आज मैं लंदन में हिंदी को लेकर कुछ रोचक तथ्यों पर बात करूँगा .
मैं मुंबई में रहता हूँ , जब अपनी सोसाइटी की लिफ्ट में होता हूँ या फिर पॉडियम पर टहलता हूँ , तो पाता हूँ कि बिल्डिंग की ज़ेन अल्फ़ा यानी स्कूली बच्चों की बातचीत केवल अंग्रेज़ी में चल रही होती है. यही स्थिति कमोबेश मध्यम आय वर्ग वाली दूसरी सोसाइटी में भी है . मल्टी नेशनल कार्यालयों में सभी कामकाज अंग्रेज़ी में होता है. देसी कॉर्पोरेट जगत में भी ज्यादातर अंग्रेज़ी ही चलती है , शीर्ष कॉर्पोरेट बैठकों या फिर बोर्ड मीटिंग्स में संवाद अंग्रेज़ी में ही होता है. बचपन से अपनी भी कोशिश यही रही कि अंग्रेज़ी सीखनी है , क्योंकि व्हाइट कॉलर क़िस्म की नौकरियों के लिए अच्छी अंग्रेज़ी सीखना अनिवार्यता हुआ करती थी और मुझे यह भी महसूस होता है कमोबेश स्थिति वैसी ही है , कंपनी जिस भाषाई क्षेत्र में काम करती है वो रिक्रूट करते समय इतना चाहती है कि अंग्रेज़ी के साथ ही चयनित प्रत्याशी को स्थानीय भाषा का भी ज्ञान हो , पंजाब , बंगाल , ओडिशा, कर्नाटक , तमिलनाडु, केरल में निश्चय ही वह भाषा हिंदी नहीं होगी .
अपनी पढ़ाई के दौरान but को बट और put को पुट उच्चारित करने में काफ़ी कन्फ्यूज़न होता था , ग्रेजुएशन करते समय हमे केमिस्ट्री चोपड़ा सर पढ़ाते थे हमें हैरत होती थी कि चोपड़ा और केमिस्ट्री दोनों की शुरुआत ch से होती है फिर उच्चारण अलग अलग क्यों हैं . खैर अपनी अंग्रेजी की ललक ने हमें पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री अंग्रेजी साहित्य में लेने के लिए बाध्य किया. उसके पीछे मन में एक छुपा भाव यह भी था कि अच्छी नौकरी मिलेगी और क्या पता हो सकता है बोनस स्वरूप हमें भी इंग्लैंड जाने का अवसर मिल जाए, अगर ऐसा हुआ तो हम वहाँ अंग्रेज़ी के बिना कैसे काम चलायेंगे.
अपना लंदन आने का सिलसिला यही कोई पंद्रह साल से शुरू हुआ है , यहाँ तो तस्वीर कुछ अलग ही नज़र आती है. अभी परसों की ही बात है , मैं पत्नी के साथ अभिजात्य इलाके केंसिंगटन में आया हुआ था , मुझे भारतीय विद्या भवन की ओर जाना था .मेरी पत्नी को संदेह हुआ शायद मैं रास्ता भटक गया हूँ . कहने लगी ,”किसी से पूछ लो , लगता है ग़लत लेन में आ गए हैं .” तभी पीछे से आवाज आई ,” बहन जी आप को किधर जाना है ? “यह एक मध्य वय के थ्री पीस सूट पहने सज्जन थे जिन्होंने हमारी बातचीत को सुन लिया होगा . उन्होंने हमारा संशय दूर कर दिया और फिर अपने रास्ते निकल लिए.
यह कोई अकेला मामला नहीं है ऐसा हमारे साथ लंदन में कई बार हो चुका है जब हम राह चलते किसी समस्या पर हिंदी में बाय कर रहे हों और हमारी बातचीत सुन कर कोई अजनबी हमें गाइड कर दे .
मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि अगर आपका हाथ अंग्रेज़ी में तंग है और लंदन में आपको कहीं भी कोई जानकारी लेनी हो तो हिंदी समझने वाला व्यक्ति आसानी से मिल जाएगा. यहाँ के विशाल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा हीथ्रो की तो बात ही निराली है , यहाँ हिंदी बोलने और समझने वाले स्टाफ की संख्या चेन्नई , बेंगलुरु, त्रिवेंद्रम , भुवनेश्वर के हवाई अड्डों की तुलना में कहीं अधिक है . हीथ्रो हवाईअड्डे पर लोडर से लेकर ग्राउंड स्टाफ में हिंदी का बोलबाला है . इसका कारण यह है कि स्टाफ में भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की संख्या खासी है . वे चाहे भारतीय मूल के हों या फिर नेपाली, बांग्लादेशी हों या पाकिस्तानी सभी हिंदी समझ और बोल लेते हैं . राष्ट्रीयता , प्रांत , धर्म की दीवार यहाँ संवाद में बाधक नहीं नज़र आती है .भारतीय उप-महाद्वीप से आए लोग चेहरे मोहरे से एक से ही दिखते हैं , यहाँ का स्टाफ शक्ल से उन्हें पहचान जाता है और फिर बातचीत हिंदी में ही करता है. इसलिए कोई व्यक्ति पहली बार लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर उतरता है और उसे अंग्रेजी बिल्कुल भी नहीं आती फिर भी उसे यहाँ पर कोई परेशानी नहीं होगी , हिंदी में बोलने पर उनका काम चल जाएगा .
आपको अबसे सात साल पहले की घटना बताना चाहूँगा . पुत्रवधू की डिलीवरी होनी थी , Northwick Hospital हैरो स्थित घर से मात्र पाँच मिनट की ड्राइव पर है , हमारी धर्मपत्नी काफ़ी तनाव में थीं कि आख़िर डॉक्टर और स्टाफ से किस तरह बात कर पाएँगी क्योंकि स्कूल में अंग्रेज़ी विषय होने के बावजूद उन्हें बोलने और ब्रिटिश उच्चारण को समझना चुनौती से कम नहीं है. अस्पताल में पहला सामना जिन गायनिक डॉक्टर से हुआ वो तो पाकिस्तानी मूल की थी मेमसाहब के चेहरे मोहरे को देख कर हिंदी में ही बात करती रहीं , पहली बड़ी समस्या का समाधान हो गया . अब बारी थी नर्सिंग स्टाफ की पाँच दिन तक लगातार कभी भारतीय मूल तो कभी नेपाली तो कभी बांग्लादेशी नर्स , लगा ही नहीं कि उत्तर भारत से बाहर कहीं हैं , यहाँ तक कि सफ़ाई कर्मचारी तमिल मूल की श्रीलंकाई थी वो भी हिंदी ही बोल रही थी .
कमोबेश यही स्थिति बच्चों के स्कूलों की भी है , अंग्रेज़ी नहीं आती कोई बात नहीं दो तीन अध्यापिकाएँ आपको हिंदी में बात करने वाली मिल ही जाएगी.
कुछ दिनों पहले हम ऑक्सफ़ोर्ड गए थे यहाँ के कॉलेजों की दुनिया भर में अंग्रेज़ी के प्रचार प्रसार में बड़ी भूमिका रही है . यहाँ अब से एक हज़ार वर्ष पूर्व क्राइस्ट चर्च कैथेड्रल से ही पढ़ाई की शुरुआत हुई है . इस चर्च को घूमते हुए एक गोरे सज्जन मिले जो यहाँ लंबे समय से अपनी सेवा प्रदान कर रहे हैं , जब हमारी उनसे बातचीत की शुरुआत हुई तो वे एक ही वाक्य अंग्रेज़ी में बोले बाद की बातचीत टूटी फूटी हिंदी में की , उनके पिता ब्रिटिश सेना की अपनी पोस्टिंग में भारत रह चुके थे इसलिए उनके घर में फ़ौजी हिंदी भी चलती थी.
इसलिए अगर आप लंदन जाना चाहते हैं और आपको लगता है कि आपका हाथ अंग्रेज़ी में तंग है , बेफिक्र हो कर जाइए , हिंदी में आपकी बात समझने वाला कोई न कोई आसानी से मिल ही जाएगा.
(लेखक स्टेट बैंक के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और इन दिनों लंदन यात्रा पर हैं )





