राजस्थान के 2026 निकाय चुनाव का सबसे सटीक राजनीतिक निष्कर्ष शायद यह है कि भाजपा विजेता है, लेकिन उसे बहुत बड़ा लोकप्रिय मतादेश नहीं मिला; कांग्रेस हारी है, लेकिन उसका मत आधार समाप्त नहीं हुआ; और निर्दलीयों ने दोनों दलों को चेतावनी दी है कि स्थानीय राजनीति में संगठन के साथ-साथ प्रत्याशी और स्थानीय विश्वास भी निर्णायक हैं।
10 नगर निगमों में चार पर बीजेपी और एक पर कांग्रेस को बहुमत मिला, जबकि पांच निगमों में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. 47 नगर परिषदों में भी 28 में बहुमत का आंकड़ा किसी दल के पास नहीं है. वहीं 252 नगर पालिकाओं में बीजेपी ने 149 और कांग्रेस ने 95 पर जीत दर्ज की. अब तक घोषित 10,205 वार्डों में बीजेपी ने 4,167, कांग्रेस ने 3,603 और निर्दलीयों ने 2,265 वार्ड जीते हैं. ऐसे में 21 सितंबर को होने वाले मेयर, सभापति और पालिका अध्यक्ष के चुनाव में निर्दलीय पार्षदों की भूमिका अहम होगी.
राज्य के 309 नगर निकायों के 9,900 वार्डों के आए परिणामों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कांग्रेस को बड़े अंतर से पीछे छोड़ दिया है. भाजपा ने 4,026 वार्डों में जीत दर्ज की है, वहीं कांग्रेस के खाते में 3,438 वार्ड आए हैं, जबकि 2,436 वार्डों में निर्दलीय और अन्य उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है.
चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस पर बढ़त बनाते हुए 9,900 वार्डों में से 4,026 वार्ड जीते, जबकि कांग्रेस को 3,438 सीटें मिलींय. जयपुर, कोटा, उदयपुर और भीलवाड़ा में भाजपा का दबदबा रहा, जबकि अजमेर, बीकानेर और पाली में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया.
4,179 बनाम 3,613 वार्ड भाजपा की स्पष्ट बढ़त बताते हैं, लेकिन 35.18% बनाम 34.24% वोट बताते हैं कि राजस्थान की शहरी राजनीति अभी भी अत्यंत प्रतिस्पर्धी है। इसलिए 2028 की लड़ाई का फैसला केवल आज के निकाय परिणामों से नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि करीबी हार वाले वार्डों में कौन-सा दल अगले दो वर्षों में अपना संगठन, स्थानीय नेतृत्व और वोटों का रूपांतरण बेहतर कर पाता है। यही वह जगह है जहां 2026 का निकाय चुनाव 2028 के विधानसभा चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण संकेतक बन सकता है।
राजस्थान में 2014-16 और 2026 दोनों BJP शासन के दौर हैं। फिर भी कांग्रेस का वोट शेयर 31.51% से 34.25% हुआ, जबकि BJP का 39.63% से 35.19% रह गया। BJP की वोट शेयर बढ़त 8.12% → सिर्फ 0.94% रह गई। विजेता पार्षद में भी कांग्रेस 30.92% से 35.27%, जबकि भाजपा 46.49% से 40.79% रह गए।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि भाजपा का जनादेश घट रहा है।
राजस्थान 2026 नगरीय निकाय चुनाव में NOTA को लगभग 1.09 लाख वोट मिले—यानी 1,09,000 से कुछ अधिक NOTA वोट। तुलना के लिए, लगभग 1.06 करोड़ कुल मतों में BJP को करीब 37.35 लाख और कांग्रेस को 36.35 लाख वोट मिले। NOTA का हिस्सा लगभग 1% के आसपास रहा।
राज्य के 309 शहरी निकायों में कुल करीब 1.06 करोड़ वोट पड़े। इनमें बीजेपी को 37.35 लाख वोट, कांग्रेस को 36.35 लाख वोट और निर्दलीय उम्मीदवारों को 29.06 लाख वोट मिले। इस तरह बीजेपी को कांग्रेस के मुकाबले 99,615 वोट ज्यादा मिले। बीजेपी और कांग्रेस के बीच कुल वोट शेयर का अंतर महज 0.94 फीसदी रहा, लेकिन वार्डों में जीत के मामले में दोनों पार्टियों के बीच बड़ा फासला दिखाई दिया। बीजेपी ने कांग्रेस से 566 वार्ड ज्यादा जीतकर स्थानीय निकाय चुनाव में अपनी बढ़त साफ कर दी। यानी वोट प्रतिशत में मामूली अंतर ने सीटों के आंकड़े में बड़ा फर्क पैदा कर दिया।
इन चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। निर्दलीयों को कुल 29.06 लाख वोट मिले, जो कुल वोटों का 27.38 फीसदी है। सीटों के लिहाज से भी निर्दलीयों ने 2,273 वार्डों में जीत दर्ज की है।
यानी जहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी राजनीतिक टक्कर दिखाई दी, वहीं बड़ी संख्या में मतदाताओं ने दोनों प्रमुख दलों से अलग जाकर निर्दलीय उम्मीदवारों पर भी भरोसा जताया।
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा छोटे दलों के वोट शेयर से जुड़ा है। NOTA को 1.09 लाख वोट मिले। इसके मुकाबले पांच राजनीतिक दल ऐसे रहे जिन्हें NOTA से भी कम वोट मिले।
हनुमान बेनीवाल की आरएलपी को 1,00,277 वोट, आम आदमी पार्टी को 49,829, बीएपी को 14,150, सीपीएम को 34,170 और बसपा को 30,179 वोट मिले।
यानी इन पांच दलों में से किसी का भी कुल वोट NOTA के आंकड़े को पार नहीं कर पाया। यह राजस्थान की स्थानीय राजनीति में छोटे दलों की सीमित पहुंच की ओर भी इशारा करता है।
चुनाव में 60 निकायों में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला है। दूसरी तरफ 11 निकाय ऐसे हैं जहां बीजेपी और कांग्रेस बराबर सीटों पर पहुंचीं। ऐसे निकायों में अब बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीय पार्षदों या दल बदल की भूमिका अहम हो सकती है।
सबसे दिलचस्प तस्वीर 100 वार्ड वाले जोधपुर नगर निगम में दिखाई दी, जहां बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने 44-44 वार्ड जीते हैं। यहां 10 निर्दलीय पार्षद निर्णायक स्थिति में हैं। इसके अलावा पीसांगन, अंता, कापरेन, राजलदेसर, बसेड़ी, सूरतगढ़, मारवाड़ जंक्शन, धरियावद और खाटूश्यामजी में भी बीजेपी-कांग्रेस के बीच बराबरी का मुकाबला रहा।
बीजेपी और कांग्रेस के वोट शेयर में सिर्फ 0.94 फीसदी का अंतर है, लेकिन बीजेपी ने वार्ड जीत में कांग्रेस पर 566 की बड़ी बढ़त बना ली।
इसका मतलब साफ है कि राजस्थान की शहरी राजनीति में दोनों प्रमुख दलों के बीच वोट आधार काफी करीब है, लेकिन वोटों का वार्डवार बंटवारा बीजेपी के पक्ष में ज्यादा सीटें लेकर आया। वहीं करीब 29 लाख वोट निर्दलीयों के खाते में जाना बताता है कि स्थानीय चुनावों में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और स्थानीय समीकरण भी बड़े राजनीतिक दलों की ताकत को चुनौती दे सकते हैं।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर और पड़ोसी डीग में बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं। भरतपुर की नदबई नगर पालिका में बड़ा रोचक और मार्मिक वाकया सामने आया, जहां एक मां के आखिरी वोट ने बेटे को चुनाव जिता दिया। निर्दलीय प्रत्याशी की मां का अगले दिन निधन हो गया। चुनाव में बेटा सिर्फ एक वोट के अंतर से जीत पाया और वह आखिरी वोट उसकी बीमार मां ने डाला था।
भरतपुर और डीग जिले (जो पहले एक ही भरतपुर जिले का हिस्सा थे) में कुल 13 शहरी स्थानीय निकायों के 415 वार्डों में से 262 पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते हैं। इन दोनों जिलों में कुल वार्डों में से 63.1 प्रतिशत पर निर्दलीय उम्मीदवार जीते। भरतपुर सीएम भजनलाल शर्मा का गृहक्षेत्र है। हालांकि वह राजस्थान विधानसभा में जयपुर की सांगानेर सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं।
इसमें सबसे दिलचस्प है मात्र 1 वोट पाने वाले भाजपा प्रत्याशी।
कैलाशचंद — वार्ड नंबर 13, परबतसर नगरपालिका, डीडवाना-कुचामन जिला
कैलाशचंद को मिले: केवल 1 वोट
कांग्रेस प्रत्याशी हीना खानम को: 376 वोट
निर्दलीय राशिद खान को: 195 वोट
परबतसर नगरपालिका में कुल 25 वार्ड हैं; कांग्रेस ने 13 और भाजपा ने 12 वार्ड जीते।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि कैलाशचंद स्वयं वार्ड 13 के मतदाता नहीं थे। उनका वोट वार्ड 12 में था। इसलिए उन्होंने कहा कि उन्हें मिला एक वोट भी उनका अपना नहीं था—अर्थात वार्ड 13 के किसी एक मतदाता ने उन्हें वोट दिया।
राजस्थान के 2026 के नगरीय निकाय चुनाव परिणामों को यदि केवल “भाजपा जीत गई और कांग्रेस हार गई” के रूप में देखा जाए तो तस्वीर अधूरी रह जाएगी। राज्य के 309 नगरीय निकायों के 10,244 वार्डों में भाजपा ने 4,179 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी का स्थान प्राप्त किया, जबकि कांग्रेस को 3,613 और निर्दलीयों को 2,273 वार्ड मिले। भाजपा और कांग्रेस के बीच वार्डों का अंतर 566 रहा। भाजपा ने जयपुर, उदयपुर, कोटा और भीलवाड़ा जैसे बड़े नगर निगमों में स्पष्ट बहुमत हासिल किया, जबकि बीकानेर में कांग्रेस ने बहुमत प्राप्त किया।
लेकिन इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक तथ्य यह है कि सीटों का अंतर और मतों का अंतर एक जैसा नहीं है। भाजपा को कुल मतों का लगभग 35.18 प्रतिशत, जबकि कांग्रेस को 34.24 प्रतिशत वोट मिले—अर्थात दोनों के बीच वोट शेयर का अंतर केवल 0.94 प्रतिशत अंक, लगभग 99,615 वोट रहा। यह परिणाम राजस्थान की राजनीति की उस खासियत को सामने लाता है जिसमें थोड़े-से वोटों का भौगोलिक वितरण बड़ी संख्या में सीटों का परिणाम बदल सकता है। इसलिए 4,179 वार्डों की भाजपा जीत को व्यापक जनादेश मानना एक पक्ष है, लेकिन दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि दोनों प्रमुख दलों के बीच लोकप्रिय मत का अंतर बहुत सीमित रहा।
पाँच बड़े भाजपा नेताओं के क्षेत्रों में कैसी रही भाजपा की स्थिति?
राजस्थान के 2026 नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा ने कुल 4,179 वार्ड जीतकर राज्य में पहला स्थान प्राप्त किया, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीयों ने 2,273 वार्ड जीते। इसलिए राज्यव्यापी तस्वीर भाजपा के पक्ष में है। लेकिन जब परिणाम को प्रमुख भाजपा नेताओं के प्रभाव क्षेत्रों में तोड़कर देखा जाता है, तो तस्वीर अधिक दिलचस्प हो जाती है—कहीं भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की है, तो कहीं पार्टी को स्थानीय संगठन, टिकट वितरण और व्यक्तिगत नेतृत्व को लेकर गंभीर संकेत मिले हैं।
1. वसुंधरा राजे : झालावाड़ में सबसे बड़ा झटका
पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के लिए यह परिणाम पाँचों नेताओं में सबसे अधिक चिंता वाला है। झालावाड़ को लंबे समय से राजे परिवार का मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता रहा है। लेकिन झालावाड़ नगर परिषद के 45 वार्डों में कांग्रेस ने 29 सीटें जीत लीं, जबकि भाजपा काफी पीछे रही।
यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राजे स्वयं झालरापाटन विधानसभा क्षेत्र से विधायक हैं। हालांकि झालावाड़ नगर परिषद को सीधे झालरापाटन विधानसभा का परिणाम मानना सही नहीं होगा, फिर भी इसे राजे के व्यापक राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र का महत्वपूर्ण शहरी संकेत माना जा सकता है। 2023 में झालरापाटन से राजे ने 53,193 मतों के बड़े अंतर से जीत हासिल की थी।
राजनीतिक संकेत: राजे का व्यक्तिगत विधानसभा आधार अभी भी मजबूत हो सकता है, लेकिन झालावाड़ शहर में भाजपा संगठन की कमजोरी या स्थानीय असंतोष को नजरअंदाज करना 2028 से पहले जोखिमपूर्ण होगा। कांग्रेस ने यहां केवल सीट नहीं जीती, बल्कि भाजपा के सबसे प्रतीकात्मक गढ़ों में से एक में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
मदन दिलावर : स्थानीय स्तर पर भाजपा मजबूत, लेकिन व्यक्तिगत वार्ड का संदेश अलग
शिक्षा मंत्री और रामगंज मंडी (SC) विधायक मदन दिलावर का मामला वसुंधरा राजे से अलग है। रामगंज मंडी उनका विधानसभा क्षेत्र है, लेकिन निकाय परिणाम को पूरे विधानसभा क्षेत्र का सीधा परिणाम मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि विधानसभा क्षेत्र में ग्रामीण हिस्से भी शामिल हैं। मदन दिलावर रामगंज मंडी से वर्तमान विधायक हैं।
उपलब्ध रिपोर्टों में दिलावर के अपने मतदान वार्ड में भाजपा की हार को उनके लिए व्यक्तिगत राजनीतिक झटके के रूप में रेखांकित किया गया है। वहीं राज्यव्यापी रिपोर्टों ने भी उल्लेख किया है कि मंत्री राजवर्धन सिंह राठौड़ और मदन दिलावर जैसे नेताओं के मतदान वाले वार्डों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
इसका अर्थ यह नहीं कि रामगंज मंडी विधानसभा क्षेत्र में भाजपा कमजोर हो गई है। बल्कि इसका ज्यादा सटीक अर्थ है कि व्यक्तिगत प्रभाव और पार्टी संगठन के बीच अंतर दिखाई दे रहा है। किसी मंत्री के अपने वार्ड में पार्टी उम्मीदवार का हारना स्थानीय नाराजगी, उम्मीदवार चयन अथवा वार्ड-स्तरीय समीकरण का संकेत हो सकता है।
भजनलाल शर्मा : भरतपुर में भाजपा को सबसे बड़ा स्थानीय झटका
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए सबसे महत्वपूर्ण परिणाम उनके गृह जिले भरतपुर का है। भरतपुर नगर निगम के 65 वार्डों में निर्दलीयों ने 36, भाजपा ने 20 और कांग्रेस ने 7 वार्ड जीते। यानी यहां भाजपा सबसे बड़ी पार्टी भी नहीं बन सकी और निर्दलीयों ने स्पष्ट रूप से स्थानीय राजनीतिक समीकरण बदल दिए।
यह परिणाम खास तौर पर महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि मुख्यमंत्री स्वयं भरतपुर से आते हैं। लेकिन यहां भी सावधानी जरूरी है—भरतपुर नगर निगम को मुख्यमंत्री के विधानसभा क्षेत्र का परिणाम नहीं कहा जा सकता। भजनलाल शर्मा वर्तमान में सागानेर से विधायक हैं; भरतपुर उनका गृह जिला है। इसलिए इसे मुख्यमंत्री के गृह-क्षेत्र की राजनीतिक परीक्षा कहना ज्यादा सही है।
सबसे बड़ा संदेश भाजपा के लिए यह है कि स्थानीय असंतोष होने पर मतदाता पार्टी से अलग होकर निर्दलीय को चुन सकता है। 36 निर्दलीय पार्षदों का आंकड़ा इतना बड़ा है कि इसे केवल “कुछ बागी उम्मीदवारों की सफलता” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
राजवर्धन सिंह राठौड़ : झोटवाड़ा में तस्वीर मिश्रित
कैबिनेट मंत्री और झोटवाड़ा विधायक राजवर्धन सिंह राठौड़ के क्षेत्र में तस्वीर भरतपुर या झालावाड़ जैसी एकतरफा नहीं है। उपलब्ध परिणामों के अनुसार जोटवाड़ा के घोषित 13 वार्डों में भाजपा 7, कांग्रेस 3 और निर्दलीय 3 पर रही; दो वार्डों में पुनर्मतदान होना था।
इसलिए यहां भाजपा की स्थिति को कमजोर कहना सही नहीं होगा। 13 में 7 सीटों के साथ भाजपा स्पष्ट रूप से आगे थी। लेकिन मंत्री के क्षेत्र में कांग्रेस और निर्दलीयों का भी प्रभाव दिखना यह बताता है कि राठौड़ को 2028 तक स्थानीय संगठन को और मजबूत करना होगा।
ओम बिरला : कोटा में मजबूत प्रदर्शन
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र को देखें तो तस्वीर सबसे सकारात्मक है। कोटा नगर निगम में भाजपा ने 55 वार्ड जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कांग्रेस लगभग 40 के आसपास रही और कुछ सीटें निर्दलीयों को मिलीं; कुछ वार्डों में EVM संबंधी प्रक्रिया के कारण परिणाम/पुनर्मतदान अलग से हुआ।
यह परिणाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कोटा ओम बिरला का लंबे समय से राजनीतिक आधार रहा है। वह 2014 से कोटा लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं और इससे पहले कोटा दक्षिण से विधायक भी रहे हैं।
ओम बिरला ने जिस वार्ड 83 में मतदान किया, वहां भी भाजपा की उपस्थिति चर्चा में रही। उपलब्ध रिपोर्टों में कोटा के कई वार्डों में भाजपा की जीत के अच्छे अंतर भी दर्ज हुए हैं—मसलन वार्ड 65 में भाजपा उम्मीदवार लगभग 2,500 वोट से जीते और वार्ड 98 में जीत का अंतर 430 वोट रहा।
निर्दलीयों का उभार सबसे बड़ा संदेश
इन चुनावों का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू निर्दलीय उम्मीदवारों का असाधारण प्रदर्शन है। 2,273 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत ने स्पष्ट कर दिया कि स्थानीय चुनावों में मतदाता केवल भाजपा और कांग्रेस के पार्टी-चिह्न पर निर्भर नहीं हैं। भरतपुर इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां 65 में से 36 वार्ड निर्दलीयों ने जीते, जबकि भाजपा को 20 और कांग्रेस को केवल 7 वार्ड मिले। इसी प्रकार जोधपुर, अजमेर और पाली जैसे नगरों में भी किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और निर्दलीयों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई।
यह भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। विधानसभा चुनाव में जहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता, जातीय-सामाजिक समीकरण और स्थानीय संगठन निर्णायक होते हैं, वहां निकाय चुनाव इन तत्वों को और अधिक प्रत्यक्ष रूप से सामने लाते हैं। निर्दलीयों की इतनी बड़ी संख्या यह बताती है कि स्थानीय स्तर पर टिकट वितरण से असंतुष्ट कार्यकर्ता, व्यक्तिगत प्रभाव वाले नेता और स्थानीय मुद्दों पर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार दोनों बड़े दलों के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं।
भाजपा की उपलब्धि : संगठन और शहरी पकड़
भाजपा के पक्ष में सबसे बड़ा सकारात्मक संकेत उसका शहरी संगठन और चुनावी मशीनरी है। पिछले निकाय चुनाव चक्र की तुलना में भाजपा के वार्ड प्रदर्शन में लगभग पांच प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी और कांग्रेस के प्रदर्शन में लगभग पांच प्रतिशत अंकों की गिरावट दर्ज की गई है। जयपुर, उदयपुर, कोटा और भीलवाड़ा जैसे महत्वपूर्ण शहरों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त करना भाजपा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जयपुर में भाजपा ने 78 वार्ड जीते, उदयपुर में 53 और भीलवाड़ा में 45 वार्ड जीते।
फिर भी इसे भाजपा के लिए निर्विवाद या एकतरफा जनादेश कहना उचित नहीं होगा। केवल 0.94 प्रतिशत के वोट-शेयर अंतर के मुकाबले 566 वार्डों की बढ़त बताती है कि चुनाव प्रणाली में वोटों के भौगोलिक वितरण का प्रभाव बहुत बड़ा रहा। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने परिणामों के बाद परिसीमन को लेकर सवाल उठाए हैं और दावा किया कि परिसीमन ने कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया; यह कांग्रेस का राजनीतिक आरोप है, जिसे स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता क्या है?
कांग्रेस की समस्या केवल 3,613 वार्डों पर रुक जाना नहीं है। अधिक गंभीर बात यह है कि वोट शेयर में वह भाजपा से केवल 0.94 प्रतिशत पीछे होने के बावजूद वार्डों में 566 सीट पीछे रह गई। इसका अर्थ है कि कांग्रेस के वोट कई स्थानों पर मौजूद होने के बावजूद उन्हें सीटों में बदलने की उसकी क्षमता कमजोर रही। दूसरी ओर, छोटे दलों और निर्दलीयों ने उसके पारंपरिक स्थानीय आधार को भी प्रभावित किया।
फिर भी कांग्रेस के लिए परिणाम पूरी तरह निराशाजनक नहीं हैं। अजमेर और पाली जैसे महत्वपूर्ण शहरी क्षेत्रों में वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, जबकि बीकानेर नगर निगम में उसने बहुमत हासिल किया। इसका अर्थ है कि राजस्थान में कांग्रेस का शहरी आधार समाप्त नहीं हुआ है; बल्कि वह असमान रूप से बंटा हुआ और कई क्षेत्रों में कमजोर हुआ है।
2028 के विधानसभा चुनाव के लिए असली सवाल
इन चुनावों को 2028 की विधानसभा राजनीति की प्रारंभिक राजनीतिक प्रयोगशाला माना जा सकता है, लेकिन सीधे-सीधे विधानसभा सीटों का पूर्वानुमान लगाना सही नहीं होगा। निकाय वार्ड और विधानसभा क्षेत्र की सीमाएं समान नहीं होतीं और स्थानीय चुनाव में उम्मीदवार तथा स्थानीय मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। फिर भी तीन संकेत विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—भाजपा का शहरी संगठन मजबूत है, कांग्रेस का वोट आधार अभी भी बड़ा है, और निर्दलीय/स्थानीय उम्मीदवार निर्णायक शक्ति बन सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण अगला अध्ययन करीबी हार का अध्ययन होना चाहिए। उदाहरण के लिए, जिन वार्डों में भाजपा 100, 500 या 1,000 वोट से कम अंतर से हारी, उन सभी वार्डों को विधानसभा क्षेत्रों में जोड़कर देखना चाहिए। उसके बाद यह देखना चाहिए कि उन वार्डों में NOTA के वोट हार के अंतर से अधिक थे या नहीं। राजस्थान निर्वाचन आयोग की Candidate Wise Votes व्यवस्था वार्ड स्तर पर प्रत्याशियों के वोट देखने की सुविधा देती है। यदि यह गणना पूरी हो जाए तो 2028 के लिए केवल “कौन जीता-कौन हारा” से कहीं अधिक उपयोगी Swing Map तैयार किया जा सकता है।





