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राणा यशवंत
 

  • शायर-साहित्यकार हमारे नायक क्यों नहीं?

    शायर-साहित्यकार हमारे नायक क्यों नहीं?

    हम एक अजीब से शोर में रहते हैं। कभी आवाज इधर से उठती-सी लगती है, कभी उधर से। जब कुछ साफ-साफ समझ में आने को होता है, तभी कहीं और से कोई शोर उठ जाता है। इस शोर में हमें रखा जाता है और शोर हमें एक सुरंग में धकेलता जाता है, जहां सिर्फ अंधेरा होता है- अपना चेहरा भी खुद को नजर नहीं आता। यह शोर कई तरह का होता है, लेकिन उसकी मंशा एक ही होती है- हम

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