Thursday, July 25, 2024
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प्राकृतिक संसाधनों और आथिक विकास के विकास के बीच संतुलन की दरकार

पर्यटन आज दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग है और पर्यावरण-पर्यटन उद्योग  सबसे तेजी से बढ़ने वाला घटक है। समूचे विकासशील उष्णकटिबंधी क्षेत्रों में संरक्षित क्षेत्र प्रबंधकों और स्थानीय समुदायों को आर्थिक विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता के बीच सन्तुलन कायम करने के लिये संघर्ष करना पड़ रहा है। पर्यावरण-पर्यटन भी इस महत्त्वपूर्ण सन्तुलन का एक पक्ष है। सुनियोजित पर्यावरण-पर्यटन से संरक्षित क्षेत्रों और उनके आस-पास रहने वाले समुदायों को लाभ पहुँचाया जा सकता है।
सामान्य शब्दों में पर्यावरण-पर्यटन या इको टूरिज्म ऐसी अवधारणा है जहां पर्यटन और प्रकृति संरक्षण का प्रबंध इस ढंग से करना है कि एक तरफ पर्यटन और पारिस्थितिकी की आवश्यकताएँ पूरी हों और दूसरी तरफ स्थानीय समुदायों के लिये रोजगार- नये कौशल, आय और महिलाओं के लिये बेहतर स्तर सुनिश्चित किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 22 साल पूर्व विश्व पर्यावरण-पर्यटन वर्ष के रूप में मनाए जाने से पर्यावरण पर्यटन के विश्वव्यापी महत्व, उसके लाभों और प्रभावों को मान्यता प्राप्त हुई। यह अवसर हमें विश्व स्तर पर पर्यावरण-पर्यटन की समीक्षा का अवसर प्रदान करता है ताकि भविष्य में इसका स्थायी विकास सुनिश्चित करने के लिये उपयुक्त साधनों और संस्थागत ढाँचे को मजबूत किया जा सके। तात्पर्य है कि पर्यावरण-पर्यटन की खामियाँ और नकारात्मक प्रभाव दूर करते हुए इससे अधिकतम आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक लाभ प्राप्त किए जा सकें।
ऊंचे – ऊंचे गगनचुंबी पहाड़ों के उतंग शिखर  मिलों बहती कल – कल करती नदियां, राजस्थान में पसरा थार का युवा रेगिस्तान, लद्दाख में बर्फ का रेगिस्तान, गुजरात में कच्छ का सफेद नमक का रेगिस्तान,अद्भुत और अनुपम  झीलें और झरने, वनस्पति और वन्यजीवों से भरपूर जंगल और अनंत विस्तार लिए समुद्र प्रकृति प्रदत्त ऐसे संसाधन है जिनका उपयोग मानव ने विविध प्रकार पर्यटन के लिए किया है। यह पर्यावरणीय पर्यटन हमें देश की प्राकृतिक विविधता, के साथ विभिन्न संस्कृतियों वाले एक राष्ट्र से जोड़ता है। पर्यटन के माध्यम से हम हमारे  समृद्ध प्राकृतिक परिवेश से जुड़ते हैं और पर्यटन की ख्वाइश को पूरा करते हैं।
पर्यावरण पर्यटन के लिए भारत में कुछ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्यानों में कॉर्बेट नेशनल पार्क (उत्तराखंड), बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश), कान्हा राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश), गिर राष्ट्रीय उद्यान और अभयारण्य (गुजरात) और रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान),  चिल्का झील (उड़ीसा), सुंदरवन नैशनल पार्क (पश्चिम बंगाल), काज़ीरंगा नैशनल पार्क (असम), कंचनजंगा जैवमंडल रिज़र्व (सिक्किम), ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क (हिमाचल प्रदेश) एवम् घाना पक्षी राष्ट्रीय पार्क ( राजस्थान ) आदि शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों इको – टूरिज्म की अवधारणा का तेजी से विकास हुआ है। ज्यादा से ज्यादा लोग अब इस धारणा से अवगत हों रहे हैं और इसकी वजह से यह चिंता उत्पन्न कर जागरूकता का विषय भी बन गया है। इसे देखते हुए भारत सरकार ने देश में पर्यटन और संस्कृति मंत्रालय में पारिस्थितिक पर्यटन को लेकर विभाग की स्थापना की है।  भारत में पर्यावरण लुप्त होने की कगार पर आ गया है जिसके लिए आज वन्यजीव अभयारण्यों और संरक्षण कानून बनाए गए हैं। जीवों और वनस्पतियों के अधिकारों के  लड़ने के लिए जो कई पशु और पादप अधिकार संगठन कार्य कर रहे हैं।  नाजुक हिमालयी पारिस्थितिक तंत्र और लोगों की संस्कृति और विरासत को संरक्षित करने के लिए कई जागरूक प्रयास किए जा रहे हैं।
अवकाश के दिनों में होटल की जगह जंगल में प्रकृति के साथ शिविर अथवा कैंप सैलानियों के बीच बहुत अधिक लोकप्रिय होने लगे हैं। केरल और कश्मीर में हाउसबोट,  पेड़ के घर और कर्नाटक के जंगलों में गहरे घोंसले रिसॉर्ट्स आवास के लिए पर्यटकों के बीच बहुत लोकप्रिय हो रहे हैं। इस कार्य के लिए ट्रैवल कंपनियां सामने आई हैं जो प्रकृति के निकट पर्यटन के शौकीनों के लिए कई प्रकार के ‘ग्रीन टूर’, जंगल कैपिंग, रेगिस्तानी कैंपिंग, हाउस बोट , शिकारा स्टे, पहाड़ों पर ट्रैकिंग, स्कीइंग, नदियों में राफ्टिंग एंजॉय, हॉट एयर बैलून, विभिन्न प्रकार की सफारी तथा एडवेंचर खेलों की व्यवस्था करती हैं। आज होटल का स्थान रिजॉर्ट ज्यादा पसंद किए जाने लगे हैं जो प्रकृति के अधिक नजदीक होते हैं।
राजस्थान में पहाड़ी किले, महाराष्ट्र में स्थित अंजता और एलोरा की गुफाएं,एलिफेंटा की गुफाएं, बादामी और कन्हेरी की गुफाएं, हिमाचल, कश्मीर, उत्तराखंड आदि अनेक जगह पहाड़ियों के ऊपर विकसित हिल स्टेशन और मंदिर, हिमालय में एक अविश्वसनीय जैव विविधता के साथ नंदा देवी और फूलों की घाटी राष्ट्रीय उद्यान, दक्षिण भारत के समुद्र तटीय राज्यों के लुभावने और मनोरम समुद्री बीच और नदियों के किनारे धार्मिक नगर, जैसे हज़ारों पर्यटक स्थल पर्यावरणीय पर्यटन से जुड़े हैं। अपने जंगलों, स्वच्छ जल और सदाबहार पेड़ों के लिए 572 छोटे द्वीपों का एक समूह अंडमान और निकोबार ईको टूरिज्म का बेहतरीन विकल्प है। अंडमान और निकोबार द्वीप समूह नारियल और खजूर की सीमा वाले, पारदर्शी पानी वाले, आकर्षक और खूबसूरत समुद्री तटों और उसके पानी के नीचे कोरल और अन्य समुद्री जीवन के लिए मशहूर हैं। यहां की प्रदूषण रहित हवा, पौधों और जानवरों की नायाब प्रजातियों की मौजूदगी की वजह से लोकप्रिय है। यहां पर्यटक घोर वर्षावन के माध्यम से स्नॉर्कलिंग, स्कूबा डाइविंग और ट्रेकिंग और लंबी पैदल यात्रा जैसी गतिविधियों की एक विस्तृत श्रृंखला का आनंद ले सकते हैं। राजस्थान के भरतपुर में स्थित केवलादेव नेशनल पार्क मानव निर्मित आर्द्रभूमि है और भारत में सबसे प्रसिद्ध अभयारण्यों में से एक है जो पक्षियों की हजारों प्रजातियों का घर है।
 कह सकते हैं कि अच्छी प्रकार से संरक्षित पारिस्थितिकी-प्रणाली पर्यटकों को आकर्षित करती है। विभिन्न सांस्कृतिक और साहसिक गतिविधियों के दौरान एक कर्तव्यनिष्ठ, कम असर डालने वाला पर्यटक व्यवहार, पुनर्भरण न हो सकने वाले संसाधनों की कम से कम खपत, स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी, जो प्रकृति, संस्कृति अपनी जातीय परम्पराओं के बारे में पर्यटकों को प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध कराने में सक्षम होते हैं। पर्यटन स्थलों पर शुद्ध पर्यावरण बना रहे इसके लिए जरूरी है कि सरकार के स्तर से किए जा रहे प्रयासों में स्वयं पर्यटक और स्थानीय नागरिक व संस्थाएं भी जागरूक हों और अपनी जिम्मेदारी समझते हुए भागीदार बने। स्थानीय लोगों की भागीदारी उनके लिये आर्थिक लाभ सुनिश्चित करती है जो आगे चलकर उन्हें बेहतर और अच्छा जीवन उपलब्ध कराती है।
पर्यटक स्थलों को स्वच्छ बनाए रखने में पर्यटक भी महत्वपूर्ण दायित्व निभा सकते हैं।
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डॉ.प्रभात कुमार सिंघल
लेखक एवम पत्रकार, कोटा
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