निरुक्त का लिखा समीक्षात्मक संस्करण
निरुक्त कोई साधारण ग्रंथ नहीं है, यह वेदों की व्याख्या करने का विज्ञान है. डॉ सरूप ने न केवल इस जटिल ग्रंथ का अंग्रेजी में अनुवाद किया, बल्कि उन्होंने इसका एक ‘समीक्षात्मक संस्करण’ (Critical Edition) भी तैयार किया. उन्होंने दुनिया को यह सिद्ध करके दिखाया कि प्राचीन भारत में भाषा विज्ञान और शब्दों की उत्पत्ति का विज्ञान (Etymology) आधुनिक पश्चिमी विज्ञान से कहीं ज्यादा विकसित और सटीक था. उनके शोध ने प्राचीन भारत और यूनान के भाषाई योगदान के बीच एक तुलनात्मक सेतु बनाने का काम किया. उनके शोध का मार्गदर्शन प्रसिद्ध ब्रिटिश विद्वान आर्थर एंथनी मैकडोनेल ने किया था. डॉ सरूप के कार्य ने यह साबित किया कि भारत में भाषा विज्ञान की परंपरा हजारों साल पुरानी और बेहद व्यवस्थित है. उनके इस कार्य को आज भी भाषा विज्ञान के क्षेत्र में एक क्लासिक माना जाता है.
विदेश से पीएचडी करने वाला पहला भारतीय जिसने संस्कृत के ग्रंथों पर किया था शोध

क्या आप जानते हैं कि विदेशी यूनिवर्सिटी से डॉक्टरेट की डिग्री हासिल करने वाले पहले भारतीय कौन थे? उन्होंने संस्कृत के ग्रंथों पर शोध किया था. लेकिन उनका नाम बहुत कम लोगों को पता है. वो थे डॉ लक्ष्मण सरूप, जिन्होंने 1919 में ऑक्सफोर्ड से संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों 'निरुक्त' पर शोध कर इतिहास रचा था. भारत के पहले शख्स, जिन्होंने न सिर्फ विदेश से पीएचडी की, बल्कि ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी के भी पहले शोधार्थी बने.
दुनियाभर में जब भी हम विदेशी शिक्षा और भारतीय विद्वानों की बात करते हैं, तो अक्सर हमारे जेहन में आधुनिक विज्ञान, राजनीति या अर्थशास्त्र के नाम उभरते हैं. साथ ही विदेशों से पढ़कर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले डॉ बीआर अंबेडकर या जवाहरलाल नेहरू जैसे नाम जेहन में आते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि वो पहला भारतीय कौन था, जिसने विदेश से पीएचडी की? गुलामी के दौर में, जब सात समंदर पार जाना एक बड़ी चुनौती थी, तब उस शख्स ने अपनी जड़ों यानी संस्कृत के दम पर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में अपना लोहा मनवाया था. उस शख्स ने न केवल अंग्रेजों को भारतीय व्याकरण की गहराई समझाई, बल्कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया. उस शख्स का नाम है डॉ लक्ष्मण सरूप, जिन्होंने साल 1920 में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी (D.Phil) की उपाधि प्राप्त की थी. वर्तमान में इसे पीएचडी (PhD) कहा जाता है.डॉ लक्ष्मण सरूप का जन्म 1894 में अविभाजित भारत के लाहौर में हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा लाहौर में ही हुई. बाद में लाहौर के ओरिएंटल कॉलेज से संस्कृत में एमए की डिग्री प्राप्त की थी. उनकी असाधारण शैक्षणिक योग्यता को देखते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए ‘स्टेट स्कॉलरशिप’ प्रदान की. साल 1916 में वे ब्रिटेन के प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बैलिओल कॉलेज पहुंचे. उस समय ऑक्सफोर्ड ने अपनी पहली शोध डिग्री डी.फिल (D.Phil) की शुरुआत ही की थी और लक्ष्मण सरूप इस कोर्स में दाखिला लेने वाले शुरुआती दो छात्रों में से एक थे. उनके शोध का विषय था ‘निरुक्त (Nirukta)’, जो प्राचीन भारतीय ऋषि यास्क द्वारा रचित व्युत्पत्ति शास्त्र का सबसे कठिन और महत्वपूर्ण ग्रंथ है. 1920 में जब उन्हें डिग्री मिली, तो उन्होंने इतिहास रच दिया, क्योंकि उनसे पहले किसी भारतीय ने विदेश से संस्कृत या अन्य विषय में औपचारिक पीएचडी नहीं की थी.
डॉ लक्ष्मण सरूप केवल किताबों तक ही सीमित नहीं थे. ऑक्सफोर्ड में अपनी पढ़ाई के दौरान वे एक बेहतरीन क्रिकेटर और एथलीट भी थे, जहां उन्होंने अपनी कॉलेज टीम का नेतृत्व किया. उन्होंने फ्रांसीसी नाटकों का हिंदी में अनुवाद भी किया, जिसके लिए उन्हें फ्रांस की प्रतिष्ठित संस्था ‘अकादमी फ्रैंकेज’ द्वारा सम्मानित किया गया. इस सम्मान को पाने वाले भी वे पहले भारतीय थे. उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे एक साथ कई भाषाओं और विषयों पर समान अधिकार रखते थे. उन्होंने अपने जीवनकाल में 45 से अधिक पुस्तकें और 150 से ज्यादा शोध पत्र लिखे थे. इतना ही नहीं, डॉ सरूप विदेश से पीएचडी करने वाले पहले भारतीय होने के साथ-साथ ऑक्सफॉर्ड के भी पहले पीएचडी होल्डर थे. साल 1920 में उन्हें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री मिली थी.
डॉ लक्ष्मण सरूप की विरासत आज भी जीवित है. उनकी मृत्यु के दशकों बाद, साल 2022 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बैलिओल कॉलेज ने उनकी उपलब्धियों को सम्मान देते हुए अपने एक नए भवन (Block C1) का नाम ‘डॉ लक्ष्मण सरूप बिल्डिंग’ रखा है. यह सम्मान इस बात का गवाह है कि ज्ञान की कोई सीमा नहीं होती और एक विद्वान अपनी मेधा से युगों तक याद रखा जाता है. डॉ सरूप ने उस समय संस्कृत और भारतीय संस्कृति का मान विदेशों में बढ़ाया, जब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था. आज भी भाषा विज्ञान के क्षेत्र में उनके द्वारा किए गए ‘निरुक्त’ के कार्यों को संदर्भ ग्रंथ के रूप में उपयोग किया जाता है. साल 1920 में वे भारत लौटे और पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर में संस्कृत साहित्य के प्रोफेसर नियुक्त हुए. इसके बाद साल 1942 में उन्हें पंजाब विश्वविद्यालय के ओरिएंटल कॉलेज का पहला भारतीय प्रिंसिपल नियुक्त किया गया.




