रूप से प्रभावशाली और सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित समुदाय बन चुके थे।

रेशम की ऐसी तारीफ कि आधुनिक विज्ञापन याद आ जाए!

शिलालेख के सबसे रोचक अंशों में रेशमी वस्त्रों की प्रशंसा की गई है।

उसमें रेशमी वस्त्रों को सुंदर, आकर्षक, विभिन्न रंगों और विन्यासों से युक्त तथा स्पर्श में सुखद बताया गया है। एक पद्य में स्त्री की सुंदरता और रेशमी वस्त्र के संबंध को भी अत्यंत काव्यात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है।

अब इसे आधुनिक विज्ञापन की भाषा में समझिए।

आज किसी कपड़ा कंपनी का विज्ञापन कह सकता है—

“हमारा कपड़ा मुलायम है, रंग आकर्षक हैं और इसे पहनने से आपका व्यक्तित्व और सुंदर दिखाई देगा।”

दशपुर के शिलालेख में लगभग यही भाव काव्य के माध्यम से सामने आता है।

यही कारण है कि आधुनिक विद्वानों और सामान्य ज्ञान की पुस्तकों ने इसे विज्ञापन के इतिहास से जोड़ दिया।

लेकिन यह विज्ञापन आखिर किसका था?

यहाँ एक दिलचस्प बात है।  शिलालेख किसी एक व्यक्ति या दुकान का विज्ञापन नहीं करता। इसमें रेशम-बुनकरों की पूरी श्रेणी का गौरव-वर्णन है। इसमें बताया गया है कि ये लोग कहाँ से आए, उनकी कला कैसी थी, उन्होंने दशपुर में कैसे प्रतिष्ठा अर्जित की और उन्होंने सूर्य मंदिर का निर्माण कराया।

आज की कॉर्पोरेट भाषा में कहें तो यह केवल Product Promotion नहीं था, बल्कि—सीएसआर यानी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी का भी शानदार उदाहरण है। इन कारीगरों के समूह ने अपनी कमाई से मंदसौर में सूर्यमंदिर का निर्माण करवाया। 

आज कोई कंपनी कहती है—“हमारी कंपनी की परंपरा इतनी पुरानी है।” “हमारी गुणवत्ता सबसे अलग है।” “हम समाज के लिए भी काम करते हैं।”“हमने इतने बड़े सामाजिक प्रकल्प किए हैं।”

मंदसौर के शिलालेख में लगभग 1500 वर्ष पहले एक व्यवसायिक समुदाय की प्रतिष्ठा इसी प्रकार सार्वजनिक रूप से दर्ज हुई।

सूर्य मंदिर—व्यापार से अर्जित धन का सामाजिक उपयोग

शिलालेख का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रेशम की प्रशंसा से भी आगे जाता है।  रेशम-बुनकरों ने अपनी आर्थिक समृद्धि से सूर्य मंदिर बनवाया।

मंदिर के निर्माण की घटना लगभग 436–437 ईस्वी से जुड़ी है। बाद में मंदिर का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हुआ और लगभग 473 ईस्वी में उसका पुनर्निर्माण कराया गया। वर्तमान विस्तृत शिलालेख इसी पुनर्निर्माण से संबंधित है। इसलिए मंदसौर के शिलालेख की तारीख को लेकर कभी-कभी भ्रम दिखाई देता है।

सही ढंग से देखें तो—

436–437 ई. — सूर्य मंदिर का मूल निर्माण

473 ई. — मंदिर का पुनर्निर्माण और शिलालेख

यानी लगभग 36 वर्ष बाद उसी व्यवसायिक समुदाय ने मंदिर के पुनर्निर्माण में भी भूमिका निभाई।

पत्थर पर लिखी गई “ब्रांड स्टोरी”

आज बड़ी कंपनियाँ अपनी वेबसाइट पर “Our Story” नाम से पूरा इतिहास लिखती हैं। कोई कंपनी बताती है कि उसके संस्थापक कहाँ से आए थे। किस कठिनाई में उन्होंने काम शुरू किया।

उन्होंने कौन-सा उत्पाद बनाया। उत्पाद की विशेषता क्या थी। और कंपनी ने समाज के लिए क्या किया।

मंदसौर के इस शिलालेख को पढ़ते हुए कुछ ऐसा ही अनुभव होता है।

रेशम-बुनकरों की कहानी कुछ इस क्रम में सामने आती है—

लाट से आगमन → दशपुर में बसना → रेशम निर्माण → आर्थिक समृद्धि → सामाजिक प्रतिष्ठा → सूर्य मंदिर निर्माण → मंदिर का पुनर्निर्माण।

यह केवल इतिहास नहीं है।

यह एक प्राचीन Brand Story भी है।

शिलालेखकार वत्सभट्टी ने इसे कविता बना दिया

इस पूरे विवरण को साधारण गद्य में नहीं लिखा गया था।

यह संस्कृत के अत्यंत अलंकारिक और काव्यात्मक रूप में लिखा गया था। इसके रचयिता के रूप में वत्सभट्टी का नाम मिलता है। शिलालेख में सूर्य की स्तुति से लेकर दशपुर नगर, उसके प्राकृतिक सौंदर्य और रेशम-बुनकरों की कला तक का वर्णन अत्यंत सुंदर भाषा में किया गया है।

अर्थात् यह उस समय के लिए केवल सूचना नहीं थी। इसे इस तरह लिखा गया कि पढ़ने या सुनने वाला प्रभावित हो। आज विज्ञापन की भाषा में इसे creative communication कहेंगे।

तब यही काम संस्कृत के काव्य और अलंकार कर रहे थे।

दशपुर का भी किया गया “प्रचार”

शिलालेख की एक और विशेषता है कि इसमें केवल रेशम-बुनकरों की प्रशंसा नहीं है। दशपुर नगर का भी सुंदर वर्णन किया गया है।

नगर के तालाबों, कमलों, उद्यानों, भवनों और प्राकृतिक वातावरण को काव्यात्मक रूप दिया गया है।  आज पर्यटन विभाग किसी शहर के लिए लिखता है—

“आइए, इस सुंदर ऐतिहासिक शहर को देखिए।”

प्राचीन दशपुर में नगर का सौंदर्य भी इसी प्रकार साहित्यिक भाषा में प्रस्तुत किया गया।

इस तरह एक ही शिलालेख में हमें तीन स्तर की प्रतिष्ठा दिखाई देती है—

नगर की प्रतिष्ठा

कारीगरों की प्रतिष्ठा

उनके उत्पाद की प्रतिष्ठा

आधुनिक मार्केटिंग की भाषा में इसे एक तरह का destination branding + community branding + product branding कहा जा सकता है।

राजा भी हैं, कारीगर भी

मंदसौर का यह शिलालेख इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसमें केवल राजा का गुणगान नहीं किया गया।

इसमें कुमारगुप्त, विश्ववर्मन और बंधुवर्मन जैसे शासकों का उल्लेख मिलता है, लेकिन साथ ही रेशम-बुनकरों की आर्थिक और सामाजिक भूमिका भी सामने आती है।

यह हमें प्राचीन भारतीय समाज की एक महत्वपूर्ण तस्वीर दिखाता है।  इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं था।

उसमें—कारीगर थे, व्यापारी थे, श्रेणियाँ थीं, नगर थे, मंदिर थे और आर्थिक शक्ति रखने वाले समुदाय भी थे।

मंदसौर का पत्थर इसी सामाजिक इतिहास की आवाज है।

1500 साल पहले का “Made in India”

आज दुनिया में किसी उत्पाद की पहचान उसके देश और उसकी गुणवत्ता से जुड़ती है।

“Made in Japan”

“Made in Italy”

“Made in India”

जैसे शब्द उत्पाद की पहचान बनाते हैं।  मंदसौर के शिलालेख में भी एक प्रकार की भौगोलिक पहचान दिखाई देती है।

ये बुनकर लाट प्रदेश से आए थे, लेकिन दशपुर में उन्होंने अपनी नई पहचान बनाई। उनकी कला और उत्पाद ने उन्हें स्थानीय समाज में प्रतिष्ठा दिलाई।

इसलिए इसे प्राचीन भारत में कारीगरों की mobility और skill-based economic identity का महत्वपूर्ण उदाहरण भी माना जा सकता है।

पत्थर से सोशल मीडिया तक

आज किसी कंपनी के पास अपनी पहचान बनाने के लिए अनेक माध्यम हैं—

टेलीविजन, अखबार, वेबसाइट, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, Xलेकिन 5वीं शताब्दी के उन रेशम-बुनकरों के पास इनमें से कुछ भी नहीं था।

उनके पास था—कौशल, उत्पाद, धन, सामाजिक प्रतिष्ठा और पत्थर पर लिखी जाने वाली संस्कृत।

उन्होंने अपनी उपलब्धियों को पत्थर पर लिखवा दिया।

और आश्चर्य देखिए—

जिस संदेश को उन्होंने लगभग 1500 वर्ष पहले पत्थर पर लिखवाया था, वह आज भी पढ़ा जा रहा है।

यही किसी भी ब्रांड की सबसे बड़ी सफलता हो सकती है—समय बीत जाए, लेकिन पहचान बनी रहे। यही कारण है कि “दुनिया का पहला विज्ञापन” इसकी लोकप्रिय पहचान है, जबकि इतिहास की दृष्टि से इसे प्राचीन व्यापारिक ब्रांडिंग और आत्म-प्रचार का उदाहरण कहना अधिक सावधान भाषा होगी।

आज के विज्ञापन से एक सीधा संबंध

मंदसौर के उस शिलालेख को यदि आज के विज्ञापन की भाषा में अनुवाद करें तो उसका संदेश कुछ ऐसा बनता है—

“हम लाट से आए कुशल रेशम-बुनकर हैं। हमारे वस्त्र सुंदर, रंगीन और स्पर्श में सुखद हैं। हमारी कला ने हमें समृद्ध बनाया है। हमने इस नगर को अपना घर बनाया है और अपनी समृद्धि से सूर्य मंदिर का निर्माण कराया है। हमारी कला ही हमारी पहचान है।”

डेढ़ हजार वर्ष पहले यह संदेश पत्थर पर संस्कृत में लिखा गया था।

आज वही संदेश शायद—

एक वेबसाइट, इंस्टाग्राम पोस्ट, कंपनी प्रोफाइल, ब्रांड फिल्म और CSR रिपोर्ट के रूप में दिखाई देता।

माध्यम बदल गया। तकनीक बदल गई। भाषा बदल गई। लेकिन अपनी गुणवत्ता बताने, अपनी कहानी सुनाने और अपनी प्रतिष्ठा बनाने की मानवीय आवश्यकता नहीं बदली।

यही मंदसौर के दशपुर शिलालेख की सबसे बड़ी कहानी है।

एक पत्थर और भारतीय व्यापार की पूरी कहानी

मंदसौर का यह शिलालेख इसलिए असाधारण है क्योंकि इसमें एक साथ कई संसार दिखाई देते हैं—

गुप्तकालीन भारत का राजसत्ता संसार,  दशपुर का नगर संसार, लाट से आए रेशम-बुनकरों का आर्थिक संसार, श्रेणी-व्यवस्था का संगठन, संस्कृत काव्य की साहित्यिक दुनिया, सूर्य उपासना की धार्मिक परंपरा और व्यवसायिक प्रतिष्ठा बनाने की मानवीय प्रवृत्ति।

इसलिए इसे केवल “पहला विज्ञापन” कहना शायद इसके महत्व को छोटा कर देना होगा।

यह वास्तव में भारत के प्राचीन आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन का पत्थर पर लिखा हुआ एक जीवंत दस्तावेज है।  और जब आज हम विज्ञापन की दुनिया में “ब्रांड स्टोरी”, “ब्रांड वैल्यू”, “प्रोडक्ट पोजिशनिंग” और “कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी” जैसे शब्द सुनते हैं, तब मंदसौर का लगभग 1500 वर्ष पुराना पत्थर हमें याद दिलाता है—

ब्रांडिंग की तकनीक आधुनिक हो सकती है, लेकिन अपनी कला, अपने उत्पाद और अपनी प्रतिष्ठा को समाज के सामने प्रस्तुत करने की इच्छा बहुत पुरानी है।

मंदसौर के उस पत्थर पर रेशम बिक नहीं रहा था—रेशम की प्रतिष्ठा बनाई जा रही थी।

और शायद इसी अर्थ में वह पत्थर आज भी भारतीय विज्ञापन इतिहास का सबसे अनोखा “विज्ञापन” है।