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निधि गोयलः बंद आँखों से सपनों को उड़ान देने वाली योध्दा

निधि गोयल से मिलना ऐसा ही है जैसे आप किसी ऐसे योध्दा से मिल रहे हैं जिसके मन में हजारों सपने हैं, जिसे अपने सपनों को सच करना भी आता है और जिसका ह्रदय उन लोगों के लिए धड़कता है जो न सपने देख सकते हैं न अपने आसपास की दुनिया। निधि गोयल खुद देख नहीं पाती है, लेकिन आत्मविश्वास, संकल्प और इच्छाशक्ति की त्रिवेणी उनके हर सपने को किसी तेज धारा की तरह बहाकर उसके अंजाम तक ले जाती है। अपनी छोटी सी उम्र में तमाम अवरोधों, मुसीबतों, तानों, अपमान और विरोधाभासों का सामना करते हुए निधि ने वो उपलब्धियाँ हासिल की है जिनको पाने में एक सामान्य युवा को भी मुश्किलों का सामना करना पड़े।

निधि विगत चार साल से अपना खुद का एनजीओ चला रही है। आज निधि की सोच और काम का दायरा भारत से बाहर सात समंदर पार तक जा चुका है। भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ की महिलाओँ को लेकर बनने वाली नीतियों के लिए बनी 11 सदस्यीय समिति में निधि को शामिल किया गया है। निधि का चयन ग्लोबल वुमन ऑर्गेनाईज़ेशन में भी किया गया है। डच सरकार ने महिलाओं के लिए 5 करोड़ यूरो का एक प्रोजेक्ट तैयार किया तो उस पर चर्चा करने के लिए दुनिया भर से मात्र दो लोगों को बुलाया गया जिसमें एक निधि गोयल भी थी। निधि देश के प्रमुख व्यापारिक संगठन फिक्की से भी जुड़ी है। जाने माने उद्योगपति केशव सूरी ने निधि को अपने साथ जोड़ रखा है। निधि के एनजीओ द्वारा दिव्यांगों के लिए तैयार की गई एक रिपोर्ट का देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित एक आदेश में उल्लेख किया गया है। दिव्यांगों पर होने वाले अत्याचार को लेकर चल रहे एक मुकदमें में सर्वोच्च न्यायालय ने इस रिपोर्ट का उल्लेख किया है।

निधि बचपन से ही पेंटर बनना चाहती थी और चार साल की उम्र से ही अपने बाल मन की कल्पना की उड़ान को उसने बहुत खूबसूरती से रंगों में सजाया भी। निधि जब दसवीं कक्षा में थी तो उसको पता चला कि वह इन आँखों से दुनिया को नहीं देख पाएगी। आत्मविश्वास से भरपूर निधि ने इस चुनौती को बहुत सहजता से लिया और आज निधि नैत्रहीन होते हुए भी किसी सामान्य युवक या युवती से ज्यादा सक्रिय है और उसकी उपलब्धियाँ उसकी जीवटता की गवाही दे रही है।

निधि जब दसवीं कक्षा में थी तो नियमित चैकअप के दौरान से पता चला कि उसकी आँखों की रोशनी लगातार कम हो रही है और धीरे धीरे उसे दिखना बिल्कुल बंद हो जाएगा। ये जानकर निधि को दोपहर तो बहुत दुःख हुआ, लेकिन 14-15 साल की इस लड़की ने तय किया कि जीवन में कुछ न कुछ ऐसा करुंगी जो दुनिया के लिए मिसाल बने और आज निधि पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन चुकी है। निधि की इस यात्रा में सके साथ कदम-कदम पर खड़ा रहा उनका पूरा परिवार। उनकी माता श्रीमती ज्योति गोयल, पिता अशोक गोयल और बड़ी बहन नेहा गोयल ने निधि को हौसला दिया कि ये जीवन की एक परीक्षा है और इस परीक्षा में उसे सफल होना है। घर वालों ने से कभी ये एहसास ही नहीं होने दिया कि वह सामान्य लोगों से अलग है।

दुर्भाग्यवश निधि के बड़े भाई आशीष गोयल को भी यही समस्या है और सके बावजूद आशीष ने शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बेहतरीन प्रदर्शन कर अपना रास्ता खुद बनाया और आज वो लंदन के एक संस्थान में शानदार पद पर है। निधि को अपने बड़ा भाई आशीष से भी हौसला और आत्मविश्वास मिला। निधि ने तय किया कि मुझे अपना जीवन खुद अपने दम पर ही जीना है और मैं वह सब काम कर सकती हूँ जो एक सामान्य व्यक्ति कर सकता है।

निधि अपने परिवार के साथ हर सामाजिक कार्यक्रम में जाती और उसके पिताजी हर व्यक्ति से उसका परिचय कराते हुए ये जरुर बताते कि निधि देख नहीं सकती है। ये सुनकर लोगों को आश्चर्य होता था, लोग कहते थे कि आपको इसकी ये समस्या छुपा कर रखना चाहिए। लेकिन घर वालों का और निधि का मानना था कि हम ये बात किसी से नहीं छुपाएंगे। इससे निधि का आत्मविश्वास भी दृढ़ हुआ और उसे लगा कि समस्या उसे दिखाई नगहीं देना नहीं बल्कि लोगों की नकारात्मक मानसिकता है।

निधि गोयल का पूरा परिवार कार्ला के अध्यात्मिक गुरु और आयुर्वेद के विशेषज्ञ डॉ. श्री बालाजी तांबे का भक्त है। निधि जब गुरूजी से मिली तो उन्होंने कहा, तुम्हारी समस्या पर ध्यान मत दो ये देखो कि समाज में तुमसे भी ज्यादा परेशान लोग हैं, तुमको उनके लिए कुछ करना है। निधि को तो जैसे गुरु मंत्र मिल गया। उसे एहसास हुआ कि उसका संपन्न परिवार है, उसके परिवार वाले उसे सम्मान और हौसला देते हैं लेकिन ऐसे लाखों लोग होंगे जिनको ये सुख और सुविधा उपलब्ध नहीं, मुझे उनके लिए कुछ करना होगा। इसके बाद निधि ने ड्रामा, संगीत और लेखन पर अपना ध्यान केंद्रित किया।

लेकिन मुसीबतें निधि का लगातार पीछा करती रही और निधि उनका सामना कर अपना रास्ता बनाती रही। जब मास मीडिया के लिए कॉलेज में प्रवेश की बात आई तो बच्चों को संस्कार और शिक्षा देने वाले शिक्षक ने निधि से कहा कि इस कॉलेज में तुम्हारा बोझ कौन उठाएगा, तुम कैमरे के पीछे कैसे जाओगी। आत्मविश्वास से भरी निधि ने इसका माकूल जवाब दिया और उसे मास मीडिया में प्रवेश मिला और सबसे सुखद आश्चर्य इस बात पर है कि उसने पूरे बोर्ड में टॉप किया। निधि का मानना है कि सरकार और समाज ने दिव्यांग लोगों के लिए हर जगह ऐसे बैरियर बना रखे हैं कि वे अपनी प्रतिभा के दम पर समाज की मुख्य धारा में शामिल ही नहीं हो सकते।

जब निधि पोस्ट ग्रेजुएशन में प्रवेश लिया तो उसे कहा गया कि परीक्षा के लिए उसे राईटर (जो व्यक्ति निधि के कहे अनुसार उसके प्रश्नपत्र हल कर सके) जब निधि ने इसको लेकर उच्च न्यायालय का एक आदेश दिखाया तो उसे कहा गया कि तुम हमें धमकी दे रही हो।

निधि ने कॉलेज में पढ़ते हुए भी हर दिन जो संत्रास और पीड़ा झेली उससे अनुमान ही लगाया जा सकता है कि हमारे शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों की जगह निर्दयी लोग भरे पड़े हैं। कॉलेज में निधि को अलग से नोट्स नहीं दिए जाते थे, वो सुनकर याद करके उनको किसी दूसरे व्यक्ति से टाईप करवाकर अपनी पढ़ाई करती थी और ये उसे रोज करना पड़ता था।

निधि को अपने नोट्स बनाने से लेकर फोटो कॉपी करवाने तक में समस्या आती थी। फोटो कॉपी करवाते समय जब लाईन में लगी होती थी तो कोई भी उसके नैत्रहीन होने की वजह से आगे लाईन में लग जाता था।

एक दिव्यांग छात्रा पर हर दिन होने वाली इस प्रताड़ना का क्या मनोवैज्ञानिक असर पड़ता होगा, कोई कल्पना ही कर सकता है।

लेकिन जब निधि मास्टर की डिग्री के लिए गई तो वहाँ के लोगों ने उनका आत्मविश्वास बढ़ाया। लेकिन निधि ने भी मन में ठान लिया था कि वो न तो उपेक्षा से आहत होगी न प्रशंसा से प्रसन्न होगी। कोई दूसरा उसका रिमोट नहीं हो सकता, उसे जीवन में जो करना है वह खुद अपने दम पर ही करके रहेगी। निधि के अंदर आए इस स्थितप्रज्ञता के भाव ने उसके आत्मविश्वास और सपनों को नई उड़ान दी।

इसके बाद निधि ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। निधि ने मुंबई में हिंदुस्तान टाईम्स में ट्रैनी पत्रकार के रूप में काम किया। महिलाओं की अंग्रेजी पत्रिका न्यू वुमन में काम किया। इसके बाद वो महिलाओँ के अधिकारों के लिए काम करने वाले एनजीओ में शामिल हो गई।

जब सरकार ने कोविड टीकाकरण की योजना बनाई तो निधि ने देखा कि इसमें दिव्यांगों के लिए कोई सुविधा नहीं है। वे कैसे अपने मोबाईल पर आए एसएमएस को देखेंगे और कैसे टीके के लिए केंद्र की खोज करेंगे। निधि ने बगैर देर किए उनके टीकाकरण की सुविधा विकसित की। कोविड का दिव्यांगों पर क्या असर हुआ इसको लेकर एक रिपोर्ट तैयार की और उसे NWHC के पास गई।

निधि बताती है कि उसे अपने देश में पग-पग पर समस्याओं का सामना करना पड़ता है। लोग सहानुभूति तो जताते हैं मगर सम्मान नहीं देते। हवाई जहाज में अकेले जाने पर कई बार सवाल पूछा जाता है कि अकेली कैसे जाओगी। टिकट काउंटर पर बोर्डिंग पास बनवाने के लिए लाईन में खड़ा रहना पड़ता है, कोई ये नहीं कहता कि हमें पहले बोर्डिंग पास दे दिया जाए। अगर उसकी मांग की जाए तो उपहास उड़ाया जाता है, अपमानित किया जाता है। निधि ने ऐसे कई संस्मरण बताए जिन्हें सुनकर एक सभ्य व्यक्ति का सिर शर्म से झुक जाए कि हमारी सरकारें और हमारा समाज दिव्यांग लोगों के प्रति कितना निष्ठुर है।

इसके विपरीत निधि जब लंदन गई तो उसे हर जगह सुखद अनुभव हुआ।

निधि की खुशकिस्मती ये थी कि उसके साथ पढने वाली सहेलियों ने उसका हर कदम पर ध्यान रखा। वे पार्टी के लिए उसे तैयार करके ले जाती थी।

दिल्ली एअरपोर्ट पर हुए एक वाकये को याद करते हुए वो बताती है कि उसे नैत्रहीन होने की वजह से ब्राज़ील एअरलाईँस में से जाने से रोक दिया गया। जब उसने एनजीओ से संपर्क कर इसकी शिकायत की तो उसे इडियट कहा गया। हवाई जहाज में यात्रियों को देखकर नकली मुस्कान पैंकने वाली एअरहोस्टेज ने भी उनके साथ बदतमीजी की, वो बगैर बताए चाय सके सामने रखकर चली गई और वो गरम गरम चाय निधि पर गिर गई।

निधि बताती है कि वो 2016 में वाराणसी के पास एक गाँव में गाँव के दिव्यांग बच्चों से चर्चा करने गई और उसने जब बच्चों से ये पूछा कि उनका सपना क्या है तो उसे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि बच्चों के मुँह से आवाज़ ही नहीं निकली। पूरे पौने दो घंटे सभी बच्चियाँ चुप रही। बड़ी मुश्किल से बच्चियाँ बात करने को तैयार हुई तो पता चला कि अशिक्षा, गरीबी या घटिया मानसिकता की वजह से इन बच्चियों का घर में ही सम्मान नहीं होता। घर में सब बच्चों के लिए नए कपड़े आते हैं लेकिन इनके लिए नहीं लाए जाते और कहा जाता है तू क्या करेगी नए कपड़े पहनकर। घर के लोग किसी विवाह समारोह या सामाजिक कार्यक्रम में लेकर नहीं जाते। पूरा घर जाता है और एक अकेली नैत्रहीन बच्ची घर में अकेली सिसकती रहती है।

निधि ने बताया कि शहरों में भी नैत्रहीन बच्चियों के साथ बहुत समस्या है। सड़क पार करवाने के नाम पर या मदद करने के नाम पर कोई भी इनके साथ छेड़छाड़ कर देता है। और घर के लोगों ने भी अपने इन बच्चों को लोगों द्वारा की जा रही ये छेड़छाड़ स्वीकार करना सिखाया है। उनका यही दबाव रहता है कि ऐसा कुछ होने पर वो चुप रहा करे। सरकारी पुरस्कारों को लेकर निधि का कहना था कि सरकार लॉबिंग करने वाले एनजीओ को पुरस्कार देती है। जमीन पर कोई कितना भी अच्छा काम करे उसको कोई महत्व नहीं मिलता है। निधि बताती है कि कई बार ऐसी लड़कियों और महिलाओं से मिलना होता है जिनकी कहानियाँ रुला देती है और बैचेन कर देती है। एक बार मातृ दिवस पर एक गरीब माँ आई, उसने बताया कि उसे तो हर जगह अपमानित किया ही जाता है उसके बेटे को भी अंधी माँ का बेटा कहकर अपमानित किया जाता है। उसे हर जगह सबसे ताने सुनना पड़ते हैं।

देश की सरकारें, मंत्री, प्रधान मंत्री अफसर और नेता जिस गर्व से सरकारी योजनाओं का गुणगान करके आत्ममुग्ध रहते हैं उन्हें निधि जैसे योध्दाओं से जानना चाहिए कि उनके दावों और योजनाओँ की हकीकत क्या है।

निधि गोयल से जुड़ी लिंक

ट्वीटर @saysnidhigoyal

https://www.youtube.com/watch?v=RRwfj4n_DhM

https://www.youtube.com/watch?v=2RlR57585nk

https://risingflame.org/person/team/

https://www.awid.org/news-and-analysis/meet-our-board-president-nidhi-goyal

https://feminisminindia.com/2020/08/07/rising-flame-nidhi-goyal-interview/
https://en.wikipedia.org/wiki/Nidhi_Goyal
https://madinasia.org/2020/04/comedy-activism-disability-and-mental-health-in-conversation-with-nidhi-goyal/
https://indianexpress.com/article/india/nidhi-goyal-rising-flame-disability-best-accessible-website-6226428/

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