देवालय शब्द दो शब्दों देव और आलय का युग्म है। वह स्थान जहाँ देवता रहते हैं और उनकी पूजा, उपासना की जाती है। यहां आ कर मानव के मन के द्वार खुलते हैं , अहंकार नष्ट हो जाता और मन को बड़ी शांति मिलती हैं। देवालय, सनातन धर्म में प्रार्थना और आध्यात्मिक उन्नति का केंद्र माने जाते हैं। हमारे देश ने संपूर्ण सृष्टि को ईश्वरीय स्वरूप माना गया है। जीव - जंतु, पेड़ - पौधे और प्राणी जिनमें प्राणतत्व निहित हैं वह ब्रह्मस्वरूप परब्रह्म है। इसलिए समस्त दृष्टि को परब्रह्म स्वरूप मान कर किसी न किसी रूप में इसकी पूजा अर्चना की जाती हैं। व्यक्ति अपने
" मैं " का भाव समाप्त कर ईश्वरीय शक्ति में लीन हो कर " हम" बन जाता है।
"वसुधैव कुटुम्बकम्" की नीति को अपनाते हुए सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के अन्तर्गत सनातन धर्म में "मंदिर संस्कृति" संगठन व एकता का प्रतीक है। जहाँ पर समस्त मतभेद विस्मृत कर सर्वसमावेशित, समरसता और सार्वभौमिक कल्याण का भाव प्रकट होता है। इसी कारण मंदिर सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना के केन्द्र होते हैं। सनातन धर्म में "कल्याण मंत्र" में निम्न कामना की गयाहै " सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दुख भाद्भवेत ।।
वहीं एक ओर मंदिर संस्कृति में " प्रसाद और भण्डारा" सामूहिक भोज के कारण समरसता व समानता का प्रतीक है। धार्मिक आयोजन में पूरा समाज एक साथ मिलकर उत्सव, मेले, सत्संग का कार्यक्रम करते है। विभिन्न जाति, वर्ग या लिंग के बंधन से उपर उठकर सनातन धर्म मन्दिर संस्कृति के कारण श्रेष्ठता को प्राप्त होता है। देवी- देवताओं, साधु संतों, तपस्वियों, मुनियों के देश भारत में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक मन्दिर प्राचीन काल से वर्तमान समय तक भारतवासियों की आत्मिक श्रद्धा और आस्था का केंद्र रहे हैं।
धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही हैं। धार्मिक यात्राएं प्राचीन समय से ही प्रचलन में रही हैं। धार्मिक भावनाओं के चलते श्रद्धालु आवागमन के साधनों की कमी की वजह से पैदल यात्रा करते थे। भारतीय संस्कृति के भव्यतम प्रतीक मन्दिर अपनी बेमिसाल कारीगरी से विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का भी प्रबल माध्यम बन गए हैं। श्रद्धालुओं और मंदिरों का नाता कितना गहरा है यह इन पावन स्थानों पर पूरे वर्ष आने वाले दर्शनार्थियों की अपार भीड़ से लगाया जा सकता है। विभिन्न युगों में राजाओं और धर्मालु व्यक्तियों द्वारा बनवाए मन्दिर क्रमिक विकास का परिणाम है जो देश की आजादी के बाद वर्तमान समय तक अनवरत रूप से जारी हैं। आइए, हम देवालय- संस्कृति के क्रमिक विकास पर एक दृष्टि डालते हैं।
देव है तो देवालय का सृजन अपरिहार्य है। ब्रह्म की सगुणता किसी भी रूप में हो सकती है। जैसे मृण- मूर्ति, प्रस्तर मूर्ति, काष्ठ मूर्ति, धातु मूर्ति, साधारण प्रस्तर, पुस्तक, आला, उपासना स्थल, तीर्थ, गुरु, समाधि, कब्र या कोई प्रतीक आदि। जिस रूप भी जहाँ भी देवता की प्राण-प्रतिष्ठा होती है वहीं देवालय है। हिन्दू समुदाय में तो मूर्ति को चिरन्तन अवयस्क न्यायिक व्यक्तित्व के रूप में भी स्वीकार किया गया है। देवत्व का भौतिक स्वरूप ही अधिक कल्याणकारी एवं आनन्ददायक होता है और देव-प्रतिमाओं और देवालयों का पूजन हमारी आधारभूत अध्यात्मिक आवश्यकता रही है। यही कारण है कि मूलतः हम सभी भारतीय मूर्तिपूजक हैं। अन्यान्य धर्म-दर्शनों में पर-ब्रह्म परमेश्वर को सर्वव्यापी माना है। तीर्थ, पीठस्थान, अतिशय क्षेत्र, कुम्भ आदि स्थानों में प्रवेश मात्र से ही पापों का विमोचन हो जाता है। जहाँ की धरा-धूल के 'दरस-परस' से ही अन्तरात्मा तक पवित्र हो जाती है। मन शान्त होकर व्यक्ति ध्यानास्थ हो जाता है और अनायास ही मन ईश्वर साधना के लिए उद्यत हो उठता है। यही वजह है कि जगत् के प्रत्येक सम्प्रदाय में देवालयों, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, पगोड़ा,आदि का प्रावधान है।
पृष्ठ भूमि
महाकाव्य और सूत्र साहित्य में मंदिर की अपेक्षा देवालय, देवायतन, देवकुल, देवगृह आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है। देवालयों का आरम्भिक स्वरूप ऐसा नहीं था जैसा आज हम देखते हैं, यह क्रमिक विकास का परिणाम हैं। देवी देवताओं की पूजा किसी न किसी रूप में प्रचलित रही है। सृष्टि के प्रारम्भ में वृक्षों की पूजा का प्रचलन रहा। कई प्रकार के वृक्षों का पूजन किया जाता था। बड़, पीपल, पाकरी, रसाल, तुलसी, नीम, आकड़ा, खेजड़ी (समी) आदि वृक्ष हमारे आदि देवालय के आरंभिक स्वरूप हैं। हमारी मान्यता है कि आत्माएँ, लौकिक शक्तियाँ आदि इनमें निवास करती हैं। यह वृक्ष आज भी हमारी धार्मिक धरोहर हैं। आज तो हम इनसे भावना द्वारा ही नहीं वरन् भौतिक रूप से भी जुड़ गए हैं। जल, नैवेद्य, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र आदि आज भी हम इन्हें अर्पण कर इनकी अर्चना करते हैं। वृक्षों के साथ ही गिरि- गुफाएँ और चट्टानें आदि अपने प्राकृतिक स्वरूपों में भी देवालय के रूप में पूजित रहे हैं। सबसे प्राचीन हड़प्पा संस्कृति से ही वृक्षों की पूजा का पता चलता है। अति प्राचीन तमिल ग्रंथ अहनानुरू में एक बरगद के पेड़ का वर्णन मिलता है जिसके चारों ओर दीवारें बनी थी। वृक्ष धार्मिक अनुष्ठानों का माध्यम भी होते थे।
हमारे यही आदि देवस्थान समय के अन्तराल के साथ भव्य देवालयों में परिवर्तित हो गए हैं। इस प्रकार देवालय वह स्थान अथवा निर्माण है जिसमें देव अपने किसी न किसी रूप में प्रतिष्ठित है। कठोपनिषद में देवग्रह का मानव देह के रूप में निरूपण किया गया है। मंदिर स्थापत्य को देहरूप में दर्शाते हुए उपनिषदकार ने माना है कि सिर, मंदिर का विमान, कंठ निज मंदिर, उदर मण्डप, उभय चरण- प्रकार, पद गोपुर तथा जीव-देवता है। मंदिर पशत्पर ब्रह्म के सगुण अर्चावतार स्वरूप का आगार है। मंदिर के ऊपरी भाग को विमान संज्ञा प्रदान करने से स्पष्टतया स्व को अध्र्वेन्मुखी ऊर्जा प्रदान करने से आशय है, जो मनोलय की अवस्था का उन्नयन है। किसी भी भू-भाग में मनस्तोष का इतना विशद् आयोजन नहीं देखा जाता जैसा भारत-भूमि में मंदिर संस्था के माध्यम से परिलक्षित है ।
कालांतर में आगे चल कर एक चबूतरे पर देवी देवता को स्थापित कर पूजा जाने लगा। धर्म, आस्था और विश्वास की हमारी आरम्भिक पूजा परमपराएं आज तक निर्बाध रूप से हर समाज में प्रचलित हैं। चबूतरों को लोक चित्रण कला से सुंदर बनाया जाने लगा । मुक्ताकाशी ये स्थान देवताओं के थान, स्थान, कहे जाते हैं। उत्तर और दक्षिण भारत में वृक्षों एवं चबूतरे पर देव पूजा समान रूप से प्रचलन में हैं। धीरे - धीरे मंदिरों की छत का निर्माण शुरू हुआ। जब अलंकरण का प्रयोग शुरू हुआ तो वृक्षों का रूपांकन मंदिरों की शिल्प कला में भी दिखाई देने लगा।
प्राचीन काल में हमारे देश में मंदिरों की स्थापना ही गाँवों, कस्बों और नगरों के आविर्भाव का कारण था। मंदिर निर्माण ही नगर-निर्माण था। हमारे सभी प्राचीन नगरों में मंदिरों की भरमार होना इसी का प्रमाण है। वैसे किसी नगर अथवा मंदिर के सम्बन्ध में आश्वस्त होकर यह नहीं कहा जा सकता है कि लोगों ने आबाद होने के पश्चात् मंदिर बनाया अथवा मंदिर के कारण लोग वहाँ आकर बसे। जयपुर में महाराजा जयसिंह ने अनेक स्थानों पर 'जैसिहपुरा' बसाए जो आज विशाल नगरों में परिर्वार्तत हो गए हैं जैसे नई दिल्ली, बनारस, अयोध्या आदि में। पहले मंदिरों को 'प्रासाद' कहा जाता था, जिसका तात्पर्य देव मंदिर या देवस्थान से था । पुराणों में प्रासाद शब्द का प्रयोग विशाल देवालयों के लिए किया गया है। मानसार एवं कामिकागम दक्षिणात्य ग्रन्थों में 'विमान' शब्द का भी विशिष्ट रूप में प्रयोग हुआ है। यही नहीं मंदिरों की स्थापना लोगों को स्थायी आवास और पलायन के लिए भी प्रेरित करती रही है।
वैदिक काल
वैदिक युग में अग्नि, इंद्र, वरूण, रूद्र, यम, यक्ष, वामन, सूर्य, चन्द्र, विष्णु, पशुपति, महादेव आदि प्रमुख देवता थे। वैदिक काल में मूर्तियों एवं स्थापत्य के कोई अवशेष प्राप्त नहीं हुए है, प्रकृति पूजा का ही विधान था। बिहार के लोरिया नंदनगढ़ से सोने के पत्ते पर अंकिंत एक महिला आकृति को इस काल की माना जा सकता है जो संभवतः पृथ्वी माता अथवा श्री लक्ष्मी की है। उत्तर वैदिक काल वैदिक काल की भांति उत्तर वैदिक काल के साहित्य एवं कुछ जगहों पर मिले अवशेषों से प्रचुर मात्रा में कला विषयक जानकारी प्राप्त होती है। हमारा सूत्र साहित्य, महाकाव्य, बौद्ध - जैन साहित्य, पुराण, शिल्प शास्त्र, कालिदास के काव्यों एवं नाटकों, कल्हन द्वारा रचित राजतरंगिनी, पतंजलि के महाभाष्य, पाणनी की अस्टाध्यायी आदि में कला विषयक सूचनाएं व्यापक रूप से मिलती हैं। इस काल के साहित्य में तीन प्रकार की नागर, द्रविड़ और वेसर शैलियों का उल्लेख मिलता हैं।
उत्तर वैदिक काल
वैदिक काल के बाद 727 ई. पू. से तक शैशु नाक एवं नंद काल में राजाओं, स्त्री एवं पुरुषों की मूर्तियां प्राप्त हुई हैं। मौर्य काल (325 ई. पू. से 185 ई. पू.) चन्द्रगुप्त मौर्य के समय भवनों पर मूर्तियां बनाई जाती थी। चंद्रगुप्त के पौत्र अशोक के समय मूर्ति कला का स्वतंत्र विकास स्तम्भ, विहार, स्तूप और शिलालेख के रूप में साफ दिखाई देता हैं। इनके समय की कृतियां भारत को ही नहीं विश्व को मूर्ति कला के क्षेत्र में उत्कृष्ट देन हैं। सारनाथ का सिंह स्तम्भ भारत की महामुद्रा के रूप में स्वीकार किया गया। इनके समय का सांची का स्तूप अति विशिष्ट है। इस काल की मूर्तियां वाराणसी, पाटलिपुत्र ,मथुरा, अहिच्छत्र, विदिशा ओडिशा, कुरुक्षेत्र एवं मध्यप्रदेश आदि क्षेत्रों के विशाल भू- भाग से प्राप्त हुई हैं।
शुंग काल (188 ई. पू. से 30 ई.) मौर्य काल के अंतिम शासक वृहद्रत को मार कर पुष्यमित्र शुंग ने मध्य भारत पर आधिपत्य कर लिया तथा आगे समस्त उत्तर भारत को अपने राज्य में कर लिया। सांची स्तूप के चारों ओर प्रदक्षिणा की दोहरी वेदिका बनवाई एवं सातवाहन शासकों ने चारों दिशाओं में अलंकृत द्वार बनवाए। इस काल का दूसरा उदाहरण इलाहबाद जबलपुर के मध्य भारहुत स्तूप है। ओडिशा में उदयगिरी और खंडगिरी गुफाएं भी इसी काल में बनी। कुषाण काल (50 ई. से 300 ई.) कुषाण वंश में कनिष्क सबसे शक्तिशाली शासक हुआ जिसने 20 वर्ष शासन किया। वह महायान बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इसने पेशावर और कई स्थानों पर विहार व स्तूप बनवाए । मूर्ति कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण काल रहा। बुद्ध कला में गांधार शैली और मथुरा शैली का उदय हुआ और अनेक मूर्तियां बनाई गई। इसमें मथुरा मूर्ति शैली लोकप्रिय हुई।
आंध्र एवं सातवाहन काल (200 ई.पू. से 300 ई.पू.) उत्तर भारत में जिस समय गांधार और मथुरा शैली का उदय हुआ उसी समय में दक्षिणी भारत में आंध्र शासकों का राज्य था जिन्होंने कला प्रेम के वशीभूत अनेक बौद्ध स्तूपों का निर्माण कराया। इनके समय 200 ई.पू. में अमरावती में विशाल बौद्ध स्तूप बनवाया गया। गुंटूर जिले के नागार्जुन कोंडा में भी सातवाहन ने एक स्तूप का निर्माण कराया। इन दोनों में रोमन कला का प्रभाव पाया जाता है। नाग (भार शिव) वाकाटक काल (185 ई. से 320 ई.) दूसरी शताब्दी ई.पू. में शुंग राज्य के पतन के बाद नाग वंश का उत्थान हुआ। विदिशा नगरी में इनका राज्य था। नाग भार शिव काल में नागर शैली का विकास हुआ।
गुप्त काल
ऐतिहासिक साक्ष्यों से ज्ञात होता है कि हिन्दू मंदिरों का स्वरूप गुप्त काल में सामने आया और इस युग में मन्दिर जैसी संरचना का उदय हुआ। इस समय में मोटी दीवारों पर सपाट छत का एक गर्भगृह बना कर मुख्य देवता की मूर्ति स्थापित की गई और गर्भगृह के चारों ओर परिक्रमा के लिए स्थान रखा गया और बाद में गर्भगृह पर शिखर बना। प्रारंभिक मंदिरों का वास्तु विन्यास बौद्ध बिहारों से प्रभावित था। इनकी छत चपटी तथा इनमें गर्भगृह होता था। मंदिरों में रूप विमान की कल्पना की गई और शिल्पकारों ने मंदिरों को साकार रूप प्रदान करने के साथ ही देहरूप में स्थापित किया।
शिव गुप्त नामक राजा ने 275 ई. के लगभग गुप्त राज्य की नींव डाली। इसके पोत्र चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और उसका पुत्र समुद्रगुप्त दोनों कला प्रेमी थे। इनके काल में चित्रकला, मूर्तिकला और स्थापत्य कला की उन्नति हुई। गुप्त काल में अनेक बौद्ध स्तूप, विहार, स्तम्भ और गुहा मंदिरों का निर्माण किया गया। इस काल की प्रमुख शैलियां मथुरा एवं सारनाथ केंद्रों में देखी जाती हैं। बुद्ध मूर्तियां भी वृहद स्तर पर विभिन्न मुद्राओं में बनवाई गई। गुप्त कालीन प्रमुख मंदिर-गुप्त काल में मंदिर बनाने का विकास प्रारम्भ हो गया था। गुप्त काल स्थापत्य कला, साहित्य और संस्कृति के लिए स्वर्ण युग कहा गया है। इस काल में एरन का विष्णु मदिर मध्यप्रदेश के सागर जिले से 75 किमी की दूरी पर स्थित है। यह गुप्त कालीन महत्वपूर्ण विष्णु मंदिर में से एक है। जिसमें एक विष्णु प्रतिमा की ऊंचाई लगभग 10 फीट है। एक वराह की प्रतिमा जिसके पूरे अंग में चित्रकारी की गयी है और एक गरुड़ स्तम्भहै। महेश्वर और त्रिपुर में पाये गये अवशेषों के समकालीन माना गया है।
भूमरा का शिव मंदिर-भूमरा सतना जिला मध्यप्रदेश में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 5 वी शताब्दी का माना जाता है। इसमें एक मुखी शिवलिंग स्थापित है। साँची का मंदिर ये मदिर गुप्तकाल का मदिर है और भारत के प्राचीन मंदिर में से एक है इस मदिर की खोज ब्रिटिश अफसर टेलर ने 1818 ई में की थी। इसे उदयगिरी के गुफाओं के समकालीन माना जाता है। इसका निर्माण चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य द्वितीय के समय किया गया था। मध्यप्रदेश के सतना जिले के पिपरिया में विष्णु मंदिर, जबलपुर जिले के तिगवा में विष्णु मंदिर एवं पन्ना जिले के कुठार में पार्वती मंदिर गुप्त कालीन हैं। देवगढ़ का दशावतार मंदिर-देवगढ़ की दशावतार मंदिर देवगढ़ जिला ललितपुर उत्तर प्रदेश में स्थित है। देवगढ़ बेतवा नदी के तट पर स्थित है। ये मंदिर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक माना जाता है। जिसमें भगवान विष्णु के पूरे दस अवतार को अलग-अलग शिल्प के रूप में उकेरा गया है। मंदिर वास्तु और शिल्प कला का मत्वपूर्ण उदहारण है। मंदिर के द्वार पर गंगा-जमुना की नक्काशी की गयी है। यहाँ की मूर्तियों में प्राचीन भारतीय धर्म के सभी चिन्हों को उकेरा गया है जिसमे शंख, कमल, हाथी को चित्रित किया गया है। यह मंदिर लगभग 6 टी सदी का माना गया है। खोह का शिव मंदिर-मध्यप्रदेश में सतना जिला के उचेहरा तहसील में खोह एक प्राचीन गाँव है। जहाँ पर गुप्त कालीन शिव मंदिर और ताम्रपत्र प्राप्त हुए हैं। ये मंदिर गुप्त कालीन स्थापत्य कला के लिए महत्वपूर्ण है। यहाँ कुल 8 दानपात्र प्राप्त हुए हैं जिसमें ब्राह्मणों को दिए गए दान का उल्लेख मिलता है।
मणिनाग मंदिर राजगीर बिहार के नालन्दा जिले में स्थित है। इस मंदिर का अति प्राचीन इतिहास बताया जाता है एवं मंदिर को महाभारत काल जोड़ा जाता है। यहाँ पर महाभारत काल में जारासंध पूजा किया करते थे। इसे पहले नागों का तीर्थ माना जाता था। खुदाई से भी नागों के फनकी प्रतिमाओं के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ एक मणिनाग का मंदिर है। इस काल का भीतरगाँव का कृष्ण मंदिर उत्तरप्रदेश के कानपुर जिले में गुप्तकालीन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है यह मंदिर ईंटों से बना है ।
मुकुंदरा मन्दिर राजस्थान के कोटा झालावाड़ मार्ग पर कोटा जिले में स्थित है। भीम की चौरी के नाम से प्रसिद्ध मन्दिर के केवल कुछ भग्नावशेष रह गए हैं। अद्भुत झल्लरी वादक प्रतिमा कोटा संग्रहालय में सुरक्षित है। कोटा से 30 किमी. दूर चारचौमा महादेव गुप्त कालीन मन्दिर है। इसका चतुर्मुख शिवलिंग अद्भुत है। सिरपुर का मंदिर सिरपुर जिला - महासमुंद छत्तीसगढ़ में स्थित है। इसे गुप्त कालीन समय का साक्ष्य माना जाता है। इस मंदिर का निर्माण वासटा देवी ने अपने पति हर्षगुप्त की याद में बनवाया था।
पूर्व मध्यकाल
गुप्त साम्राज्य के बाद भारत में कोई स्थाई साम्राज्य स्थापित नहीं हो सका। सारे मध्यकाल में कन्नोज के शासक हर्षवर्धन ने (630 ई. से 647 ई.) तक सुदृढ शासन स्थापित किया। पूर्व मध्य काल में चालुक्य कालीन कला के बादामी, अयहोल, पत्तदकल, महाकुट, राष्ट्रकूट कालीन कला के एलोरा, एलीफेंटा, कन्हेरी और पल्लव कालीन कला के मामलपुरम तक सीमित रही प्रमुख केंद्र रहे हैं।
उत्तर मध्यकाल
उत्तर मध्यकाल में मन्दिर स्थापत्य विकास का वैभव अपने चरम पर था। इस काल के ओडिशा मंडल में कोर्णाक, पुरी के मन्दिर और भुवनेश्वर में लिंगराज, मुक्तेश्वर, परशुराम, राजरानी प्रमुख मन्दिर हैं। बुंदेलखंड में चंदेल - हर्ष देव - यशोवर्धन घंग शासकों के खजुराहो में शैव, वैष्णव, शाक्त एवं जैन मंदिर मुख्य हैं। मध्य भारत में प्रतिहार, परमार, कल्चुरी शासकों के ग्वालियर का सास बहू मन्दिर, नीलकंठ या उद्येश्वर मन्दिर एवं जबलपुर का चौसठ योगिनी मंदिर प्रमुख हैं। राजस्थान में गुजरात सीमा पर आबू पर्वत पर सोलंकी (चालुक्य) शिल्प का चमत्कार देलवाड़ा के विमलवसही और लूनवसही मंदिरों में देखा जा सकता है। चित्तौड़गढ़ में कालिका माता, कुम्भा स्वामी, समधिश्वर, उदयपुर जिले में जगत का अंबिका मन्दिर, नागदा का सास - बहू मन्दिर, उन्वास का दुर्गा मन्दिर, जोधपुर जिले में ओंसियां, बुचकेला और मंडोर मंदिर, जयपुर जिले में बांदीकुई से 7 किमी. दूर आभानेरी मन्दिर, बाड़मेर का किराडू मन्दिर, सीकर का हर्षनाथ मन्दिर, पाली जिले का रणकपुर मन्दिर, कोटा - चित्तौड़ जिलों की सीमा पर बड़ोली का मन्दिर, झालावाड़ जिले में चंद्रभागा नदी किनारे भग्न शिव मन्दिर और अलवर जिले के पहाड़ नगर में नील कंठेश्वर मन्दिर उत्तर मध्यकालीन समय के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। जैसलमेर दुर्ग में 15-16 वीं शताब्दी में लक्ष्मीनाथ जी के विशाल मंदिर के साथ-साथ आठ जैन मंदिर बनवाये गये। बीकानेर में भांड़ासर मंदिर भी इनके समकालीन मंदिर है। 18वीं शताब्दी में नायद्वारा, कांकरोली, जोधपुर एवं बीकानेर में वल्लभ संप्रदाय के मंदिर बनाये गये तथा 19वीं शताब्दी में अजमेर के पुष्कर में निर्मित रंगनाथ जी का मंदिर राजस्थान में दक्षिण शैली का प्रतिनिधी मंदिर है।
तमिल- दक्षिण शिल्प
उत्तर मध्यकालीन समय में तमिल में द्रविड़ शैली में मंदिरों का निर्माण कराया गया। यहां चौल राजवंश (850 ई. से 1267 ई.) तक के समय में तंजोर का शिव वृहदेश्वर मंदिर और गनगेकोंड चौलपुरम मन्दिर महत्वपूर्ण निर्माण हैं। तमिलनाडु के अर्काट जिले में चिदम्बरम का नटराज मन्दिर, दासुरम में एरावतेश्वर मन्दिर एवं जैन कला का गोमतेश्वर बाहुबली भी उल्लेखनीय मन्दिर बनाए गए। होयसल राजवंश (1100 ई.से 1310 ई.) तक के समय में मैसूर के आस पास क्षेत्रों में वेलूर, सोमनाथपुर और हेलविद के मन्दिर बनाए गए। इस काल में विष्णुवर्धन शासक के समय कला का विकास हुआ। काकतीय राजवंश 11वीं से 13 वीं ई. के मध्य वारंगल में सहस्त्र स्तम्भ मन्दिर और पालमपेट में रामाप्पा मन्दिर बनवाए गए। पल्लवों के समकालीन यहां (1100 ई.से 1350 ई.) तक पांडेय एवं चेर वंश के समय मदुरई राजधानी बनाई गई। इनके समय में मंदिरों के चारों और ऊंची दीवारों और विशाल आकर के भव्य प्रवेश द्वारों (गोपुरम) का निर्माण किया गया। कई मंदिरों में मूर्तियां बनवाई गई। विजयनगर साम्राज्य (1330 ई. से 1565 ई.) के काल में हम्पी के महान कलात्मक एवं अति अलंकृत मंदिरों का निर्माण किया गया। कृष्णदेव राय इस वंश में कला प्रिय शासक हुए। विष्णु का विठल स्वामी और राम का हजारा राम महत्वपूर्ण हैं। इसके पश्चात (1600 ई. से 1700 ई.) तक नायक राजवंश काल में मन्दिर निर्माण में मदुरै शैली विकसित हुई और करीब 30 मन्दिर इस शैली के बनवाए गए। सभी मंदिरों में मंडपों, गोपुरों, विमानों पर उत्कीर्ण शिल्पकृतियां अलंकरण प्रधान हैं। इस काल के मीनाक्षी सुंदरेश्वर, श्रीरंगम, जम्बू केश्वर, तिरुवनन मलाई, तिरुवल्लूर, रामेश्वरम, चिदम्बरम, तिन्वेली एवं श्री वेलकीपुत्तुर प्रमुख उल्लेखनीय मन्दिर माने जाते हैं।
पर्वतीय क्षेत्रों के मंदिर
उत्तर मध्यकालीन काल में उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक देवी - देवताओं के सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया गया। कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, गढ़वाल, असम, उत्तरप्रदेश एवं उत्तराखंड आदि पहाड़ी क्षेत्रों में बनाए गए मंदिरों की कला भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पृष्टभूमि के कारण भिन्न प्रकृति की है। कश्मीर में श्रीनगर के समीप मार्तंड सूर्य मन्दिर शिल्प कला का भव्यतम प्रतीक आज ध्वस्त स्थिति में भी दर्शनीय है। मंदिर का निर्माण सूर्य वंश के राजा ललितादित्य मुक्तापीड ने करवाया था। मार्तंड मंदिर का निर्माण भगवान सूर्य की उपासना के लिए करवाया गया था। मंदिर अपनी स्थापत्य कला, सुंदरता के लिए मशहूर है। वृहत प्रांगण, स्तम्भ, द्वार मंडप एवं चतुर्दिक लगभग 84 प्रकोष्ठों के अवशेष देखे जा सकते हैं। मार्तंड सूर्य मंदिर को कश्मीरी वास्तु शैली का अनुपम और संभवतः एकमात्र उदाहरण माना जाता है। अवंतिपुर में अवंतिश्वर एवं अवंतिस्वामी के मंदिरों में अवंतिस्वामी मन्दिर अभी सही स्थिति में है।
12वीं शताब्दी के बाद उत्तर भारत की मूर्ति एवं मन्दिर निर्माण कला धीरे सल्तनत कालीन और मुगल कालीन शासन व्यवस्था रहने से मंदिरों का निर्माण ठहर गया, इसके उलट हिंदू मंदिरों को क्षति पहुंचाई गई। इस काल में मुस्लिम कला का विकास हुआ। मुगलों के समय मुगल -राजपूत मिश्रित स्थापत्य शैली का विकास हुआ। देश में ब्रिटिश शासन की जड़े जमने के बाद उनके समय में इतावली और गोथिक शैली के भवनों का निर्माण कराया गया। देश की आजादी के बाद धर्मावलंबियों एवं धार्मिक ट्रस्टों के माध्यम से अनेक मंदिरों का निर्माण किया गया और यह क्रम निरन्तर जारी है।
मन्दिर निर्माण शैलियाँ
स्तूपों के निर्माण के साथ ही हिन्दू मन्दिरों का मुक्त ढांचों के रूप में निर्माण भी आरम्भ हो गया था। हिन्दू मन्दिरों में देवताओं की विषय वस्तु के रूप में पौराणिक कथाएं हुआ करती थीं। भारतीय उपमहाद्वीप तथा विश्व के अन्य भागों में स्थित मन्दिर विभिन्न शैलियों में निर्मित हुए हैं। मंदिरों की कुछ प्रमुख शैलियाँ इस प्रकार हैं-नागर शैली का प्रसार हिमालय से लेकर विंध्य पर्वत माला तक देखा जा सकता है।
वास्तुशास्त्र के अनुसार नागर शैली के मंदिरों की पहचान आधार से लेकर सर्वोच्च अंश तक इसका चतुष्कोण होना है। विकसित नागर मंदिर में गर्भगृह, उसके समक्ष क्रमशः अन्तराल, मण्डप तथा अर्द्धमण्डप बने होते हैं। एक ही अक्ष पर एक दूसरे से संलग्न इन भागों का निर्माण किया जाता है। द्रविड़ शैली दक्षिण भारत में विकसित होने के कारण द्रविड शैली कहला ई गई। इसमें मंदिर का आधार भाग वर्गाकार होता है तथा गर्भगृह के उपर का भाग पिरामिडनुमा सीधा होता है, जिसमें अनेक मंजिलें होती हैं। इस शैली के मंदिरों की प्रमुख विशेषता है कि ये काफी ऊँचे तथा विशाल प्रांगण से घिरे होते हैं। प्रांगण में छोटे-बड़े अनेक मंदिर, कक्ष तथा जलकुण्ड होते हैं। प्रागंण का मुख्य प्रवेश गोपुरम कहलाता है। चोल काल के मंदिर द्रविड़ शैली के सर्वश्रेष्ठ प्रमाण है। वेसर शैली इसका शाब्दिक अर्थ है मिश्रित शैली। नागर और द्रविड़ शैली के मिश्रित रूप को वेसर की संज्ञा दी गई है। यह विन्यास में द्रविड़ शैली तथा रूप में नागर शैली के समान होती है। दो विभिन्न शैलियों के कारण उत्तर और दक्षिण के विस्तृत क्षेत्र के बीच सतह एक क्षेत्र बन गया जहां इनके मिश्रित रूप में बेसर शैली विकसित हुई। इस शैली के मंदिर विंध्य पर्वतमाला से कृष्णा नदी तक निर्मित है।
पगोडा शैली नेपाल और इण्डोनेशिया का बाली टापू में प्रचलित हिन्दू मंदिर स्थापत्य शैली है। इस शैली में छतों का शृंखला अनुलम्बित रूप में एक के उपर रहता है। अधिकांश गर्भगृह भूतल स्तर में रहता है। परन्तु कुछ मन्दिर (उदाहरण स्वरूप काठमांडू का आकाश भैरव और भीमसेनस्थान मन्दिर) में गर्भगृह दूसरी मंजिल में स्थापित है। इस शैली में निर्मित प्रसिद्ध नेपाल का पशुपतिनाथ एवं बाली का पुरा बेसाकि प्रमुख मन्दिर हैं। सन्धार शैली के मन्दिरों में वर्गाकार गर्भ गृह को घेरे हुए एक स्तंभों वाली वीथिका (गैलरी) होती थी। इस वीथिका का उद्देश्य गर्भ गृह की प्रदक्षिणा था। इस प्रकार सन्धार शैली में प्रदक्षिणा पथ होता है जबकि निरन्धार शैली के मन्दिरों में प्रक्षिणा पथ नहीं होता है। सर्वतोभद्र शैली के मन्दिरों में चार प्रवेशद्वार होते हैं जो चारों मुख्य दिशाओ में होते हैं। इसको घेरे हुए 12 स्तंभों वाला प्रदक्षिणापथ होता है। इस प्रकार के मन्दिरों में सभी दिशाओं से प्रवेश किया जा सकता है। भारत जैसे विशाल देश में जहाँ विभिन्न धर्मो के लोग निवास करते हैं और लाखों मंदिरों में पूजा-अर्वना की जाती है। समस्त मंदिरों को एक पुस्तक में लिपिद्ध करना किचिंत भी संभव नहीं है।
देवालय का अंग विन्यास :
मोटे रूप में देवालयों के अंगों को चार भागों में विभाजित किया जाता है। विमान अथवा बड़ा देवल देवता के विराजने का स्थान । जगमोहन, वह स्थान जहाँ भक्तगण दर्शनार्थ एकत्र होते हैं। नट मंदिर, दैव-स्तुति हेतु नृत्य स्थान । भोग मण्डप, नैवेद्य सुरक्षित रखने का स्थान । इन मुख्य अंगों के साथ - साथ निर्माण एवं सूक्ष्म-निरूपण हेतु देवालय के विविध अंगों को नीचे दिए गए प्रकार से भी विभाजित किया गया है । नीचे-ऊपर की ओर ऊर्ध्वाधर रूप से जगती (पीठ), वेदी (कुर्सी), जंघा, कपोतावली , शिखर, ग्रीवा, अमलक, कुम्भ शूल। अनुप्रस्त रूप से गर्भगृह, अन्तर-प्रदाक्षिणा-पथ, अन्तराल,अर्ध मण्डप और मण्डप। देवालय के प्रत्येक अंग का उसका अपना महत्व और अपना प्रभाव है। मुख्य वेदी, मण्डप, गवाक्ष, गर्भगृह, शिखर, ध्वजादण्ड आदि प्रत्येक मंदिर के मुख्य अंग होते हैं। मंदिरों के मुख्य द्वार पर शेर, हाथी, वृषभ आदि की विशाल प्रतिमाएँ भी स्थापित की जाती हैं। मंदिरों के निर्माण में धर्म, दर्शन एवं आध्यात्मिक तत्वों को मंदिर के शिल्प की तुलना में अधिक महत्व दिया जाता है। अनेक मंदिरों में अद्वितीय शिल्प-कौशल की प्रधानता है। धार्मिक आख्यानों, काम-कला, युद्ध, नृत्य, वाद्य-यंत्र, नारी-सौष्ठव आदि का मंदिर की बाह्य प्राचीरों पर मूर्तियों के माध्यम से इतना सजीव चित्रण उकेरा गया है कि दर्शक आत्म-विभोर हो ठगा-सा रह जाता है। राजस्थान में हवेली शैली के भी अनेक देवालय पाए जाते हैं। मूर्ति-भंजकों की विनाश-लीला से दैव मूर्तियों को सुरक्षित रखने हेतु सम्भवतः ऐसे मंदिर बनाए गए थे। अन्यथा नागर शैली के देवालयों की ही प्रधानता है।
देव - विग्रह प्रकल्पन :
देवालयों में दैव-विग्रहों के प्रकल्पन के अनेक वर्ग किए जा सकते हैं। एक प्रधान देवता की प्रतिमा एक प्रधान देवता के विविध रूपों में अलग-अलग विग्रह । प्रधान देवता की युगल प्रतिमाएँ । प्रधान देवता एवं उसके परिवार के अन्य देवी-देवता । एक ही मंदिर परिसर में, मुख्य मंदिर में प्रधान प्रतिमा एवं अन्य लघु देवालयों में उसी मत से सम्बद्ध अन्य दैव-प्रतिमाएँ । एक ही मंदिर में अथवा उसके उप-मंदिरों में नाना-वर्गीय दैव-प्रतिमाएँ, जैसे- शिव-पार्वती के साथ यक्ष, गंधर्व, अप्सराएँ, ऋषि-मुनि आदि ।
मिथुन मूर्तियाँ :
देवालय के संदर्भ में उनकी दीवारों पर उत्कीर्ण मिथुन मूर्तियों पर भी चर्चा आवश्यक हो जाती है। कई देवालयों पर भक्तिप्रधान देवी - देवता, सामान्य जनजीवन, पशु पक्षियों, गायन, वादन, आदि मूर्तियों के साथ विलासितापूर्ण कामुक और मिथुन मूर्तियां का शिल्पांकन किया गया है। विचार किया जाए तो कामकला का प्रदर्शन करती मूर्तियां हमारे देनंदनीय प्रेमक्रीड़ा को ही दर्शाती हैं जो व्यवहारिक रूप में प्रचलित है। प्रेम, विपरीत लिंग आकर्षण, नारी और पुरुष देह का मिलन, लैंगिक आनंद स्वाभाविक वृति है। इसमें कुछ भी अश्लीलता नहीं है। हमारी सामाजिक व्यवस्था में जन्म के साथ परण अर्थात विवाह, वंश वृद्धि और सृष्टि संचालन के लिए संतान प्राप्ति का महत्व है। संतान प्राप्ति के लिए नारी और पुरुष का मिलन अपरिहार्य है। प्रकृति प्रदत नारी अपने को सुंदर दिखने और पुरुष को रिझाने के लिए कई प्रकार शृंगार करती है। सोलह शृंगार की अवधारणा में मांग भरना, टीका लगाना, दर्पण में निहारना, अनेक प्रकार केश संवारना, वस्त्र आभूषण धारण करना आदि नारी सुंदरता के प्रतीक माने गए हैं। ये सब भी कामकला के हिस्से हैं।
वात्स्यायन ने कामकला पर पूरी पुस्तक लिखी। साहित्यिक उद्धरणों में अनेक वृतांत है। फिर मूर्तियाँ को कामुक कहना उचित प्रतीत नहीं होता। कामकला का मिथुन, सहवास एक ऐसा पक्ष है जो निजता लिए हैं और सार्वजनिक नहीं है। जब की मंदिरों पर इसका अंकन सार्वजनिक होने से विवादित हो जाता है परन्तु पर्यटकों के लिए आनंद का विषय बन जाता है।
कामकला की मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों में ऐसी मूर्तियों की बाहुल्यता होने से घरेलू ही नहीं विदेशी पर्यटक भी खूब आते हैं। इन मूर्तियों की वजह से इन मंदिरों का पर्यटकों का स्वर्ग कहा जाता है। देश के अनेक अन्य मंदिरों में जो 8 वीं से 12 वीं शताब्दी के मध्य निर्मित हुए उनमें कम या ज्यादा मात्रा में ये मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों में कई मुद्राओं में रति-क्रीड़ा सोमपान करता युगल, केश सँवारती युवती, रूप-सज्जारत युवती, आनन्दन मुद्रा में युगल आदि उत्कीर्ण हैं।
पुरातत्वविद् डॉ.अमलानन्द घोष का मानना है कि "सभी धर्मों की मूर्तिकला में मिथुन मूर्तियाँ सामान्य रूप से पाई जाती हैं। लगभग सभी कला-पूर्ण देवालयों में नग्न कामुकता सहित स्नेहाकर्षणयुक्त दृश्यों का चित्रण एक सामान्य-सी बात है।"खासियत यह भी है कि इन मूर्तियों को देखते समय कुछ भी अश्लील भाव पैदा नहीं होता है। मंदिरों के बाहर मुख्य द्वार और दीवारों पर इन्हें उत्कीर्ण करने का उद्देश्य यह भी रहा होगा कि जब कोई भी व्यक्ति मंदिर में प्रवेश करे तो वह बाह्य जगत के सभी सांसारिकता को भूला कर पवित्र और शांत मन से जाए। इन मूर्तियों का शिल्प कला
बेमिसाल है। कारीगरों में बहुत ही सूक्ष्मता से तराशा हैं और सौंदर्य प्रभाव उत्पन्न करने में सफल रहे हैं। कह सकते हैं ये मूर्तियाँ भी हमारे जीवन दर्शन का ही प्रतीक हैं।
देवालयों का महत्व :
धार्मिक आस्था से जुड़े देवालयों का कई अन्य प्रकार से महत्व है। देव-दर्शन के अतिरिक्त महिलाएँ एवं पुरुष अपने दृष्टिकोण एवं विचारों का आदान प्रदान करते हैं; समस्याओं पर विमर्श करते हैं और हल खोजते हैं। पाप - पुण्य, दान धर्म पर विमर्श करते हैं। धार्मिक कथाएं, प्रसंग और आख्यान, धार्मिक स्थानों, धार्मिक यात्राओं, अपने धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों की भौतिक अभिव्यक्ति एवं धर्म प्रचार
पर चर्चा करते हैं।
देवालयों का महत्व धर्म, दर्शन, व्याकरण, साहित्य, वेदाध्ययन,नैतिकता, नीतिशास्त्र, पूजा-विधान, मंदिर-निर्माण कला आदि के अध्ययन-अध्यापन और ज्ञानार्जन के लिए भी है। शिक्षा के लिए पाठशाला, स्वास्थ्य के लिए चिकित्सालय, सामाजिक क्रिया-कलापों, मंदिर व्यवस्था पर निर्भर पुजारी, जलघड़िया, रसोइया, भीतरिया, झापटिया, माली,कीर्तनिया, वादक, मशालची व अन्य गरीबों, भिखारियों, विकलांगों के जीवन-निर्वाह हेतु भी इनका बड़ा महत्व है। दान में प्राप्त घी-तेल, आटा-दाल, कपड़े-बर्तन, धन आदि का सदुपयोग करना।
आपात काल में मंदिर में चढ़ावे के रूप में प्राप्त राशि का उपयोग किया जाता है। विगत दिनों में जन देश में कोविड़ जैसी भयंकर महामारी का प्रकोप हुआ तब उस समय अमीर मंदिरों के प्रशासन ने मुक्त हस्त से प्राप्त दान राशि के ख़ज़ाने खोल कर दान धर्म का वास्तविक अर्थ को साकार किया। पहले जब अकाल पड़ते थे उस समय भी इस राशि से सहायता की जाती थी। मंदिर को भेंट की गई राशि कर मुक्त होने से लोगों को बड़ी राहत मिलती है, जिसका उपयोग विषम परिस्थितियों में किया जाता है।
देवालयों का मानवता की भलाई के लिए एक ओर इतना बड़ा महत्व है, वहीं दूसरी ओर देव - दर्शन का तेजी से बढ़ता व्यवसायीकरण मंदिर संस्कृति पर बड़ा प्रश्न चिन्ह है। आज अनेक पुजारियों की दृष्टि भक्त पर कम, भक्त की जेब से निकले चढ़ावे की राशि पर अधिक रहती है। कई देवालयों में पुजारी कह भी डालता है, 'कुछ हो तो चढ़ाइए ।' कुछ मंदिरों में पूजा-अर्चना करने हेतु बोली लगती है। जिसकी बोली अधिक होती है पूजा का अवसर उसी को दिया जाता है। अनेक देवालयों में वी.आई.पी. सेवा अलग से आयोजित की जाती है। देवालयों की यह 'दुकानदारी' उन स्थानों पर और भी अच्छी चलती है जो दुर्गम हैं और महत्वपूर्ण पर्यटन-केन्द्र भी हैं।
देवालय हमारी सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर के गौरवमयी प्रतीक हैं, जो अतीत में हमारी सर्वमुखी सम्पन्नता के कीतिस्तम्भ हैं। इन्हें अक्षुण्ण बनाए रखना हमारा मूलभूत दायित्व है; क्योंकि मनुष्य की कीर्ति को स्थायित्व प्रदान करने वाली वस्तु या तो उसका इतिहास है या ऐसे ही कीर्ति स्तम्भ । हमें मंदिरों में बढ़ती व्यवसायीकरण की वृति पर रोक लगाने पर भी गंभीरता से विचार करना होगा।






