Friday, April 19, 2024
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भारतीय ज्ञान प्रणाली की प्रासंगिकता

प्राचीन भारत धार्मिक (उचित क्या है?), संन्यासी (वानकप्रास्थि  अर्थात मात्र  मोक्ष पर केंद्रीकरण) और आध्यात्मिक संन्यासियों( विषयों के प्रति विरक्ति), मनोनैतिक (धर्म और मोक्ष पर बल), मनोवैज्ञानिक (काम और क्रोध को जीतने की आकांक्षा) और तपस्वियों (निःस्वार्थ भाव से मनन, तप  और एकाग्रता की तरफ उन्नयन करना) की उर्वरा भूमि (कार्यक्षेत्र) रही है।

वैज्ञानिक शोध औरनवोन्मेष  से प्रतीत होता है कि वैश्विक स्तर पर ज्ञान अधिगम के लिए भारत सर्वाधिक अर्जन क्षेत्र था। संसार में गौरवशाली मंदिरों, आकर्षक महलों एवं गगन चुंबकीय इमारत की नक्काशी की स्थापना के लिए भारत ने  विज्ञान और प्रौद्योगिकी की महत्ता के उन्नयन में महत्ती भूमिका निभाया है। प्राचीन भारत के मनीषियों  द्वारा नवोन्मेषित  किए गए अनेक विचारधाराओं, सिद्धांतों, स्थापित परंपराओं और तकनीकी कौशल की उपादेयता  आधुनिक प्रतत्यो के विकास में महत्वपूर्ण  योगदान प्रदान किया था। प्राचीन काल से ही भारत में बौद्धिक क्षितिजीकरण (ज्ञान के प्रति पुनर्जागरण) के लिए पर्याप्त एवं प्रचुर मात्रा में बौद्धिक कोष थे। वैश्विक स्तर पर अभिलेखित  पांडुलिपियों की उपलब्धता और समग्र शैक्षिक क्षेत्र में ग्रंथों,चिंतकों के  चिंतन और मनन, विचारकों के दार्शनिक तथ्यों से विदित  होता है कि प्राचीन से अर्वाचीन तक की  विवेकी यात्रा में सर्वाधिक जोर  ज्ञान संचय और ज्ञान संकेंद्र को प्रदान किया गया है।

भारत की उच्च ज्ञान केंद्रीय भाव, सनातनी संस्कृति की उपादेयता  और परंपरागत ज्ञान ने भारत की तरफ विदेशियों क्रमशः पुर्तगाली, डच, अंग्रेजों और फ्रांसीसियों को आकर्षित किया था। वैश्विक स्तर पर ज्ञान प्रणाली के तुलनात्मक उपादेयता  ने ज्ञान के क्षेत्र में परिवर्तित नवोन्मेष  की धारणा, महत्व और प्रासंगिकता में भारतीय ज्ञान प्रणाली निदेशक/ पथ-प्रदर्शक की भूमिका में खड़ी है। ज्ञान एक ऐसा विवेकी संचय  है जो व्यक्ति को विवेक की दिव्य-दृष्टि( भूत, वर्तमान और भविष्य के परिणाम) को समझने की विवेकी धारणीयता प्रदान करती है।

भारतीय विवेक चैतन्य श्रृंखला में विचार (प्रत्यय, ज्ञान और विवेक), बुद्धि (उचित को समझने की क्षमता) और दर्शन (सत्य की खोज) को लंबे समय अंतराल पर सर्वोच्च मानवीय मूल्यों की प्राथमिकता प्रदान की गई है। भारतीय दार्शनिक  चिंतकों जिनमें क्रमशः आचार्य  चाणक्य, अचार्य चरक, ब्रह्म मिहिर, ब्रह्म गुप्त, आर्यभट्ट, महर्षि पाणिनि, महर्षि गौतम, प्राचीन वैज्ञानिक नागार्जुन, महिला विदुषी गार्गी और मैत्रेई आदि शिक्षाविदों का भारतीय ज्ञान प्रणाली की मजबूती में महत्वपूर्ण योगदान है। यह महान चिंतक और समय के पाबंद शिक्षाविदों का खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, शल्य चिकित्सा को वैश्विक स्तर पर उच्चतर स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण योग एवं उपादेयता रही है।

समकालीन शोध निदेशक, भाषाविद ,समाज वैज्ञानिक, राजनीतिक नेतृत्व और सामाजिक चिंतक उनके साहित्यिक उन्नयन में दिए गए योगदान को मुक्तकंठ से आभार व्यक्त कर रहे हैं और शोध और  नवोन्मेष को इनके  योगदान को  परिकल्पना का साहित्यिक आधार बना रहे हैं। भारतीय शिक्षा प्रणाली हमारे सनातन काव्य ऋग्वेद का आभारी है, जो व्यक्ति और संगठनों के लिए पथ-प्रदर्शक सिद्ध हुई है एवं व्यक्ति के व्यक्तित्व के समग्रवैकासिक शील  के लिए आधारशिला/ पृष्ठभूमि प्रदान किया था। ऋग्वेद के सारांशित निचोड़ व्यक्ति के जीवन के सामाजिक, नैतिक, व्यावहारिक ,बौद्धिक, आध्यात्मिक पहलुओं पर जोर देता है। ऋग्वेद की शिक्षा मानवता, राष्ट्रीयता, व्यक्ति निर्माण, राष्ट्र- राज्य निर्माण, कर्तव्य आभार, आत्मनिर्भरता और आत्मनियंत्रण  पर छोड़ देती है। प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की उपादेयता अधिगम उन्नयन और व्यक्ति के सर्वांगीण व्यक्तित्व के विकास  पर था।प्राचीन भारतीय शिक्षा प्रणाली की महती उपयोगिता स्वस्थ शरीर /काया और स्वस्थ मस्तिष्क/ दिमाग के निर्माण पर केंद्रित था।

भारतीय ज्ञान प्रणाली के संबंध में आवश्यक विशेषता थी की महिलाएं अपने सहयोगी साथी के समान रूप से ज्ञान प्राप्त करती थी। आपला, गार्गी और मैत्रयी प्रमुख महिला विद्वान थी, जिन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। वैदिक युग के दौरान संस्कृत प्राथमिक भाषा के रूप में कार्य करती थी, जबकि पाली का अनुप्रयोग बौद्ध शिक्षा प्रणालियों में किया जाता था ।प्राचीन ज्ञान प्रणाली नैतिकता, मानवता और ईमानदारी के उन्नयन पर जोर देती थी। इस शैक्षिक प्रणाली का मौलिक उद्देश्य स्नातक (शिक्षार्थी/ विद्यार्थी) को अति आभारी, विनम्र और अनुशासित बनाना था।

भारतीय शैक्षिक परंपराएं दर्शन, कला, नैतिकता, व्याकरण, खगोल विज्ञान, समाजशास्त्र ,राजनीति (अर्थशास्त्र), नैतिकता (नीति शास्त्र), भूगोल, तर्कशास्त्र, धातु विज्ञान व्यायाम शास्त्र और कर्मकांड के विस्तृत पाठ्यक्रम को सम्मिलित किया था। ज्ञान के विषय में अखंड और विषय विशेषज्ञ के स्तर पर आचार्यों  और गुरुजी का सम्मान भारतीय ज्ञान परंपरा में उच्च कोटि का था।ज्ञान प्राप्त करने वाले स्नातक को नैतिकता का कार्य करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से व्यक्ति में संज्ञानात्मक विकास (चित – शुद्धि) होता है, उसको आनंद (सुख और दुख की स्थिति) की समझ होती है। ज्ञान की प्रासंगिकता  सत (सत्य )और असत (असत्य) के बीच गुणात्मक अंतर को विकसित करना है। ज्ञान  व्यक्ति को नश्वर संसार के अशांत जल में एक बेड़ा की तरह पार ले जाता है।

 

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