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हिन्दी के लिए सरकार में बैठे अंग्रेजों से जूझने वाले- प्रवीण जैन

दुष्यन्त का एक प्रसिद्ध शेर है –‘कौन कहता है कि आसमां में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों ।’ भारत में भारतीय भाषाओं को लेकर जो कुछ होता रहा है उसके चलते लोगों में एक ऐसी निराशा ने जन्म लिया जिसके चलते अनेक हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के कार्य से जुड़े लोग भी कुछ करने की बात तो दूर बात करने से भी कतराते हैं । ऐसे में मध्यप्रदेश के छोटे से गाँव से मुंबई में आए युवक ने होंसला दिखाया और अपने साहस और धैर्य से वह करना शुरू किया कि संघ की राजभाषा नीति और भारतीय-भाषाओं की उपेक्षी करने वालों की नींद हराम हो गई। वह कोई राजभाषा कर्मी नहीं है और रोजगार के तौर पर भी उसका भारतीय भाषाओं से कोई रिश्ता नहीं। लेकिन अपने जुनून के चलते प्रवीण जैन नामक यह युवक दुष्यन्त के शेर को चरितार्थ करते हुए राजभाषा नीति का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ, शिकायतों, माँग उठाने, सूचना का अधिकार में सूचना माँगने जैसे ऐसे- ऐसे और इतने पत्थर उछाले कि उनमें से बहुतेरे जागने को विवश हुए। इस कार्य में उनकी पत्नी विधि जैन ने भी उनका भरपूर साथ दिया और कंधे से कंधा मिलाकर निरन्तर साथ खड़ी हैं। इतने पर भी न जागनेवालों पर उन्होंने अनुस्मारकों की झड़ी लगा दी और वे बचाव के अनेक बहानेनुमा रास्ते ढूंढ़ने को विवश हुए। हालांकि इनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनकी चमड़ी गैंडे से भी मोटी है, उन पर ऐसे पत्थरों का कहाँ कोई असर पड़ने वाला था, लेकिन भारत-भाषा प्रहरी के रूप में प्रवीण जैन भी कहाँ हार मानने वाले हैं, छोटे कद और हल्के शरीर का यह युवा पूरे जोश और जज़्बे के साथ इनसे लोहा लेकर भारतीय भाषाओं का मार्ग प्रशस्त करने में लगा है।

हिंदी के कुछ बड़ा और सार्थक करने की ललक प्रवीण जैन में बचपन से ही रही । वे कहते हैं, ‘नवम्बर 2011 से हिन्दी के लिए कुछ करने की दिशा में राजभाषा सम्बन्धी प्रावधानों का अध्ययन करने के बाद उन्होंने सबसे पहली शिकायत ‘राष्ट्रपति भवन’ को ही लगाई। क्योंकि हिन्दी सम्बन्धी आदेश भारत के राष्ट्रपति ही जारी करते हैं पर स्वयं उनके सचिवालय में ही राजभाषा का उल्लंघन हो रहा था।

राष्ट्रपति की तीनों वेबसाइटें हिन्दी में उपलब्ध नहीं थी जबकि द्विभाषी वेबसाइट बनाने का नियम माननीय अटल बिहारी वाजपेयी केप्रधानमंत्री काल से ही अगस्त 1999 में प्रधान मंत्री कार्यालय के आदेश से लागू हुआ था। मैंने डेढ़ वर्ष तक लगातार राजभाषा विभाग और राष्ट्रपति सचिवालय में कई पत्र लिखे कोई उत्तर नहीं आया फिर अक्तूबर 2012 में प्रवीण जैन के भारतीय-भाषा अभियान का दायरा केवल सरकारी-तंत्र सिमटा हुआ नहीं है। बौद्ध गुरु दलाई लामा जो भारत में रहते हैं उनकी वेबसाइट अंग्रेजी, चीनी, तिब्बती, रूसी एवं मंगोलियाई भाषा में उपलब्ध थी पर जिस देश में उन्होंने अपना मठ स्थापित किया उस देश की भाषा मैं नहीं। प्रवीण जैन ने इस उपेक्षा के सम्बन्ध में लगातार ईमेल भेजे और 2013 की बुद्ध पूर्णिमा से अब उनकी वेबसाइट का हिंदी संस्करण भी शुरू किया गया है। हिंदी प्रेमी युवा ने हिंदी के लिए अपना अभियान जारी रखते हुए राजभाषा के उल्लंघन की लगभग 50 से अधिक शिकायतें और राजभाषा अनुपालन से सम्बंधित एक शतक आर.टी.आई. लगाई हुई हैं। जिनके कारण मंत्रालयों में बैठे अधिकारियों को राजभाषा उल्लंघन को रोकने के लिए कदम उठाने पड़ रहे हैं।

प्रसार भारती के अंतर्गत आने के बाद दूरदर्शन के सभी चिह्नों से हिंदी गायब हो गई थी इसके लिए भी वे साल भर तक संघर्ष करते रहे और आखिरकार मेहनत रंग लाई और अब दूरदर्शन के चैनलों के प्रतीक-चिह्नों (लोगो) में हिंदी को शामिल किया जा रहा है। डीडी न्यूज़ , डी डी नेशनल, डी डी भारती, डी डी स्पोर्ट्स के चिह्नों में हिंदी दिखाई देने लगी है। इस प्रकार पसूका जिसे अंग्रेजी में पी.आई.बी. कहा जाता है उसकी वेबसाइट पर हिन्दी को उसका स्थान दिलाने के लिए 7 महीने लगातार पत्राचार किया गया ।

प्रवीण जैन ने के भारतीय भाषा अभियान के अंतर्गत निजी क्षेत्र के लिए भी कार्य कर रहे हैं उन्होंने वोडाफोन से लड़कर पोस्टपेड का मासिक बिल हिंदी में देने के लिए कंपनी विवश किया और कंपनी के ग्राहक सेवा के कर्मचारियों को अच्छी हिन्दी में बात करने का प्रशिक्षण दिया जाए इसके लिए राजी किया। इसी प्रकार उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनियों प्रोक्टर एंड गैम्बल (कोलगेट), हिंदुस्तान यूनिलीवर, मैरिको पैराशूट, डाबर इण्डिया, अमूल, कैडबरी इण्डिया, नेस्कफ़े, पार्ले आदि जैसे कंपनियों में उपभोक्ता शिकायतें लगाई हैं और दबाव डाला है ताकि ग्राहकों को इन कम्पनियों के उत्पादों के डिब्बे, पुड़िया, पाउच, पैक पर अंग्रेजी के साथ-साथ सभी हिंदी में भी जानकारी छापी जाए। वे कहते हैं, ‘अंग्रेजी के नाम पर ये सभी कम्पनियाँ देश के 120 करोड़ ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी करती हैं, उन्हें गुमराह करती हैं।

देशभर में ये विदेशी और देशी कम्पनियाँ विकास के नाम पर हिन्दी सहित सभी भारतीय भाषाओँ का सफाया करने में लगी हुई हैं। आज से दस-बारह वर्ष पहले तक कोलगेट, साबुन, तेल आदि के पैक आदि पर हिन्दी दिखाई देती थी अब सब गायब है। यह एक षड्यंत्र है ग्राहक कानूनों का लाभ ग्राहक को तब तक नहीं मिलेगा जब तक भाषा में जानकारी नहीं दी जाएगी। इसके लिए सभी हिंदी भाषी राज्यों के मुख्य मंत्रियों को लिखा है कि वे सभी अपने-२ राज्य में बिकने वाले माल के पैकेजों पर हिंदी में समस्त जानकारी देने के अनिवार्य नियम बनाएँ।

गोवा में हर वर्ष आयोजित होने वाले भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह’ में बैनर, पोस्टर, नियमवाली आदि में हिन्दी को स्थान दिलाने के लिए निरंतर प्रयास किया, सूचना प्रसारण मंत्री को लिखा और तब जाकर फिल्म निदेशालय ने आश्वासन दिया है कि आगामी समारोह में हिन्दी को उसका स्थान मिलेगा। फिलहाल वे क्रेडिट कार्ड जारी करने वाली कम्पनियों के साथ निरंतर संपर्क में हैं ताकि लोगों को क्रेडिट कार्ड कंपनियों से मासिक विवरण, ईमेल और एस.एम.एस. अलर्ट की सुविधा द्विभाषी (हिंदी-अंग्रेजी)में अनिवार्य रूप से मिले ।ने कहते हैं, ‘क्यों भारतीय रिज़र्व बैंक ने सभी बैंको को समस्त सुविधाएँ हिंदी में भी उपलब्ध करवाने का नियम बनाया हुआ है पर निजी बैंक इसका निरंतर उल्लंघन कर रहे हैं।सभी निजी दूरसंचार कम्पनियों पर भी दवाब डाला जा रहा है ताकि टेलीफोन , मोबाइल के बिल तथा अन्य पत्राचार अनिवार्य रूप से द्विभाषी रूप में भेज जाए. भारतीय स्टेट बैंक को हिन्दी में नेट-बैंकिंग और हिन्दी में मोबाइल एप शुरू करने के लिए मजबूर किया। आगे दूरदर्शन को अपने सभी चिह्नों में हिन्दी देवनागरी में शामिल करने के लिए दो वर्ष निरंतर अभियान चलाया और दूरदर्शन एक सभी राष्ट्रीय चैनलों के चिह्नों में देवनागरी को शामिल किया गया।‘

हाल में रेलवे ने अपनी ई-टिकट वेबसाइट का हिन्दी संस्करण जारी किया है इसके लिए पूरे चार वर्ष कई बार पत्र लिखे, फिर कई आर टी आई भी लगाईं तब जाकर इस साल बजट में घोषणा की गई कि सरकार बहु भाषाई पोर्टल बना रही है और अंततः सफलता मिली।

‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ के माध्यम से जब हमने भारतीय-भाषाओं के प्रसार का कार्य प्रारंभ किया तो उसी दौरान हमारी निगाह भारतीय भाषाओं के लिए समर्पित इस युवा पर गई और संस्था ने उन्हें सम्मानित करने का निर्णय लिया और 2014 में मुंबई में आयोजित ‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन-2014’ में गोवा की राज्यपाल माननीय श्रीमती मृदुला सिन्हा के हाथों प्रवीण जैन को ’वैश्विक हिंदी सक्रिय-सेवा सम्मान’ प्रदान किया गया।

भारतीय भाषाओं के लिए जिस प्रकार का कार्य प्रवीण जैन कर रहे हैं यह अपने आप में अनुकरणीय है। यदि प्रवीण जैसे केवल 100 युवा इस देश को मिल जाएं तो मैं समझता हूँ कि भारतीय भाषाओं को अपना खोया स्थान पाने से कोई रोक नहीं सकेगा । 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर हम प्रवीण जैन नामक इस युवा भारतीय-भाषा प्रहरी का अभिनंदन करते हैं।

लेखक डॉ. एम.एल. गुप्ता ‘आदित्य’ , वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई के अध्यक्ष हैं

वैश्विक हिंदी सम्मेलन की वैबसाइट -www.vhindi.in
‘वैश्विक हिंदी सम्मेलन’ फेसबुक समूह का पता-https://www.facebook.com/groups/mumbaihindisammelan/
संपर्क – [email protected]

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1 टिप्पणी
 

  • avni

    सितंबर 11, 2015 - 7:00 pm

    Praveen jain – haathi ke daant dilhaane ke.alag aur khaane lag. For more details mail.me.

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