"उत्पत्ति" शब्द स्वयं भ्रामक है। संस्कृतियों के पर्व प्रायः किसी एक दिन, एक व्यक्ति या एक घटना से जन्म नहीं लेते; वे परतों में बनते हैं। पहले ऋतु-चक्र की कोई पुरानी लय होती है, उस पर किसी देवता की पूजा चढ़ती है, उस पर कथाएँ जुड़ती हैं, और अन्ततः कथाओं की स्मृति ही पर्व का रूप ले लेती है।
दीपावली शब्द दीप और आवलि (पंक्ति) से बना है, अर्थात दीपों की पंक्ति। संस्कृत साहित्य में इसी पर्व के लिए अनेक नाम मिलते हैं: दीपालिका, दीपमालिका, दीपोत्सव, दीपप्रतिपदुत्सव, सुखरात्रि और सुखसुप्तिका। प्राकृत रूप "दिवाली" से हिन्दी की "दीवाली" निकली। कामसूत्र में "यक्षरात्रि" नामक उत्सव का उल्लेख है, जिसे परवर्ती टीकाकार (यशोधर की जयमंगला टीका के सन्दर्भ में प्रायः यही कहा जाता है) सुखरात्रि और दीपालिका की परम्परा से जोड़ते हैं।
लोकस्मृति में राम के वनवास से लौटने पर नगरवासियों द्वारा दीप जलाने से इसका सम्बन्ध रचा बसा है। वाल्मीकि रामायण कालक्रम के संकेत देती है। चौदह वर्ष पूरे होने पर राम की वापसी के प्रसंग में युद्धकाण्ड (गीताप्रेस वाचन में सर्ग 124) का आरम्भ यह बताता है:
पूर्णे चतुर्दशे वर्षे पञ्चम्यां लक्ष्मणाग्रजः। भरद्वाजाश्रमं प्राप्य ववन्दे नियतो मुनिम्॥
अर्थात चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होने पर पंचमी तिथि को राम भरद्वाज के आश्रम पहुँचे। पाठ में तिथि "पंचमी" कही गई है, अमावस्या नहीं। हो सकता है भरद्वाज का आश्रम अयोध्या से इतनी दूर हो। इसके आगे नगर के स्वागत का वर्णन है: मार्गों की सफ़ाई और जल-सिंचन, ध्वज-पताका, पुष्पमाला, वाद्य-घोष और नागरिकों का उत्साह।पर इस वर्णन में दीपमाला या अमावस्या के उत्सव का उल्लेख नहीं है। अलबत्ता अयोध्याकाण्ड के छठे सर्ग में राम के युवराज्याभिषेक की घोषणा के बाद अयोध्या की सजावट का वर्णन है। नागरिक राजमार्ग को सजाते हैं, फूल बिछाते हैं और धूप-सुगंध से वातावरण को सुवासित करते हैं।
श्लोक 2.6.18 में कहा गया है—
प्रकाशकरणार्थं च निशागमनशङ्कया।
दीपवृक्षांस्तथाचक्रुरनुरथ्यासु सर्वशः॥
यहाँ दीपवृक्षान् और प्रकाशकरणार्थम् विशेष ध्यान देने योग्य पद हैं। श्लोक का आशय है कि रात होने की आशंका से नगर की सड़कों पर प्रकाश की व्यवस्था के लिए दीपों के समूह या दीप-व्यवस्थाएँ बनाई गईं। यह अवश्य कहा जा सकता है कि रामकथा के आरंभिक अयोध्या-प्रसंग में दीपों से नगर सजाने की कल्पना मौजूद है। राम के राज्याभिषेक और अयोध्या की सार्वजनिक सजावट के बीच यह संबंध बाद में राम के वास्तविक राज्याभिषेक और अयोध्या-वापसी की स्मृति से जुड़ने वाली सांस्कृतिक कल्पना के अनुकूल पड़ता है।
और हम लोक-स्मृति की अवज्ञा नहीं कर सकते। आज विश्व के कई समुदाय Oral History से ही जाने जाते हैं।
पर मैं एक गहनतर स्तर पर, एक आध्यात्मिक या तात्त्विक स्तर पर इस त्यौहार को राम की विजयी वापसी से जुड़ा हुआ महसूस करता हूँ। लोक ने भी इस तार को पहचान लिया था।
राम ने वानरों में से प्रत्येक के भीतर भी आलोक को पहचाना था। फिर उन्हें संगठित कर एक पंक्ति का रूप दिया था। वह कहानी कि सारे देवता पृथ्वी पर वानर-ऋक्ष के रूप में उतरे, यही बताती है कि हर एक के भीतर देवत्व की ज्योति है पर उसे पहचानना, उसे एक प्रयोजन के प्रति लामबद्ध करना, उसे एक गति और दिशा देना राम का काम था।
दीप का अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व है। उसका अपना पात्र है, अपनी बाती है, अपना तेल है और अपनी लौ है। वह किसी दूसरे दीप के अस्तित्व पर निर्भर हुए बिना प्रकाश दे सकता है।
लेकिन दीप-पंक्ति में प्रवेश करते ही उसके अस्तित्व का एक अतिरिक्त आयाम प्रकट होता है।
अब वह केवल प्रकाश देने वाला दीप नहीं है, बल्कि एक ऐसी सामूहिक रचना का अंग है जिसमें प्रत्येक दीप का स्वतंत्र प्रकाश पूरे समूह की दृश्यात्मक सुंदरता में योगदान करता है।
क्या किसी इकाई का सामूहिकता में सम्मिलित होना उसके स्वतंत्र अस्तित्व का अंत है, अथवा उसके अस्तित्व की एक नई संभावना का आरंभ?
दीप-पंक्ति इसका उत्तर अत्यंत सुंदर ढंग से देती है।
एक दीप अपनी जगह पर पूर्ण है। अनेक दीप मिलकर भी अपनी स्वतंत्रता नहीं खोते। कोई दीप दूसरे में विलीन नहीं होता। कोई अपनी लौ का स्वामित्व दूसरे को नहीं सौंपता। फिर भी वे एक साझा दृश्य-रचना बनाते हैं।
यह Unity in Diversity का केवल उदाहरण नहीं है। इससे थोड़ा आगे जाकर यह बताता है कि विविधता का अर्थ अनिवार्यतः विखंडन नहीं होता और एकता का अर्थ अनिवार्यतः एकरूपता नहीं होता।
दीप-पंक्ति में एकता है, लेकिन एकरूपता नहीं।
यहाँ प्रत्येक दीप की अपनी जगह है, अपना प्रकाश है और अपनी विशिष्टता है। फिर भी सब मिलकर एक ऐसी संपूर्णता निर्मित करते हैं जिसका सौंदर्य किसी एक दीप में उपलब्ध नहीं है।
इसे भारतीय दर्शन के उस विचार से जोड़कर देखा जा सकता है जिसमें अनेकता को किसी मूलभूत एकत्व का विरोधी नहीं माना जाता।
दीप-पंक्ति का सौंदर्य इस बात में नहीं है कि सभी दीप एक जैसे दिखते हैं, बल्कि इस बात में है कि वे अलग-अलग होते हुए भी एक साझा प्रकाश-व्यवस्था का निर्माण करते हैं।
दीप-पंक्ति में केवल दीप नहीं हैं, एक पंक्ति भी है।
यह पंक्ति अपने आप में एक प्रतीक है।
दीपों को यदि कहीं भी, किसी भी अव्यवस्थित ढंग से रख दिया जाए तो वे प्रकाश तो देंगे, लेकिन उनसे वह दृश्यात्मक सौंदर्य उत्पन्न नहीं होगा जो एक सुव्यवस्थित दीप-पंक्ति में दिखाई देता है।
इसका अर्थ है कि व्यक्तिगत सामर्थ्य और सामूहिक व्यवस्था दो अलग-अलग बातें हैं।
व्यक्ति के भीतर प्रकाश हो सकता है, लेकिन सामाजिक जीवन में उस प्रकाश की सार्थक अभिव्यक्ति के लिए एक व्यवस्था भी आवश्यक है।
यहाँ पंक्ति अनुशासन का प्रतीक बनती है।
लेकिन यह अनुशासन किसी दीप पर थोपा हुआ दमनकारी अनुशासन नहीं है। दीप अपनी लौ को स्वतंत्र रूप से जलने देता है। पंक्ति केवल उसके स्थान और संबंध को व्यवस्थित करती है।
यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अनुशासन का ऐसा रूप जिसमें स्वतंत्रता सुरक्षित रहे, लेकिन स्वतंत्रता के कारण सामूहिक व्यवस्था नष्ट न हो।
आधुनिक सामाजिक दर्शन में इसे स्वतंत्रता और व्यवस्था के बीच संतुलन की समस्या के रूप में देखा जाता है।
राजनीतिक दर्शन में भी यह प्रश्न उपस्थित रहता है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा कहाँ तक हो और सामूहिक हित की आवश्यकताएँ किस प्रकार निर्धारित हों।
दीप-पंक्ति इसका एक दृश्यात्मक रूपक प्रस्तुत करती है।
वह बताती है कि व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्तियों को बुझाना नहीं, बल्कि उनके प्रकाश को एक सुंदर और सार्थक सामूहिक अभिव्यक्ति देना है।
दीप-पंक्ति का एक अत्यंत सुंदर रूपकात्मक अर्थ ज्ञान के प्रसार में दिखाई देता है।
एक दीप से दूसरा दीप जलाया जा सकता है। दूसरे से तीसरा और तीसरे से चौथा।
इस प्रक्रिया में मूल दीप का प्रकाश कम नहीं होता।
यह भौतिक ऊर्जा के सामान्य लेन-देन जैसा संबंध नहीं है, जिसमें एक को देने के लिए दूसरे को अपना हिस्सा खोना पड़े।
ज्ञान का स्वभाव भी कुछ ऐसा ही है।
एक शिक्षक अपने विद्यार्थी को ज्ञान देता है तो उसका अपना ज्ञान समाप्त नहीं होता। विद्यार्थी आगे किसी अन्य व्यक्ति को सिखाता है तो ज्ञान का विस्तार होता है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण अंतर है।
दीप से दीप जलाने पर नया दीप अपने स्वतंत्र अस्तित्व में प्रकाशमान होता है। वह मूल दीप की प्रतिकृति नहीं बन जाता।
इसी प्रकार सच्ची शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों को शिक्षक की प्रतिलिपि बनाना नहीं, बल्कि उन्हें स्वयं प्रकाशमान बनाना है।
इस अर्थ में दीप-पंक्ति गुरु-शिष्य परंपरा का भी प्रतीक हो सकती है।
भारतीय ज्ञान-परंपरा में ज्ञान का हस्तांतरण केवल सूचनाओं के आदान-प्रदान तक सीमित नहीं रहा। उसमें दृष्टि, विवेक, प्रश्न करने की क्षमता और स्वतंत्र चिंतन का विकास भी सम्मिलित रहा है।
दीप-पंक्ति इस प्रक्रिया को अत्यंत सुंदर दृश्यात्मक अभिव्यक्ति देती है।
एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को प्रकाश देती है। दूसरी पीढ़ी तीसरी को।
लेकिन प्रत्येक पीढ़ी के सामने यह दायित्व भी रहता है कि वह केवल प्राप्त प्रकाश की संरक्षक न बने, बल्कि उसे आगे बढ़ाने वाली बने।
इस प्रकार दीप-पंक्ति ज्ञान की पीढ़ीगत निरंतरता का प्रतीक है।
एक दीप दूसरे दीप को जलाता है, बुझाता नहीं। यह हमारी सभ्यता का नैतिक आदर्श है।
दीप-पंक्ति का शायद सबसे महत्त्वपूर्ण नैतिक संदेश यही है।
एक दीप दूसरे दीप से जलता है तो पहले दीप की लौ समाप्त नहीं होती।
यह एक ऐसी सामाजिक मानसिकता का प्रतीक है जिसमें दूसरे की उपलब्धि को अपने लिए खतरा नहीं माना जाता।
मानव समाज में प्रतिस्पर्धा का एक ऐसा रूप भी दिखाई देता है जिसमें व्यक्ति दूसरे की सफलता को अपनी असफलता समझने लगता है।
इससे ईर्ष्या, द्वेष और विनाशकारी प्रतिस्पर्धा पैदा होती है।
दीप-पंक्ति इसके ठीक विपरीत एक वैकल्पिक सामाजिक दर्शन प्रस्तुत करती है।
यहाँ दूसरे का प्रकाश अपने प्रकाश का प्रतिद्वंद्वी नहीं है।
बल्कि दूसरे के प्रकाशित होने से संपूर्ण वातावरण अधिक प्रकाशमान होता है।
ऐसी मानसिकता जिसमें व्यक्ति संसाधनों, अवसरों और उपलब्धियों को अनिवार्यतः शून्य-योग प्रतिस्पर्धा (Zero-Sum Game) के रूप में नहीं देखता आवश्यक है।
कि दूसरे की प्रगति से मेरी संभावनाएँ समाप्त नहीं होतीं।
कि दूसरे का ज्ञान मेरे ज्ञान को छोटा नहीं करता।
कि दूसरे की प्रतिभा मेरी प्रतिभा का अपमान नहीं है।
दीप-पंक्ति इसी उदार मानसिकता का प्रतीक बन सकती है।
यहाँ एक बात और महत्त्वपूर्ण है।
दीप केवल दूसरे को जलने की अनुमति नहीं देता, वह स्वयं दूसरे को जलाने में सहयोग करता है।
यह निष्क्रिय सहिष्णुता से आगे बढ़कर सक्रिय सहयोग का दर्शन है।
लेखक मध्यप्रदेश के सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं और वर्तमान में मध्यप्रदेश के चुनाव आयुक्त हैं)
(भोपाल में वैश्विक हिंदी परिवार के कार्यक्रम में ‘दीपावली की उत्पत्ति और प्रतीकार्थ’ पर दिया गया व्याख्यान )




