तमस से भरे हुए मूर्खों के झुंड जिनके हृदय कठोर और बुद्धि अल्प है, वह परम पवित्र निश्छल हृदय परम भावमय,भक्ति में डूबे हुए पवित्र संत श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के विरुद्ध जो प्रलाप कर रहे हैं उसके द्वारा वह अपनी मूर्खता का ही परिचय दे रहे हैं।.
उन पर हमें दया आती है और तरस आती है।
यह स्पष्ट है कि उन्हें भारतीय परंपरा का तनिक भी ज्ञान नहीं है।
सनातन धर्म के किसी भी रहस्य और तथ्य से वह अपरिचित हैं और अचानक वोटो की लिप्सा से बकवास कर रहे हैं।
एक चूक पूज्य बाल स्वरूप संत धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जी से भी हो गई।
जो बातें संत लोग आपस में करते हैं,स्नेहपूर्वक अपने-अपने इष्ट देव की महिमा के बखान के भाव में डूबे हुए करते हैं यानी जो बातें मठों के भीतर और छोटे समूह में परस्पर होती है वैसी बातें उन्होंने व्यर्थ ही सार्वजनिक मंच पर कर दी और उसको प्रसारित होने दिया।
दो भक्ति में डूबे हुए संत हृदय अथवा भाव में डूबे लोग परस्पर इस तरह की छेड़छाड़ करते हैं कि वह अपने इष्ट देव की महिमा बताने के क्रम में भिन्न अवतार भिन्न स्वरूप का विनोद करते हैं और उत्तर में उन्हें अपने स्वरूप के विषय में भी कुछ सुनना पड़ता है।
इसका मूल उद्देश्य रहता है कि दोनों अपने-अपने आराध्य के भाव ज।त में डूबे रहे. उन्ही की चर्चा में रस लेते रहें, उन्ही का स्मरण और कीर्तन करते रहें,उन के गुणों का कथन और श्रवण करते रहें और भाव में डूबे हुए बहते रहें.इसके लिए वे मानो प्रत्यक्ष देख रहे हैं अपने-अपने आराध्य देव को,इस तरह का हास्य व्यंग्य करते हैं।
तो भगवान राम के पक्ष में और भगवान कृष्ण पर विनोद करने के उत्साह में शास्त्री जी बह गए परंतु जब वह दुनिया घूम आए हैं तो उन्हें ऐसा बचपना तो नहीं करना चाहिए था कि जो बात मठ और आश्रमों के भीतर या दो संतों और भक्तों के बीच में आपस में होती है उसे ऐसे सार्वजनिक माध्यम में भी प्रसारित होने दें जहां रजोगुण और तमोगुण से भरे हुए लोगों की विशाल भीड़ होती है और उनके हृदय की पवित्रता और कोमलता के भावो को पहचानने वाले शायद ही कोई विरले होते हैं।
वहां यह नहीं कहना चाहिए था।
यह उनसे देश और काल को लेकर चूक हो गई।
पात्र के विषय में भी चूक हो गई।
इस तरह का विनोद केवल भक्त पात्रों के लिए ही है।
उसे बाहर के जन साधारण के ऐसे समूहों में जो सदा तमस में या ईर्ष्या द्वेष में या दोष अनुसंधान में, निरे दोष दर्शन में, विद्वेष से भरे हुए और किसी दूसरे को नीचा दिखाने के लिए मौके की ताक में ही रहते हैं अर्थात बहुत ही कुत्सित चित्त के दुर्भाव में डूबे हुए जो लोग हैं जिनमें से कुछ के राजनीति में बड़े नाम हो गए।
ऐसे लोग भी कहीं हैं जो अपने पिता या अपने परिवार की कमाई के कारण अथवा उसके किसी योगदान के कारण पदों पर पहुंच गए हैं परंतु जिन्हें ना तो संस्कार प्राप्त है, ना उस भाव जगत का स्पर्श है, ना उस परंपरा का परिचय है,वह सब शास्त्री जी पर टूट पड़े।
यह तो अच्छा हुआ कि शास्त्री जी ने सबसे उसके लिए क्षमा याचना कर ली है।
अब इसके बाद जो लोग उन पर क्रोध दिखा रहे हैं वह बहुत ही क्षुद्र हृदय और दयनीय लोग हैं. उन पर तरस ही किया जा सकता है और उनकी उद्दंडता का विरोध भी करना आवश्यक है।
केवल एक बाल हृदय संत के एक विनोद पर इतना आग बबूला हो रहे इन लोगों ने कौन सा पुरुषार्थ धर्म के क्षेत्र में किया है?भारत में धर्म संस्कार के जागरण के लिए आज तक क्या किया है?भगवान कृष्ण के जन्म भूमि स्थान पर जो मंदिर है वह अभी तक तुम बना नहीं पाए.तुम्हारी कोई ना। शक्ति है, ना आकांक्षा है, ना पवित्र भाव है,ना पुरुषार्थ का विचार है.
एक साधारण भाव मय हृदय से कहे गए खेल खिलवाड़ पर इतना आगबबूला हो रहे हो?
अरे मूर्ख,जिस बात को जानते नहीं उसमें टांग मत लगाया करो, इसमें तुम्हारी जांघ उघड़ती है। तुम अपनी समझ से टाँग अड़ा रहे हो और तुम्हारा नीचे का पूरा शरीर और ऊपर का भी पूरा शरीर और तुम्हारे भीतर का भेजा,सब कुछ इसमें उघड़ कर दिख रहा है.
शास्त्री जी पर जो तुम बोल रहे हो उससे तुम्हारे भीतर का कीचड़ कांदो,गंदगी,सब सामने आ रहा है और तुम कितने मूढ़ हो और मंदबुद्धि हो,यह दिख रहा है.
इसे छोड़ दो, इससे तुम्हें कोई वोट नहीं मिलेगा, चोट जरूर मिलेगी बहुत प्रकार की....

(लेखक ऐतिहासिक और अध्यात्मिक विषयों पर शोधपूर्ण लेखन करते हैं)





