गोड़वाड़ विकास की नई करवट ले रहा है। बड़ी कंपनियां बड़े प्लान लेकर पहुंच रही हैं। बड़े ब्रांड बड़े यूनिट लगा रही हैं। ‘सेलो’ ने शानदार शुरूआत की है। ‘किलर’ के कदम बढ़ रहे हैं। कुछ और कंपनियां भी कमर कस रही हैं। रोजगार की उम्मीद का माहौल है। पिछली अशोक गहलोत सरकार ने पहल की। कुछ भरोसे जगे, कुछ दरवाजे खुले और मारवाड़ के उद्योगपति मातृभूमि की ओर लौटे। गोड़वाड़ की ओर। धीरे - धीरे, संभल कर। क्योंकि यहां विकास का सच कड़वा है। इतिहास भी डराता है। मारवाड़ में बिजली सपनों में, पानी पाताल में और अफसर अदृश्य लुटरे। सड़कें गड्ढों में और परिवहन सुविधा भी भगवान भरोसे। फिर भी खुशी है कि प्रवासी मुनाफे से ज्यादा माटी के मोह में बंधे आ रहे हैं। गहलोत सरकार गई, तो सहयोग भी शून्य पर आ गया। अब उम्मीद मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के आश्वासन पर है।

सरकारें आई, विकास नहीं आया

पचास साल पहले गोड़वाड़ में उद्योग लगे थे। फालना फलित हुआ। रानी ने रफ्तार पकड़ी और सुमेरपुर संपन्न हुआ। वह दौर था मोहनलाल सुखाड़िया का। तब उद्योग छोटे थे, लेकिन उम्मीद बड़ी। फिर एक लंबा सन्नाटा। सालों तक नया कुछ नहीं। उल्टे औद्योगिक इकाइयां बंद होती गईं। फालना के छाते देश भर में बिकते थे। रानी के गैती – फावड़े हर खेत की शान। लेकिन एक-एक कर ताले लगते गए। सरकारें देखती रहीं। किसी ने सुध नहीं ली। हरिदेव जोशी आए, भैरोंसिंह शेखावत आए, जगन्नाथ पहाड़िया भी आए। शिवचरण माथुर आए और वसुंधरा राजे भी। अफसरों के बोरियां - बिस्तर सिमटते रहे, मुख्यमंत्री बदलते रहे। लेकिन गोड़वाड़ की किस्मत नहीं बदली। कांग्रेस की और बीजेपी दोनों की सरकारें आती रहीं, जाती रहीं। घोषणाएं होती रहीं, वादे मिलते रहे। गोड़वाड़ चुपचाप विकास की बाट जोहता रहा। मगर, विकास नहीं आया।

उद्योग के लिए आने लगे प्रवासी

गोड़वाड़ की तस्वीर बदल सकती अगर मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सचमुच ठान लें। अगर बुनियादी सुविधाएं मिल जाएं। अगर वक्त पर पूरा पानी मिले और जरूरत के जितनी बिजली मिले। अगर सड़कें सुधरें, परिवहन दुरुस्त हो और अफसर सहयोग करें। हम जानते हैं कि पहले प्रवासी केवल छुट्टियों में मारवाड़ आते थे। कोई अपने पैसे से मंदिर बनवाने या अस्पताल खुलवाने। कोई स्कूल या कॉलेज का निर्माण करवाने, तो कोई बस स्टेंड से लेकर हॉस्टल बनवाने के लिए और कोई गावों में मेडीकल कैंप लगवाने। लेकिन उद्योग लगाने की परंपरा 50 साल बाद लौटी है। ‘सेलो’ के संस्थापक घीसूलाल बदामिया समाजसेवी थे। गोड़वाड़ से उनको गहरा लगाव था। तो, प्रदीप राठोड़ ने पिता का सपना पूरा करने की पहल की। वे फालना में अपने ‘सेलो’ का प्लांट लेकर पहुंचे हैं।

गहलोत विश्वास, भजनलाल भरोसा

मारवाड़ियों का मातृभूमि प्रेम भी गजब है। वे मुंबई में मौत – मरगत के संदेसे में भी अपने गांव को प्राथमिकता देते हैं - मरुधर में ‘फलाणा’ गांव। इसी प्रेम में बंधे प्रवासी फिर मारवाड़ लौट रहे हैं। उद्योग ला रहे हैं, क्योंकि अपनी माटी पर भरोसा है। भरोसे की यह उम्मीद अशोक गहलोत ने जगाई थी। प्रवासियों से विश्वास का रिश्ता बनाया था, लेकिन गहलोत सरकार चली गई। अब मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा हैं। उन्होंने सहयोग का भरोसा दिया है। मुंबई में, पुणे में, सूरत में, अहमदाबाद में। चेन्नई, बैंगलुरू और हैदराबाद में भी। जयपुर में तो एक बार नहीं, कई कई बार मुख्यमंत्री से प्रवासियों की मुलाकातें हुई हैं। हर बार सरकार से भरोसा मिला। भरोसा यह कि बिजली पूरी मिलेगी। भरोसा यह कि पानी की सप्लाई नहीं रुकेगी। भरोसा यह कि सड़कें सुधरेंगी, ट्रांसपोर्टेशन सुचारू होगा और सबसे खास बात यह कि घूसखोर अफसर परेशान नहीं करेंगे, यह भी भरोसा मिला है। अब परीक्षा भजनलाल के भरोसे की है।

‘सेलो’ ने सांस ली,  तूफान बाकी

सरकार जानती है कि उद्योग लगेंगे, तो रोजगार मिलेगा, अर्थव्यवस्था मजबूत होगी और विकास होगा। लेकिन सरकार को यह भी जानना होगा कि उद्यमियों का मातृभूमि प्रेम तभी बढ़ेगा, जब सब कुछ सही होगा। अभी तो केवल ‘सेलो’ ने सांस ली है, उसका तूफान अभी बाकी है। ‘किलर’ ने भी कदम बढाए हैं। लेकिन ‘मॉटेक्स’, ‘जीएम’, ‘इंस्पिरा’, ‘फ्लेयर’, ‘भारत’, ‘कल्पतरू’, ‘टोरसो’, ‘वरणी’,  जैसे ब्रांड अभी बाकी है। भरोसा बना रहा तो गोड़वाड़ खुशहाल होगा। लेकिन बिजली, पानी, सडक, ट्रांसपोर्टेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और अफसरशाही का हाल जैसा है, वही रहा, तो उद्यमी निराश होगा। और इस बार अगर फिर मुंह मोड़ लिया, तो याद रखना, पिछले पचास साल से गोड़वाड़ विकास को जैसे तरस रहा है, अगले सौ साल और तरसता रहेगा। क्योंकि देश बहुत बड़ा है, जहां सुविधाएं मिलेंगी, उद्यमी वहीं अपने उद्योग खड़े करेंगे। ठेका अकेले कोई मारवाड़ का ही तो नहीं है!

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)