Monday, July 22, 2024
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Homeचुनावी चौपालइन चुनावों में मुस्लिम वोटों से भाजपा को कैसे मात मिली

इन चुनावों में मुस्लिम वोटों से भाजपा को कैसे मात मिली

चुनावी चौपाल
– प्रशांत पोळ
मराठी मे एक प्रख्यात चिंतक और लेखक हो गए हैं,  डॉ. पु. ग. सहस्त्रबुद्धे। उन्होंने अनेक वैचारिक निबंध लिखें। भारत के परतंत्र रहने के बारे में भी उन्होंने लिख रखा है।
हिन्दू धर्म में एक अच्छी सी संत-परंपरा रही है। जहां जहां हिन्दू धर्म का फैलाव हुआ हैं, वहां वहां संत – महंत हुए। इन्होने समाज प्रबोधन का बहुत बड़ा काम किया हैं। लोगों को न्याय के, नीति के, सत्य के, अहिंसा के मार्ग पर चलने का आग्रह किया। भगवत भक्ति की। समाज को सही दिशा में लेकर जाने की यह बयार, अखंड हिन्दुस्थान में सभी जगह बही ऐसा दिखता हैं।
और हमारे समाज के नेतृत्व ने, राजा – महाराजाओं ने इस दिशा में चलने का पूरा प्रयास भी किया हैं। हमने कभी भी, किसी पर भी, स्वतः होकर आक्रमण नहीं किया। कोई हिन्दू राजा कभी भी आक्रांता नहीं रहा। युध्द में शत्रु पर क्रौर्य का, बर्बरता का, बिभत्सता का कोई भी उदाहरण हिन्दू राजा का नहीं मिलता। हम सहिष्णु रहे। आने वाले विदेशियों का स्वागत करते रहे।
धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने वाले हमको क्या मिला..?
हमे मिली गुलामी। हमे मिला दारिद्र, हमे मिले अत्याचार। हमे मिला अपमान।
हमारा ऐश्वर्य जाता रहा। हमारा स्वातंत्र्य जाता रहा। हमारा सम्मान जाता रहा। हमारी बहु-बेटियां भी जाती रही।
इसके ठीक विपरीत, हम पर आक्रमण करने वालों ने क्या किया..?
उन्होंने तमाम गलत, अनैतिक रास्ते अपनाएं। छल, कपट, बलात्कार का सहारा लिया। क्रूरता की पराकाष्ठा की। युध्द के सारे नियम तोड़ दिए। बलात धर्मांतरण किया। बहु-बेटियों की इज्जत लूटी।
उन मुस्लिम आक्रांताओं को, उन अंग्रेज / पोर्तुगीज / फ्रेंच आक्रांताओं को क्या मिला..?
उनको मिला ऐश्वर्य। उनको मिला स्वातंत्र्य। उनको मिली सत्ता। उनको मिला उपभोग।
सारे पाप करने के बाद भी मुस्लिम और इसाई  आक्रांताओं को यह सब मिला और सारे पुण्य करने के बाद भी हमें गुलामी और दारिद्र मिला।
ऐसा क्यों..?
मुस्लिम और इसाई आक्रांताओं ने केवल एक धर्म निभाया। और हम हिन्दू, धर्म निभाने के आडंबर में, धर्म का वही ‘मूल तत्व’ भूल गए..!
वह हैं – संघ धर्म। समष्टि का धर्म। जिसका अगला भाग हैं – ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’। और हम यही भूल गए।
इस लोक सभा चुनाव में भी यही बात सामने आई। हमने अयोध्या में साढ़े पांच सौ वर्षो के बाद भगवान श्री रामलला को पुनर्स्थापित किया। उनका भव्य मंदिर बनाया। काशी में त्रिलोक के स्वामी, भगवान शंकर के विश्वेश्वर मंदिर को अतिक्रमण से मुक्त किया। सुंदर बनाया। उज्जैन में महाकाल लोक सवारा। हमने ईश्वर की मनोभाव से आराधना की। संतों का सम्मान किया। बुजुर्गों को तीर्थ स्थलों की यात्रा करवाई। चुनाव में राष्ट्रीय सोच के लोग जीतकर आएं, इसलिए मंदिरों में पूजा-अर्चना की। हमारे प्रधानमंत्री मोदी जी ने पार्वती देवी की तपस्थली, कन्याकुमारी में और अहोरात्र आराधना की। तप किया।
हमको क्या मिला..?
विजय मिली। किंतु अपेक्षा अनुसार नहीं।
हमारे विरोध में जो लड़े, वे आपस में भी लड़े। गलत व्यक्तियों के साथ लड़े। किंतु क्या उत्तर प्रदेश, क्या बंगाल, क्या महाराष्ट्र… हमें हमारी पिछली स्थिति से भी पीछे हटना पड़ा।
क्या कारण रहा ?
पराभव के अनेक कारण रहे। किंतू महत्व का था – ‘उन्होने’ समष्टी धर्म निभाया। हमने नही। मुसलमानों का ‘वोटिंग पैटर्न’ यह एक प्रमुख कारण रहा..!
एक बात इस चुनाव से उभर कर आई हैं। इस देश का मुसलमान क्या कहना चाहता हैं, यह इस चुनाव से बहुत कुछ स्पष्ट हो रहा हैं। और यह देश के भविष्य के लिए अत्यंत गंभीर विषय हैं।
रजत शर्मा  इंडिया न्यूज पर  एक मौलवी का वीडियो दिखाया है, जिसमें वह मौलवी अत्यंत स्पष्टता के साथ, बिना लाग-लपेट के, कह रहा हैं, “हमें कुछ भी करके, किसी भी हालात में, बीजेपी को हराना है। चाहे सामने मुस्लिम उम्मीदवार क्यों न हो, किंतु बीजेपी को हराने की उसकी क्षमता नहीं हैं, तो उसे भी वोट ना दे। जो कैंडिडेट बीजेपी को हरा सकता हैं, उसी को वोट देना हैं।”
और गंभीर बात यह, की देश भर के मुसलमानों ने, जहां-जहां भी बन सका, वहां ऐसा किया भी..!
उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र का धुले लोकसभा क्षेत्र लेते हैं। यहां भाजपा के उम्मीदवार थे, डॉक्टर सुभाष भामरे, जो २०१९ में २ लाख से भी ज्यादा मतों से विजयी हुए थे। कांग्रेस से श्रीमती शोभा बच्छाव उम्मीदवार थी। धुले लोकसभा में ६ विधानसभा क्षेत्र आते हैं। इनमें से पांच विधानसभा क्षेत्रों में, भाजपा ने १,९०,००० से ज्यादा मतों की लीड ली थी। किंतु अकेले मालेगांव (मध्य) ने कांग्रेस को १,९४,००० की लीड दी और भाजपा के डॉक्टर सुभाष भामरे मात्र ३,८३१ वोटो से चुनाव हार गए। मालेगांव (मध्य) यह पूर्णत: मुस्लिम बहुल क्षेत्र है। यहां का विधायक, ओवैसी के एमआईएम पार्टी का हैं। यहां कुल २,०५,०००, वोट डाले गए जिनमें से १,९८,८६९ वोट कांग्रेस के खाते में गए।
मजेदार बात यह, की इस चुनाव में धुले लोकसभा क्षेत्र से डॉ. प्रकाश आंबेडकर के ‘वंचित बहुजन समाज अघाडी’ के जहूर अहमद मोहम्मद भी चुनाव मैदान में थे। किंतु उन्हें मुस्लिम वोटर्स ने सिरे से नकार दिया। उन्हें ५,००० वोट भी नहीं मिले। रणनीति के तहत मुसलमानों ने अपने सारे वोट डॉ. श्रीमती शोभा बच्छाव को दिए और उनकी जीत सुनिश्चित की।
अकेला धुले लोकसभा क्षेत्र अपवाद नहीं है। लगभग सभी जगह ऐसा हुआ है।
महाराष्ट्र में मुसलमान सबसे ज्यादा द्वेष करते थे, तिरस्कार करते थे, खौफ खाते थे, तो ‘ठाकरे’ इस नाम से। सन १९९२ के दंगों के बाद मुसलमानों के लिए सबसे ज्यादा तिरस्करणीय व्यक्ति ‘बालासाहब ठाकरे’ थे। अभी-अभी तक, मुस्लिम शिवसेना से चिढ़ते थे। किंतु इस लोकसभा में चमत्कार हुआ। मुसलमानों ने अपने सारे वोट, जहां-जहां उद्धव ठाकरे की शिवसेना के उम्मीदवार थे, वहां उनको ‘ट्रांसफर’ किये। अर्थात, उस मौलवी के आदेशों का पूर्णत: पालन किया गया। कारण एक ही था। उन्हें लगता था, उद्धव ठाकरे के उम्मीदवार, बीजेपी को हरा सकते हैं। मुंबई में मुस्लिम बहुल क्षेत्र में भी उद्धव ठाकरे के उम्मीदवार आगे रहे।
महाराष्ट्र में मुसलमानों की रणनीति एक ही लोकसभा क्षेत्र में गलत साबित हुई। वह है – संभाजी नगर (पुराना नाम – औरंगाबाद)। यहां २०१९ में, ओवैसी की एमआईएम पार्टी के इम्तियाज जलील चुनकर आए थे। उन्होंने भाजपा और अविभाजित शिवसेना के चंद्रकांत खैरे को हराया था। इसलिए इस बार मुसलमानों को मामला कुछ सरल लगा। उनका अनुमान था, यहां शिवसेना (शिंदे) और शिवसेना (ठाकरे) में वोटों का बंटवारा होगा और एमआईएम के इम्तियाज जलील आसानी से चुनकर आएंगे। इसलिए महाराष्ट्र का यह एकमात्र लोकसभा क्षेत्र हैं, जहां मुसलमानों ने अपने वोट उद्धव ठाकरे की शिवसेना को ट्रांसफर नहीं किये। किंतु यहां के हिंदू समुदाय में, इम्तियाज जलील का जीत के आना चुभ रहा था। इसलिए बड़ी संख्या में हिंदू मतों का ध्रुवीकरण, शिंदे की शिवसेना के संदीपान भुमरे के पक्ष में हुआ और वह १,३५,००० मतों से चुनाव जीत गए।
मुसलमानों के इस रणनीतिक मतदान (Strategic Voting) का एक और उदाहरण हैं, पश्चिम बंगाल की बहरामपुर लोकसभा सीट। यह मुस्लिम बहुल क्षेत्र हैं। अर्थात, यहां ५२% मुस्लिम वोटर हैं। सन १९९९ से यहां पर कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी चुनाव जीतते आए हैं। वे लोकसभा मे कांग्रेस दल के नेता और भाजपा के प्रखर आलोचक रहे हैं। फिर भी, इस बार रणनीति के तहत, तृणमूल कांग्रेस ने, गुजरात के यूसुफ पठान को यहां से चुनाव लड़वाया। ‘मां, माटी, मानुष’ का नारा देने वाली तृणमूल कांग्रेस ने एक ऐसे प्रत्याशी को खड़ा किया, जिसे बंगाली का ‘ब’ भी नही आता। किंतु मुस्लिम समुदाय की रणनीति एकदम स्पष्ट थी। कोई संभ्रम नहीं। कोई कंफ्यूजन नहीं। किंतु-परंतु भी नहीं। उन्हें इस बार बहरामपुर से मुस्लिम प्रत्याशी चुनकर लाना था, वो लाया। वो भी, इतने वर्ष मुसलमानों की तरफदारी करते हुए, उनका तुष्टिकरण करते हुए राजनीति करने वाले अधीर रंजन चौधरी को हराकर..!
यह तो मात्र कुछ उदाहरण हैं। किंतु पूरे देश में कमोबेश यही पैटर्न रहा। अनेक लोकसभा सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशी आपस में भिड़े। किंतु मुस्लिम वोटर की मानसिकता स्पष्ट थी। संभाजी नगर जैसे एक – दो अपवाद छोड़ दें, तो वह जानता था कि कौन सा प्रत्याशी भाजपा को हरा सकता हैं। उसने वोट उसी को दिया।
अब यहां एक प्रश्न निर्माण होता हैं। भाजपा का ऐसा विरोध क्यों..? भाजपा को हराने के लिए एड़ी चोटी एक क्यों की गई..?
उत्तर स्पष्ट हैं। भाजपा शक्तिशाली राजनीतिक दल है, और शायद एकमात्र दल हैं, जो मुसलमानों का तुष्टिकरण नहीं करता।
यह सारे प्रसंग, भारत के विभाजन के दिनों का स्मरण करा रहे हैं, जब मुस्लिम समुदाय एक होकर कांग्रेस को हराता था, और कांग्रेस को फिर भी लगता था, की यह मुस्लिम समुदाय हमारे साथ है !*
कहीं ऐसी गलतफहमी का शिकार भाजपा भी ना हो जाए..!
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं और ऐतिहासिक विषयों पर शोधपूर्ण लेख लिखते हैं)  
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