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सफलता और उपलब्धियों से भरे रहे लोकसभा अध्यक्ष के रूप में बिरला के दो वर्ष

लोकसभा अध्यक्ष के रूप में कोटा-बूंदी के सांसद ओम बिरला के दो साल पूरे हो गए हैं। इन दो सालों की अवधि में लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने अपनी विशिष्ठ कार्यशैली से अनेक सफलताएं और उपलब्धियां अपने नाम की। उनके संचालन में लोकसभा ने जहां कार्य उत्पादकता में नए रिकाॅर्ड स्थापित किए, वहीं वित्तीय सुधारों और अनुशासन पर बल देकर बिरला ने 400 करोड़ रूपए से अधिक की बचत भी की।

कोटा-बूंदी संसदीय क्षेत्र से दूसरी बार सांसद बने बिरला को 19 जून 2019 को सर्वसम्मति से लोकसभा का अध्यक्ष चुना गया था। अध्यक्ष बनने के साथ ही सदन के संचालन में अपनी कुशलता से उन्होंने अलग ही छवि स्थापित की। सदन में हंगामे और विवाद की स्थितियों को दूर करने के लिए उन्होंने सभी दलों के सदस्यों को अपनी बात सदन में रखने के अधिक से अधिक समय व अवसर प्रदान करे। इससे विधेयकों व जनहितों के विषयों पर स्वस्थ एवं समृद्ध चर्चा की परम्परा विकसित हुई। अनेक अवसरों पर सदन देर रात एक बजे तक चला और सदस्यों ने सक्रियता से भाग लिया।

रिकाॅर्ड के साथ, पांचों सत्रों में 122.2 प्रतिशत उत्पादकता
17वीं लोकसभा के अब तक आयोजित पांच सत्र हंगामे रहित लम्बी बैठकों के लिए याद किए जा रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष बिरला के कुशल संचालन में पांचों सत्रों की कुल उत्पादकता 122.2 प्रतिशत रही जो 14वीं, 15वीं और 16वीं लोकसभा के पहले पांच सत्रों की तुलना में कहीं अधिक रही। कोविड की चुनौतियों के बीच आयोजित 17वीं लोकसभा के चैथे सत्र की उत्पादकता 167 प्रतिशत रही जो लोकसभा के किसी भी सत्र की सर्वाधिक उत्पादकता है। इसके अलावा पिछली तीन लोकसभाओं की तुलना में इस लोकसभा में बैठकों की संख्या भी ज्यादा रही।

लोकसभा के पांचों सत्रों के दौरान सरकार की ओर करीब 102 बिल सदन में लए गए तथा सदन ने विस्तृत चर्चा के बाद 107 विधेयकों को पारित किया। उल्लेखनीय यह रहा है कि 14वीं, 15वीं और 16वीं लोकसभा के दौरान लाए गए और पारित बिलों की संख्या डेढ़ से दो गुना रही। विधेयकों पर 262.5 घंटे चर्चा हुई तथा पक्ष और विपक्ष के 1744 सदस्यों ने अपनी बात रखी।

पाँचों सत्रों के दौरान सरकार की जवाबदेही बढ़ाने के लिए भी सक्रिय प्रयास किए गए। प्रश्नकाल के दौरान प्रतिदिन औसतन 5.37 प्रश्नों के मौखिक जवाब दिए गए जो 14वीं, 15वीं व 16वी लोकसभा के औसत से अधिक है। नियम 377 के तहत उठाए गए विषयों में सरकार भी सरकार ने 89.82 प्रतिशत विषयों के जवाब दिए जो भी 15वीं और 16वीं लोकसभा में ज्यादा है।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अधिक से अधिक सदस्यों को बोलने का अवसर प्रदान कर शून्यकाल को एक नई परिभाषा दी है। इसी कारण संसदीय कार्यमंत्री प्रल्हाद जोशी ने उन्हें जीरो आॅवर के हीरो की संज्ञा दी थी। बिरला ने इस बार भी इस परम्परा को बरकरार रखा। 17वीं लोेकसभा के पहले पांच सत्रों में शून्यकाल के दौरान प्रतिदिन 29.72 सदस्यों ने अपनी बात रखी। वहीं 14वीं, 15वीं व 16वीं लोकसभा में यह संख्या क्रमशः 9.86, 9.27 तथा 24.19 रही थी।

कोविड संकट के बीच भी लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सभी स्वास्थ्य प्रोटोकाॅल्स के साथ मानसून व बजट सत्र का आयोजन कर लोकसभा के देश के प्रति संवैधानिक दायित्वों को पूरा किया है। इसमें उल्लेखनीय रहा कि तमाम स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच आयोजित मानसून सत्र लोकसभा के इतिहास का सर्वाधिक उत्पादक सत्र रहा।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कार्यभार संभालते ही वित्तीय अनुशासन पर जोर देते हुए अनावश्यक खर्चों को समाप्त करने की पहल की। इससे वह पहले वर्ष में करीब 151 करोड़ रूपए बचाने में सफल रहे थे। इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने दूसरे वर्ष में करीब 250 करोड़ रूपए की बचत सुनिश्चित की। इस तरह दो वर्ष मे वे कुल 400 करोड़ रूपए बचाने में सफल रहे। बिरला के सबसे ऐतिहासिक फैसलों में एक संसद भवन में भोजन पर दी जाने वाली सब्सिडी को समाप्त करने का रहा। इससे लोकसभा प्रतिवर्ष करीब 9 करोड़ रूपए की बचत करेगी।

लोकसभा अध्यक्ष ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त बनाने की नई और अनूठी पहल की जिसके तहत देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्था ने सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायतों के लिए कार्यशालाएं आयोजित कीं। देहरादून और उत्तर-पूर्व के सात राज्यों के लिए शिलांग में आयोजित कार्यशाला में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद के करीब 41000 सदस्य आॅफ लाइन व ऑनलाइन जुड़े।

एक और नवीन पहल के तहत राष्ट्रीय युवा संसद के फाइनल्स का आयोजन पहली बार संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में हुआ। इससे प्रतियोगिता में भाग लेने वाले युवा संविधान निर्माण के इतिहास से भी रूबरू हुआ। विजयी तीन प्रतिभागियों को प्रधानमंत्री के समक्ष उद्बोधन का अवसर मिला।

लोकसभा अध्यक्ष ने सांसदों की क्षमता संवर्धन के लिए अनेक नवाचार तो किए ही लोकसभा सचिवालय के अधिकारियों और कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए भी कई पहल की हैं। इसके तहत अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्य विभाजन को रिव्यू किया गया। इसके अलावा लोकसभा में तकनीक के उपयोग पर जोर दिया। इससे प्रतिवर्ष 25 हजार से अधिक कागजों की बचत हुई है। लोकसभा के अनेक दस्तावेजों का डिजिटलाइजेशन भी किया जा रहा है।

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