इतिहास की गोद से आधुनिक विश्वनगरी तक जामनगर की गौरवगाथा !

आज श्रावण सुद सातम है—अर्थात हमारे प्यारे जामनगर का जन्मदिन!

आज से लगभग 486 वर्ष पहले, विक्रम संवत 1596 के श्रावण मास में जाम रावल ने नागमती और रंगमती नदियों के किनारे एक नए नगर की नींव रखी थी। कालांतर में यही नगर नवानगर, फिर ‘जाम का नगर’ और आज पूरे विश्व में जामनगर के नाम से जाना जाता है।

जामनगर का इतिहास केवल एक शहर की स्थापना की कहानी नहीं है। यह शौर्य, राजपरंपरा, व्यापार, संस्कृति और विकास की लगभग पाँच शताब्दियों की लंबी यात्रा है।

नागना बंदर से नवानगर तक

जामनगर की स्थापना से पहले भी नागमती और रंगमती—दोनों नदियाँ बहती थीं। इन दोनों नदियों के संगम के पास समुद्र था और वहाँ नागना या नागनेश नाम का एक प्रसिद्ध बंदरगाह स्थित था। इस बंदरगाह पर जेठवा वंश के राजा नाग जेठवा का शासन था।

जाम रावल ने नाग जेठवा को पराजित कर नागना बंदरगाह पर अधिकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने आसपास के क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करते हुए अपने राज्य का विस्तार किया। प्रारंभ में उन्होंने अपनी राजधानी बेड़ में और बाद में खंभालिया में स्थापित की।

लेकिन जोड़िया, आमरण और कालावड़ जैसे प्रदेशों के लिए ये दोनों राजधानियाँ काफी दूर थीं। इसलिए जाम रावल ने राज्य के मध्य भाग में एक नई राजधानी स्थापित करने का विचार किया।

और इसी विचार से जन्म हुआ—नवानगर का।

हालार की धरती पर ‘जाम का नगर’

विक्रम संवत 1596 के श्रावण मास में नागमती और रंगमती नदियों के किनारे नए नगर की नींव रखी गई। जाम रावल के पूर्वज हालाजी के नाम पर पूरा क्षेत्र हालार कहलाया और नए नगर को नवानगर नाम मिला।

बाद में राजपरंपरा में यह ‘जाम का नगर’ के रूप में प्रसिद्ध हुआ और कालांतर में यही नाम संक्षिप्त होकर जामनगर बन गया।

सौराष्ट्र में मुस्लिम काल के बाद विकसित हुए नगरों की तुलना में जामनगर को अत्यंत प्राचीन नगरों में स्थान दिया जाता है। भुज, राजकोट, भावनगर, गोंडल और सुरेंद्रनगर जैसे शहरों का विकास इसके बाद के समय में हुआ।

तीन खंभों की स्मृति

जामनगर की स्थापना से जुड़ी एक रोचक परंपरा के अनुसार नगर की नींव की निशानी के रूप में तीन खंभे लगाए गए थे।

कहा जाता है कि इनमें से एक खंभा दरबारगढ़ के पास पी.एच. सेठ के मकान में है। दूसरा राजेंद्र रोड पर स्थित दिलावर साइकिल स्टोर के पास बताया जाता है, जबकि तीसरा मांड़वी टावर के निकट था। हालांकि तीसरे खंभे के बारे में आज बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

ये खंभे केवल पत्थर या धातु की निशानियाँ नहीं हैं, बल्कि जामनगर के जन्मकाल की स्मृति को सँजोए हुए ऐतिहासिक साक्ष्य के समान हैं।

जामनगर के व्यापार से जुड़ी रोचक कहानी

कहा जाता है कि जब जाम रावल कच्छ से नए नगर की स्थापना के लिए निकले, तब कच्छ के दो प्रमुख जैन व्यापारी परिवार भी उनके साथ यहाँ आए थे—सेठ और शाह परिवार।

शाह परिवार को राजस्व वसूलने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। इसलिए वे मुकादम या ठेकेदार के रूप में जाने जाते थे। लोककथा के अनुसार, समय के साथ इसी शब्द के अपभ्रंश से ‘मकीम’ नाम प्रचलित हुआ।

इस प्रकार जामनगर की स्थापना की कहानी में राजवी शौर्य और राजनीतिक इतिहास के साथ-साथ व्यापारी तथा जैन समाज के योगदान की महत्वपूर्ण कड़ी भी दिखाई देती है।

राजसी नगर से विश्व के औद्योगिक मानचित्र तक

एक समय ऐतिहासिक और राजसी नगर के रूप में पहचाना जाने वाला जामनगर आज विश्व के औद्योगिक मानचित्र पर भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।

ब्रास पार्ट्स उद्योग, तेल रिफाइनरी और शिपिंग जैसे क्षेत्रों ने जामनगर की पहचान को वैश्विक स्तर तक पहुँचाया है। पुराने राजसी शहर की पहचान के साथ अब आधुनिक औद्योगिक नगर का नया स्वरूप भी जामनगर के व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुका है।

अनुकूल जलवायु, शांत वातावरण और विकास की संभावनाओं के कारण जामनगर आज केवल सौराष्ट्र का महत्वपूर्ण शहर नहीं रहा, बल्कि अनेक लोगों के लिए रहने और व्यवसाय करने का आकर्षक स्थान भी बन गया है।

क्रिकेट की काशी, छोटी काशी और अर्ध शत्रुंजय

जामनगर की पहचान केवल उद्योगों तक सीमित नहीं है।

क्रिकेट के प्रति अपने अद्भुत प्रेम और महान क्रिकेट खिलाड़ियों के साथ ऐतिहासिक संबंध के कारण इसे ‘क्रिकेट की काशी’ कहा जाता है।

असंख्य प्राचीन और पवित्र मंदिरों के कारण इसकी पहचान ‘छोटी काशी’ के रूप में भी है। वहीं प्राचीन जैन देरासरों और जैन संस्कृति की समृद्ध परंपरा के कारण इसे ‘अर्ध शत्रुंजय’ के नाम से भी जाना जाता है।

आज जामनगर मानो अपने भीतर दो युगों को सँजोए हुए है—एक ओर पुराना नगर, दरबारगढ़, ऐतिहासिक स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत; दूसरी ओर आधुनिक सड़कें, उद्योग, आवासीय क्षेत्र और विश्वस्तरीय विकास।

जामनगर केवल शहर नहीं, एक भावना है

जाम रावल ने लगभग पौने पाँच शताब्दी पहले जिस छोटे से नगर का सपना देखा था, वह आज विकास की अनेक ऊँचाइयाँ पार कर रहा है।

हालार से नवानगर...
नवानगर से जाम का नगर...
और जाम के नगर से आज का जामनगर!

इस यात्रा में राजवंश बदले, समय बदला, शहर का नक्शा बदला और जीवनशैली बदली—लेकिन जामनगर के प्रति लोगों की भावना आज भी उतनी ही अटूट है।

आज जब मेरा जामनगर 487 वर्ष का हुआ है, तो बस एक ही प्रार्थना है—

हमारे जामनगर की विरासत सुरक्षित रहे, विकास की गति निरंतर बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए यह शहर और अधिक सुंदर, समृद्ध तथा गौरवशाली बने।

जन्मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ, मेरे प्यारे जामनगर!

हैप्पी बर्थडे टू जामनगर!

(लेखक व्यवसायी हैं और साहित्य, कला, संस्कृति आदि विषयों पर नियमित लेखन करते हैं) 
संपर्क- 9428670555