रामायण भारतीय संस्कृति का मूल स्रोत माना जाता है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर सैकड़ों वर्षों से लोग ग्रंथ लिखते आ रहे हैं, फिर भी अघाते नहीं हैं। यह ग्रंथ भारत की विभिन्न भाषाओं के अलावा विश्व की कई भाषाओं में लिखा गया है। साहित्यिक रचनाओं का अभिप्राय ढूँढने के लिए रामायण आज भी समस्त भारतीय भाषाओं के लिए अक्षयकोष है। इसके साथ ही रामायण हमारी राष्ट्रीय अस्मिता और सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण आधार भी है। रामायण के अनुशीलन मात्र से ईश्वर के प्रति श्रद्धा और प्रेम का उदय होता है, भक्ति उत्पन्न होती है तथा अंतःकरण शुद्ध होता है।
इसलिए यह एक विलक्षण और चिरंजीवी ग्रंथ है। साहित्यिक दृष्टि से भी यह विश्व साहित्य की अमूल्य रचना है। इस पर धारावाहिक और अनेक चलचित्रों एवं फिल्मों का भी निर्माण हो चुका है। विश्व की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हो चुका है। रामायण में तत्कालीन समाज के रीति-रिवाजों और शासन पद्धति का वर्णन किया गया है। शाश्वत मूल्यों के विकास में रामायण की महत्ता आज भी उतनी ही है जितनी प्राचीन काल में थी। रामायण की रचना मानव के जीवन के सर्वांगीण विकास और शाश्वत जीवन-मूल्यों को प्रेरित करने के उद्देश्य से की गई है, जैसे—भ्रातृ-प्रेम, त्याग, सत्य, प्रतिज्ञा-पालन, आज्ञा-पालन आदि।
फिजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम, जमैका आदि देशों में पहुँचे और अपने साथ तुलसीदासकृत रामायण ले गए, जो हर संकट और संघर्ष में उनका सहायक बनी।
प्रवासी भारतीयों की दूसरी धारा भी पूर्व और पश्चिम के अनेक देशों में गई, जो अपेक्षाकृत नवीन है—विशेष रूप से 20वीं सदी की और उसमें भी 1947 के भारत विभाजन के बाद की। गत शताब्दी में ही विभाजन से पूर्व लाखों की संख्या में दक्षिण भारतीय और गुजराती क्रमशः मलाया, बर्मा, श्रीलंका और अफ्रीकी देशों में फैल चुके थे। ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीयों का प्रवास लगभग इसी शताब्दी का है। इन भारतीयों के साथ भी रामायण की धारा विश्व के कोने-कोने में फैली, जिसका माध्यम चाहे रामचरितमानस रहा हो अथवा वाल्मीकि रामायण या कंबन रामायण आदि।
विगत कुछ समय से विश्व के कुछ देशों में लोकतंत्र के असंतुलित होते जा रहे स्वरूप को लेकर बुद्धिजीवी वर्ग की चिंता बढ़ी है। रामायण कालीन भारत में लोक-लालित्य का जीवन था, जबकि सत्ता के दंड का संचालन भी था और लोक में विलय की सांस्कृतिक अर्थों में व्याख्या रामायण में राम द्वारा अपनाए गए ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘सर्वभूत हिते रतः’ जैसे लोकतंत्र के आधार स्तंभ नियम हैं, जिन्हें श्रीराम ने राजा होते हुए भी निभाया। यदि आज ऐसी लोकतंत्र की अवधारणा को आत्मसात कर लिया जाए तो संभवतः आज हम विश्व में सर्वाधिक खुशहाल और संपन्न लोकतांत्रिक राष्ट्र बन गए होते। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि विश्व मानचित्र के लगभग दो-तिहाई हिस्से को रामायण ने अनेक स्तरों पर और अनेक रूपों में प्रभावित किया है। आज भी मिस्र और रोम से लेकर वियतनाम, कंबोडिया और यहाँ इंडोनेशिया तक रामायण संस्कृति का व्यापक प्रभाव देखा जा सकता है। वैश्विक जनमानस को जिस कथा ने सर्वाधिक प्रभावित किया है वह रामायण ही है।
साभार- http://www.historyjournal.net से





