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भारतीय विचारधारा एक महावैचारिक समुद्र हैः डॉ. इंदुशेखर 

दिनांक 09 जनवरी 2023 को लोकप्रिय, देशव्यापी, साहित्यिक, सांस्कृतिक संगठन ‘अखिल भारतीय राष्ट्रवादी लेखक संघ’ के तत्वावधान में आयोजित “एकात्म मानवदर्शन और साहित्य” विषय पर व्याख्यान संपन्न हुआ। इस अवसर पर सारस्वत वक्ता के रूप में सुप्रसिद्ध साहित्यकार, ‘साहित्य परिक्रमा’ पत्रिका के संपादक, राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष तथा एकात्म मानव दर्शन अनुसन्धान एवं विकास प्रतिष्ठान के सदस्य डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष जी ने उपरोक्त विषय पर व्याख्यान दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता भाषाविद् एवं डी. सी. एस. के. स्नातकोत्तर महविद्यालय, मऊ (उ. प्र.) के प्राचार्य डॉ. सर्वेश पांडेय ने की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सीमा शर्मा, सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ एवं स्वागत परिचय डॉ. अंजू सिहरे, शिवपुरी (म. प्र.) ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संयोजन दक्षिण के चर्चित युवा राष्ट्रवादी लेखक एवं आलोचक डॉ. आनंद पाटील ने किया। 

डॉ. इंदुशेखर ने अपने व्याख्यान में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्मवादी मानवदर्शन के मुख्य बिंदुओं के आलोक में विषय प्रस्तुत किया – 

भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता यह है कि यह संपूर्ण जीवन का, संपूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है। इसका दृष्टिकोण एकात्मवादी है। टुकड़े-टुकड़े में विचार करना, विशेषज्ञ की दृष्टि से ठीक हो सकता है, किंतु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं। पश्चिम की समस्या का मुख्य कारण जीवन के संबंध में खण्डशः विचार करना तथा फिर उन खंडों को जोड़ने का प्रयत्न है। 

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 1964 में एकात्मतावाद की प्रस्तावना भारतीयता और उसके चिंतन के रूप में की थी। यह ‘एकात्म’ विशेषण के साथ ‘मानववाद’ है। दार्शनिक भी मूलतः वैज्ञानिक है। पश्चिम के दार्शनिक द्वैत तक ही पहुँचे हैं, वह यथार्थवादी समाज है। भारतीय विचारधारा एक महावैचारिक समुद्र है, जिसमें सभी विचार आकर एकात्म रूप ले लेते हैं और साहित्य में फलीभूत होते हैं। समाज निरपेक्ष मानव की कल्पना ही नहीं कर सकते, क्योंकि व्यक्ति-समाज-प्रकृति, एक वलय बनाकर परस्पर निर्भर होते हैं। भारत में जो पेड़ हैं, भले ही वे ऑक्सीजन न भी देते हो, फिर भी उनका पूजन होता रहता है, जबकि पश्चिम में उपयोगितावाद प्रबल है। 

वामपंथी, समाजवादियों के साहित्य में रोटी की आवश्यकता का द्वंद्व है, परन्तु हमारे मन पर उसका मूल है, रोटी बांट कर खाना। क्यों खाना? कैसे खाना? अनशन करके रोटी छोड़ी भी गयी। जबकि यह प्रश्न तो समाज के मूल्य का है, केवल रोटी का नहीं। मार्क्सवाद में रोटी को ही साहित्य का केंद्र बनाया गया। स्वयंवादी चेतना हमारी कभी नहीं रही। हम मानव के लिए समाज केद्रित रहे हैं। कालिदास, निराला, प्रसाद जैसे साहित्यकार स्वीकार करते हैं कि जीवन में अनेकता अथवा विविधता है, किंतु उसके मूल में निहित एकता को खोज निकालने का हमने सदैव प्रयत्न किया है। यह प्रयत्न पूर्णतः वैज्ञानिक है। पश्चिम के दार्शनिक द्वैत तक पहुँचे, जिसका आधार लेकर कार्ल मार्क्स ने अपना इतिहास और अर्थशास्त्र का विश्लेषण प्रस्तुत किया। 

प्रकृति और पुरुष एक-दूसरे के विरोधी अथवा परस्पर संघर्षशील न होकर पूरक ही हैं। जीवन की विविधता, अंतर्भूत एकता का आविष्कार है। इसलिए उनमें परस्परानुकूलता तथा परस्परपूरकता है। किसी बीज का फलदार पेड़ के साथ एकत्व संबंध को हम भारतीय अपने साहित्य में सहज ही पहचान सकते हैं। 

अध्यक्षीय उद्बोदन में डॉ. शर्वेश पांडेय ने कहा कि भारतीय साहित्य में एकात्मकवाद पूर्वकाल से समाहित ही रहा है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की चिंता, हमारी चिंता है। साहित्य जगत चौराहे पर है। शरीर को मानववाद से सजाया गया है। उपयोगितावाद, मार्क्स या अस्तित्ववाद भौतिकता है। हम अध्यात्मिक हैं। धर्म और मोक्ष के बीच अर्थ और काम को परिणाम की तरह हमने स्वीकार कर प्रस्तुत किया है। चीजों को खंड-खंड में नहीं देखना चाहिये। जैसे – किसी भी चिकित्सा में सम्पूर्ण जाँच ही प्रभावी होती है। मनोविज्ञानिक रोगों में मन-मस्तिष्क के कारण समस्या है। स्वस्थ होने के लिए मन और विचार भी स्वस्थ होने जरूरी हैं। 

होलेस्टिक या समग्रता के विचार हमारे हर मानव की सोच है। वही साहित्य में फलित होता है। हमारी अपनी भारतीय सोच है। विदेशी को अपने वातावरण में ढालकर, स्वानुकूल करना होगा ; जैसे – भाषा का विकास होता है। व्यक्ति को समाज के साथ ही देखना है। संस्कृति का अपमान करने वाले सिनेमा और साहित्य को दूर ही रखा जाना चाहिए। 

कार्यक्रम के अंत में संघ के कार्यकारी अध्यक्ष श्री सोमनाथ शर्मा ने डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष को संघ की मानद सदस्यता देकर संघ कार्यों के आकाश में एक नक्षत्र और जोड़ लिया। साथ ही, एकात्मक मानववाद को साहित्य सहित राष्ट्र और सामाजिक जीवन के सभी पक्षों पर ‘अखिल भारतीय राष्ट्रवादी लेखक संघ’ के साथ कार्य करने हेतु आमंत्रित भी किया। 

जिज्ञासा आलोचनात्मक प्रश्नोत्तरी के समय अरुणाचल प्रदेश के श्री अचित सरकार ने कहा कि मूल देशज साहित्य की उपलब्धता बेहद कम है, जिसके कारण खोजपरक शोध भी कम ही हैं।

श्री सूरज प्रकाश ने कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए हिंदी साहित्य में गिरोह बाजी तोड़ने के लिए आह्वान किया।

अंत में कृतज्ञता ज्ञापन तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर की शोधार्थी सुश्री प्रतिभा तिवारी ने प्रस्तुत किया। 

कार्यक्रम का तकनीकी प्रबंधन भारत इतिहास कोश के संयोजक डॉ. अतुल गुप्त ने किया और मेजर सरस चन्द्र त्रिपाठी, श्री सिद्धार्थ शंकर, श्री अमन अंगिरिषि सहित अनेक साहित्य प्रेमी श्रोतागण कार्यक्रम के अंत तक जुड़े रहे। 

कार्यक्रम का समापन कल्याण मन्त्र के साथ सफलता पूर्वक हुआ।

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