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द्वितीय विश्व युद्ध पर आधारित डेनिश फिल्म ‘इनटू द डार्कनेस’ को मिला स्वर्ण मयूर

हाल ही में संपन्न हुए 51वें भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) में द्वितीय विश्व युद्ध पर आधारित भव्य फिल्म ‘इनटू द डार्कनेस’ (डी फॉरबैंडेड ऑर) ने प्रतिष्ठित गोल्डन पिकॉक पुरस्कार जीत लिया है। इस फिल्म की कहानी एक डेनिश इलेक्ट्रॉनिक्स फैक्ट्री के मालिक को दिखाती है जिसे कब्जा कर चुकी नाज़ी फौज के लिए उत्पादन करने को मजबूर किया जाता है। एंडर्स रेफन द्वारा निर्देशित 152 मिनट की ये डेनिश फिल्म उस जटिल भावनात्मक उथल-पुथल में ताकतवर तरीके से गोता लगाती है जिससे डेनमार्क के लोगों को अपने देश पर हुए नाजी कब्जे के दौरान गुजरना पड़ा था। इसे ये फिल्म उन मानसिक संघर्षों के जरिए बहुत विचारोत्तेजक और ताकतवर ढंग से करती है जिनसे कहानी का केंद्रीय पात्र कार्लस्कोव गुजरता है। एक तरफ तो उसे आक्रमणकारियों द्वारा जर्मन बाजार के लिए उत्पादन जारी रखने के लिए मजबूर किया जाता है ताकि वो अपने परिवार की रक्षा कर सके, वहीं दूसरी तरफ उसके इस चुनाव की नैतिक असमर्थता के नतीजा ये होता है कि उसके परिवार के भीतर दर्दनाक विखंडन होते हैं।

गोल्डन पिकॉक पुरस्कार में 40 लाख रुपये की नकद राशि भी शामिल है जो निर्देशक एंडर्स रेफन और निर्माता लेने बरग्लम के बीच बराबर साझा की जाएगी। इसके अलावा दोनों को एक-एक प्रमाण पत्र भी दिया गया है।

सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सिल्वर पिकॉक पुरस्कार ताइवान की निर्देशक, लेखिका और निर्माता चेन-नियेन को, उनकी 2020 में आई मंदारिन भाषा की ड्रामा फिल्म ‘द साइलेंट फॉरेस्ट’ के लिए दिया गया। ये फिल्म विशेष जरूरतों वाले बच्चों के एक स्कूल में होने वाले यौन शोषण की दिल दहला देने वाली कहानी बयां करती है।

ये कहानी फिल्म के प्रमुख पात्र चांग चेंग के नजरिए से कही जाती है, जो सुन नहीं सकता है। वो इस विशेष स्कूल में हाल ही में आया है। 108 मिनट की ये फिल्म बधिर लोगों की दुनिया के भीतर के शोर में उथल पुथल भरे कोलाहल को खासतौर पर प्रकट करती है। ये फिल्म असल घटनाओं पर आधारित है जो ताइवान के एक स्कूल में घटी थीं और ये दर्दनाक कहानी बयां करती है कि कैसे पीड़ित ही बाद में खुद शिकारियों में तब्दील हो जाते हैं।

सर्वश्रेष्ठ निर्देशक के लिए सिल्वर पिकॉक में 15 लाख रुपये का नकद पुरस्कार और प्रमाण पत्र दिया जाता है।

सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (पुरुष) के लिए सिल्वर पिकॉक पुरस्कार 17 साल के त्शू शुआन-लियू को दिया गया है, जिन्होंने ‘द साइलेंट फ़ॉरेस्ट’ के मुख्य किरदार चांग चेंग के रूप में अपनी अदाकारी के जरिए विशेष बच्चों की दुनिया को खूबसूरती से और ताकतवर ढंग से दिखाया है। लियू को फिल्म ’76 हॉरर बुकस्टोर’ (2020) और ‘ऑन चिल्ड्रेन’ (2018) में उनकी भूमिकाओं के लिए भी जाना जाता है। इस पुरस्कार में 10 लाख रुपये की नकद राशि और प्रमाणपत्र शामिल है।

सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (महिला) का सिल्वर पिकॉक पुरस्कार पोलैंड की अदाकारा ज़ोफ़िया स्टाफिए को पियोत्र दोमालेवस्की की फिल्म ‘आई नेवर क्राई / याक नाईदालेइ स्टाद’ में उनकी भूमिका के लिए दिया गया है। ये फिल्म एक बेटी की आत्म-खोज की यात्रा बताती है जिसे अपने मृत पिता के शरीर को वापस लाने के लिए एक पराए देश में नौकरशाही की भूल-भुलैया को पार करना पड़ता है। स्टाफिए को पुरस्कार के रूप में एक प्रमाण पत्र और 10 लाख रुपये नगद मिले हैं। स्टाफिए को उनकी फिल्म ’25 लात निवीनोश्ची. स्प्रावा तोमका कॉमेंदी’ और ‘मार्चेल’ के लिए भी जाना जाता है।

आईएफएफआई-51 का विशेष ज्यूरी पुरस्कार बुल्गेरिया के निर्देशक कामिन कालेव को उनकी 2020 में आई फिल्म ‘फेबरुएरी’ के लिए मिला है। ये फिल्म 8, 18 और 82 – उम्र के इन तीन अलग अलग पड़ावों में एक आदमी की जिंदगी की कहानी कहती है। ये फिल्म जीवन को विभिन्न अवतारों की रहस्यमय निरंतरता के रूप में प्रस्तुत करती है। इसके लिए वो काव्यात्मक रूपकों का उपयोग करती है जो दर्शकों को इस पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं कि इस खुले आसमान के नीचे मौजूद विशाल धरातल पर क्या मनुष्य महज सूक्ष्म बिंदु भर हैं। कालेव एक लेखक भी हैं, और ‘ईस्टर्न प्लेज़’ (2009) और ‘फेस डाउन’ (2015) जैसी फिल्मों के लिए जाने जाते हैं।

कालेव को एक सिल्वर पिकॉक, एक प्रमाण पत्र और 15 लाख रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया है।

इफ्फी-51 स्पेशल मेंशन पुरस्कार भारतीय निर्देशक कृपाल कलिता को उनकी असमिया फिल्म ‘ब्रिज’ के लिए दिया गया, जो ग्रामीण असम में हर साल आने वाली बाढ़ के कारण उपजे जीवन के कष्टों को दिखाती है। ये फिल्म इस राज्य में होने वाली बाढ़ की सालाना घटना की कहानी कहती है, जिसमें शक्तिशाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां कई गांवों को बाढ़ से भर देती हैं और खेती को बर्बाद कर देती हैं। कलिता को इस पुरस्कार के लिए एक प्रमाण पत्र दिया गया।

सर्वश्रेष्ठ डेब्यू निर्देशक का पुरस्कार ब्राजील के निर्देशक कासियो पेरेरा डा सैंटोस को उनकी 2020 में आई पुर्तगाली फिल्म ‘वैलेंटीना’ के लिए दिया गया है। ये फिल्म एक 17 साल की ट्रांसजेंडर ब्राजीली लड़की वैलेंटीना की कहानी कहती है, जिसका एकमात्र उद्देश्य अपनी मां के साथ एक सामान्य जीवन बिताना है।

निर्देशक सैंटोस ने यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रज़िलिया से सिनेमा की पढ़ाई की है, जहां उन्होंने फिक्शन और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्देशन किया। उनकी फिल्मों को कई अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों में चुना गया है। वे 50 से ज्यादा पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।

प्रतिष्ठित आईसीएफटी यूनेस्को गांधी पुरस्कार एक ऐसी फिल्म को दिया जाता है जो महात्मा गांधी के शांति, सहिष्णुता और अहिंसा के आदर्शों को प्रदर्शित करती है। ये पुरस्कार अमीन नायेफे को उनकी 2020 में आई अरबी फिल्म ‘200 मीटर्स’ के लिए दिया गया। ये फिल्म एक फिलिस्तीनी पिता की भावुक कहानी कहती है जो मिडिल ईस्ट के कब्जे वाले क्षेत्र में रहता है, जो दीवार के दूसरी तरफ फंसा हुआ है और अपने बेटे के लिए अस्पताल तक पहुंचने की पूरी कोशिश कर रहा है। इस पुरस्कार में एक प्रमाण पत्र और एक पदक शामिल है और इसे पैरिस के इंटरनेशनल काउंसिल फॉर फिल्म, टेलीविजन एंड ऑडियो विजुअल कम्युनिकेशन (आईसीएफटी) के साथ इफ्फी महोत्सव के तत्वावधान में दिया जाता है।

इन पुरस्कारों का निर्णय इफ्फी-51 की अंतर्राष्ट्रीय ज्यूरी द्वारा किया गया है, जिसमें दुनिया भर के प्रबुद्ध फिल्मकार शामिल हैं। इसके अध्यक्ष अर्जेंटीना के निर्देशक पाब्लो सीज़र हैं और ज्यूरी के अन्य सदस्यों में प्रसन्ना विथांगे (श्रीलंका), अबू बकर शौकी (ऑस्ट्रिया), प्रियदर्शन (भारत) और रुबैयत हुसैन (बांग्लादेश) शामिल थे।

ज्यूरी के अध्यक्ष पाब्लो सीज़र ने एक वीडियो संदेश में इस महोत्सव को शुक्रिया अदा किया कि उन्हें इसके इंटरनेशनल कंपटीशन खंड में फिल्मों का मूल्यांकन करने का अवसर दिया गया। उन्होंने कहा, “इस महोत्सव के लिए चुनी गई फिल्मों में प्रदर्शित बहुत विस्तृत और विविध विषयों से हम बहुत खुश हैं, खास तौर पर वो विषय जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता, बच्चों और दुनिया के सभी लोगों के अधिकारों, महिलाओं के सशक्तिकरण और उन चीजों की यादों पर हमें आत्म मंथन करने का मौका देते हैं जो चीजें कुछ लोगों ने की हैं और जिन्हें हम कभी दोबारा होता नहीं देखना चाहेंगे। ऐसी फिल्मों को चुनने के लिए इफ्फी महोत्सव का शुक्रिया जो अपनी विषय वस्तु और सौंदर्य खोज में समृद्ध हैं।”

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