बंगाल में भाजपा की जीत भारतीय राजनीति में केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और सभ्यतागत मोड़ है। लगभग पिछले 200 वर्षों से बंगाल का हिंदू समाज निरंतर किसी न किसी रूप में उत्पीड़न, भेदभाव और सुनियोजित दमन का शिकार रहा है। अलग‑अलग कालखंडों में हिंदू समाज को तोड़ने, कमजोर करने और उसकी पहचान मिटाने के प्रयास किए गए।
मुगल काल में बंगाल में हिंदुओं का बड़े पैमाने पर जबरन या दबाव में धर्मांतरण किया गया। इसके बाद ब्रिटिश शासन ने ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति के अंतर्गत बंगाल का विभाजन किया, जिसकी सबसे भारी कीमत हिंदुओं को चुकानी पड़ी—जमीन, जनसंख्या और सुरक्षा, तीनों स्तरों पर।

स्वतंत्रता के बाद भी बंगाल में हिंदुओं की स्थिति में कोई मौलिक सुधार नहीं हुआ। कांग्रेस सरकारों के समय से लेकर वामपंथी शासन तक हिंदू समाज की उपेक्षा और प्रताड़ना बदस्तूर जारी रही। वामपंथी सरकारों के दौर में खुले तौर पर हिंदू‑विरोधी नीतियाँ लागू की गईं, धर्मांतरण को राजनीतिक संरक्षण मिला और हिंदुओं के लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित किया गया।
1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय हालात और भयावह हो गए। भारतीय हिंदू और बांग्लादेशी हिंदू—दोनों को अमानवीय अत्याचार झेलने पड़े। लाखों हत्याएँ, बलात्कार और विस्थापन हुए। इसके बाद भी बंगाल में हिंदुओं को सुरक्षा के बजाय और अधिक हाशिए पर धकेला गया। तुष्टिकरण की राजनीति के तहत मुसलमानों को लगातार विशेष लाभ दिए गए, जबकि बंगाली हिंदू अपने ही राज्य में धीरे‑धीरे शरणार्थी जैसे जीवन जीने को मजबूर हो गए। दूसरी ओर, अवैध बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों को राजनीतिक संरक्षण के साथ हर प्रकार की सुविधाएँ मिलती रहीं।
जब तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी के नेतृत्व में सत्ता में आई, तो यह आशा जगी कि शायद यह राजनीति कुछ संतुलित होगी। लेकिन वास्तविकता इसके ठीक उलट निकली। ममता बनर्जी के शासन में हिंदुओं पर दमन अपने चरम पर पहुँचा। हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध लगे, हिंसा बढ़ी, हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, घरों में घुसकर हमले किए गए और हिंदुओं के मतदान अधिकारों तक को खुले रूप से बाधित किया गया। यह स्थिति इतनी भयावह रही कि कई लोगों को लगा कि मुगल काल में भी इस स्तर का संस्थागत दमन नहीं हुआ था।
इन सभी परिस्थितियों में लगभग 200 वर्षों बाद बंगाल के हिंदुओं को पहली बार एक आशा की किरण नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के रूप में दिखाई दी। केंद्र सरकार की स्पष्ट नीति—“तुष्टिकरण किसी का नहीं, विकास सबका”—ने हिंदुओं में यह भरोसा जगाया कि वे निर्भीक होकर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग कर सकते हैं और उनकी सुरक्षा के लिए राज्य के बाहर भी एक मजबूत आवाज है।
जैसे‑जैसे यह विश्वास मजबूत हुआ कि भाजपा के नेतृत्व में उनकी रक्षा की जाएगी, बंगाल के हिंदुओं ने खुलकर भाजपा का समर्थन किया। परिणामस्वरूप इस बार भाजपा को ऐतिहासिक जनसमर्थन प्राप्त हुआ।
यह जीत केवल एक लोकतांत्रिक उपलब्धि नहीं है। यह उस 200 वर्षों पुरानी लड़ाई में पहला बड़ा परिवर्तन है, जो बंगाल में हिंदू सभ्यता को खत्म करने के लिए लड़ी जा रही थी। यह हिंदू समाज का संगठित प्रतिरोध है—तुष्टिकरण, उत्पीड़न और अन्याय की राजनीति के खिलाफ।
अब यह आशा बनी है कि यदि हिंदू समाज संगठित रहा और जाति या विचारधारात्मक विभाजन में नहीं फंसा, तो बंगाल में हिंदू सभ्यता को बचाया जा सकता है। अन्यथा जिस दिशा में बंगाल को धकेला जा रहा था, उसमें यह आशंका वास्तविक थी कि आने वाले 50–60 वर्षों में या तो हिंदुओं को वहाँ से खदेड़ दिया जाएगा या उन्हें धर्मांतरण के लिए मजबूर किया जाएगा।
इस दृष्टि से भाजपा की जीत केवल राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि उस सभ्यता का विद्रोह है जिसे योजनाबद्ध तरीके से समाप्त किया जा रहा था। यह एक निर्णायक संघर्ष की शुरुआत है—अपने अस्तित्व, अधिकार और भविष्य की रक्षा के लिए।

(लेखक राजनीतिक व समसामयिक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं )