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खतरनाक हो सकती है, पीने के काम आती स्‍ट्रा

रोजमर्रा के जीवन में उपयोग की जाने वाली प्लास्टिक से बनी मामूली नली यानि स्‍ट्रा हमारे जीवन को कैसे प्रभावित कर सकती है? क्‍या कम वजन के कारण ‘री-साइकल’ नहीं हो पाने से स्‍ट्रा प्रदूषण में इजाफा भी करती है? इसकी बजाए सीधे बर्तनों से पेय ग्रहण करना क्‍या हमें कई तरह के खतरों से नहीं बचा सकता?

साठ के दशक में प्लास्टिक से बने स्ट्रा बाजार में आये एवं इसके बाद बहुत ही कम समय में इनका उपयोग बहुतायत से होने लगा। स्ट्रा एक बार उपयोग में लायी जाने वाली प्लास्टिक की वस्तुओं में प्रमुख है। फलों का रस, नारियल पानी, शीतल पेय एवं अन्य प्रकार के पेय पदार्थों में स्ट्रा का उपयोग जमकर किया जा रहा है। अमेरीका में लगभग 50 करोड़ स्ट्रा रोजाना कचरे के रूप में फेंकी जाती हैं। हमारे देश के केरल राज्य में भी 33 लाख स्ट्रा प्रतिदिन उपयोग में लाई जाती हैं। विश्व में स्ट्रा का व्यापार लगभग 1200 करोड़ रूपये सालाना का होता है। प्लास्टिक के स्ट्रा के पहले अमेरिका के मार्विन सी. स्टोन ने 1888 में कागज से स्ट्रा बनाकर पेटेंट लिया था। कागज के स्ट्रा जल्दी गलने के कारण ज्यादा सुविधाजनक नहीं रहे एवं इसीलिए इनका बाजार ठंडा रहा। कुछ लोगों का यह भी मत था कि कागज पेड़ों से प्राप्त लकड़ी की लुगदी से बनाया जाता है अतः कागज के स्ट्रा पेड़ों के लिए खतरनाक हैं।

वर्तमान में उपयोगी प्लास्टिक के स्ट्रा बहुत ही हल्के होने से इनका रिसायकलिंग नहीं होता। पर्यावरण में जो प्रदूषण फैलता है उसमें स्ट्रा की भागीदारी लगभग 8 से 10 प्रतिशत आंकी गयी है। प्लास्टिक से बने स्ट्रा का उपयोग जन-स्वस्थ्य एवं पर्यावरण के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि स्ट्रा से पेय पीने के दौरान मुंह को बार-बार फैलाना एवं सिकोड़ना पड़ता है जिससे चेहरे पर झुर्रियां पड़ने की सम्भावना काफी बढ़ जाती है। इसके साथ ही पेय पदार्थ मजा लेकर स्‍ट्रा से धीरे-धीरे पीने से दांतों के सम्पर्क में आकर उनके इनेमल पर विपरीत प्रभाव डालता है। इनेमल दांतों की बाहरी कठोर परत होती है। कुछ पेय पदार्थों की क्रिया से स्ट्रा में उपस्थित रसायन आहार नली को हानि पहुंचाते हैं। स्ट्रा वास्तव में पेट्रोलियम इंडस्ट्री का सह-उत्पाद (बाय प्रोडक्ट) है एवं पाली-प्रोपिलीन रसायन का बना होता है।

रिसायकलिंग नहीं होने के कारण स्‍ट्रा कचरे के साथ मिट्टी एवं जल को प्रदूषित कर जानवरों के लिए भी खतरा बन जाते हैं। मीठे पेय पदार्थों में उपयोगी स्ट्रा में फेकने के बाद भी मिठास बनी रहती है। इस मिठास से आकर्षित होकर कई चौपाये इन्हें खा जाते हैं जो बाद में उनके लिए घातक सिद्ध होता है। कचरे में फेंके गये स्ट्रा कई माध्यमों से समुद्र में पहुंचकर वहां के प्राणियों के नथुनों में फंस जाते हैं। समुद्री पक्षी, सील-मछली, व्हेल, डाल्फीन एवं कछुओं पर स्ट्रा के खतरे ज्यादा देखे गये हैं। समुद्र में पाये जाने वाले पांच प्रमुख कचरों में स्ट्रा प्रमुख है। समुद्री जीव वैज्ञानिक प्रोफेसर क्रिस्टीन फिगेनट ने वर्ष 2015 में कोस्टारिका में एक समुद्री कछुए की नाक में फंसा स्ट्रा निकाला जिससे काफी खून बहा एवं वह घायल हो गया। इसका वीडियो जब वायरल हुआ तो लोगों ने यह दर्दनाक घटना देखी। इसे देखकर लोगों में थोड़ी जागरूकता आयी एवं स्ट्रा के उपयोग को घटाने पर सोचा जाने लगा। प्लास्टिक से पैदा खतरों पर ध्यान दिया जाने लगा एवं एकल उपयोग (सिंगल यूज) प्लास्टिक के सामान के उपयोग पर कई देशों में रोक लगायी गई एवं कई देश रोक लगाने के लिए प्रयासरत है।

‘मेकडोनाल्ड कंपनी’ ने चीन में शीतल पेय पदार्थों के साथ स्‍ट्रा के उपयोग पर 2015 में प्रतिबंध लगाया था। विश्व में 28 हजार आउटलेट चलाने वाली कम्पनी ‘स्टार ज्‍वाइंट स्टार बाक्स’ ने जुलाई 18 से स्ट्रा के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है। कनाड़ा की एक फास्ट फूड बेचने वाली कम्पनी ‘ए एंड डब्ल्यू’ ने भी अपने होटल में स्ट्रा का उपयोग प्रतिबंधित किया है। हमारे देश में प्रधानमंत्री ने एकल उपयोगी प्लास्टिक वस्तुओं का उपयोग नहीं करने का आव्हान किया है। इसके सकारात्मक प्रभाव भी देखने में आ रहे है। कई पर्यावरणविदों ने सुझाव दिया है कि सीधे ग्लास या कप से पेय पदार्थ पीये जाएं। गणना करके यह भी बताया गया है कि एक व्यक्ति यदि पेय पदार्थ पीने के लिए ग्लास या कप का उपयोग करे तो एक वर्ष में 500 स्ट्रा समुद्र में पहुंचने से रूक सकते हैं। वैश्विक स्तर पर ‘टेक द लास्ट स्ट्रा चेलेंज’ नामक एक अभियान भी चलाया जा रहा है जो स्ट्रा के उपयोग को हतोत्साहित करता है।

प्लास्टिक स्ट्रा के विकल्प लाने हेतु भी प्रयास किये जा रहे हैं। हमारे देश के तमिलनाडु में नारियल पानी पिलाने हेतु पपीते की पत्तियों के डंठलों को सुखाकर एवं साफ कर स्ट्रा की भांति उपयोग किया जा रहा है। ‘फेडरशन आफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन’ के सलाहकार वायएस गर्ग मुरादाबाद में एक कारखाने में गेहू की खोखली बाल से स्ट्रा बना रहे हैं जो काटने के बाद बची रहती है। बैगलुरू स्थित ‘क्राइस्ट विश्‍वविद्यालय’ के प्रोफेसर साजी वर्गीज ने नारियल की सूखी पत्तियों से स्ट्रा बनाकर मई में पेटेंट भी ले लिया है। इस नवाचार हेतु उन्हें कई सम्मान भी मिले हैं। ऐसे प्रयास प्लास्टिक स्ट्रा की समस्या कम करके रोजगार भी प्रदान करेंगे। (साभार- https://www.spsmedia.in/ सप्रेस)

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