Monday, July 22, 2024
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महात्मा गांधी के राजदर्शन की प्रासंगिकता

महात्मा गांधी ने अहमदाबाद मिल मजदूरों के क्षेत्रीय आंदोलन में ‘ उपवास’ का पहली बार प्रयोग किया था ,और गांधीजी आंदोलन में नैतिक दबाव बनाने में सफल रहे थे। गांधी जी ने कांग्रेस संगठन में प्रवेश कर उसे एक जनसंगठन के रूप मेंपरिणित किया था। गांधी जी के कुशल नेतृत्व में कांग्रेस ने अपने आप को जनता से जोड़ने का कार्य किया एवं जनता को शिक्षित करना, जनता को प्रशिक्षित करना एवं जनता को अनुशासित करना एवं अपने मौलिक अधिकारों के लिए अहिंसक संघर्ष करना जनता को सिखाया था।

महात्मा गांधी ने कांग्रेस को जनसंगठन बनाने के लिए कई प्रकार से कार्यों को अमलीजामा पहुंचाए थे। कांग्रेस की सदस्यता राशि न्यूनतम रखा (जिससे आम जनता को भार ना हो ),हिंदी भाषा को सम्मेलनों का आधार बनाए, सभी कांग्रेसी नेताओं एवं कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को “खादी पहनना” अनिवार्य किया एवं गांव से लेकर कस्बों, राज्यों एवं केंद्र तक कई चरणों में समितियों का निर्माण किया ,जिससे संगठन गांव और कस्बों तक विस्तारित किया जा सके। गांधीजी कांग्रेस को एक मजबूत संगठन के रूप में परिणति करते हुए भारत की आम जनता की आवाज के रूप में स्थापित किया जिससे अंग्रेजों को प्रत्येक नीति बनाने से पूर्व या पश्चात इस संगठन से वार्तालाप करना अनिवार्य हो गया था।

प्रसिद्ध इतिहासकार एडवर्ड थॉमसन ने गांधी जी से मिलकर के कहा है कि सुकरात के बाद इस संसार में उसके समान स्व नियंत्रित तथा मानसिक संतुलन वाला व्यक्ति नहीं देखा है। उसने कहा था कि अब उसे समझ में आया है कि एथेंस वासियों ने सुकरात को जहर क्यों दिया था? गांधीजी समझ चुके थे कि भारत के हिंदू समाज में तनाव की स्थिति बढ़ती जा रही है और इसलिए उन्होंने अस्पृश्यता विरोधी अपने अभियान को और तेज किए। गांधीजी ने श्री घनश्याम दास बिरला के सभापति में हरिजनोद्वार के लिए एक अखिल भारतीय संगठन बनाया और श्री ठक्कर बाबा उसके मंत्री नियुक्त किए गए। यही संगठन कालांतर में जाकर अखिल भारतीय हरिजन सेवक संघ में विकसित हुआ। महात्मा गांधी ने साबरमती आश्रम को हरिजन सेवक संघ को दान कर दिया था।

वर्ष 1933 में गांधी जी ने लिखा है कि अंतरजातीय भोजन एवं अंतरजातीय विवाह अस्पृश्यता को समाप्त करने एवं भ्रातृत्व की भावना को बढ़ाने के लिए आवश्यक उपकरण है। राजनीति में अहिंसा के सफल प्रयोग के वह आविष्कारक हैं ।विश्व में सत्ता के विरोध में होने वाले आंदोलनों में असहयोग आंदोलन(NCM ),सविनय अवज्ञा आंदोलन (सीडीएम) ,भारत छोड़ो आंदोलन(Qit ),भूख हड़ताल, धरना ,ज्ञापन और मांग पत्र इत्यादि का उपयोग महात्मा गांधी की उपादेयता है। भारतीय राजनीति में’ सत्याग्रह’ शब्द का प्रयोग महात्मा गांधी का सफलतम देन है। सत्याग्रह का उद्देश्य विरोधी को डराना, धमकाना या प्रताड़ित करना नहीं है अपितु उसका हृदय परिवर्तन करना है ,जिससे वह सत्य को स्वीकार कर सके। अहिंसा विवेक से अधिक शक्तिशाली हथियार है ।अहिंसा आत्मतप के माध्यम से विरोधी का हृदय परिवर्तन करने के लिए सक्षम होती है। सत्याग्रह व्यक्तिगत हितों को पूरा करने के लिए नहीं अपितु सामूहिक हितों तथा नैतिक रूप से सत्य के लिए लड़ा जाने वाला युद्ध हैं ।सत्याग्रह के चार अभिन्न हिस्से हैं
1. सत्य;
2. अहिंसा;
3. आत्म पीड़ा एवं
4.व्यक्ति

जीन शार्प ने अहिंसात्मक विरोध के 198 तरीके बताएं जो गांधीवादी आंदोलन (असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान प्रयोग कर दिया गया है)। वैश्विक स्तर पर मार्टिन लूथर किंग और नेल्सन मंडेला जैसे महान नेता महात्मा गांधी को अपना प्रेरक आदर्श व्यक्तित्व मानते थे। महात्मा गांधी जी विश्व में अन्याय के अहिंसात्मक विरोध के प्रतीक थे। महात्मा गांधी दार्शनिक, धार्मिक ,राजनेता, आहार विशेषज्ञ ,चिकित्सक, लेखक पत्रकार, प्रकाशक एवं कुशल संगठन कर्ता थे। गांधीजी के पर्यावरण संबंधी विचारों से प्रेरणा लेकर ‘ अर्ने नेस ‘ ‘ डीप इकोलॉजी’ का सिद्धांत दिया था ।अर्थशास्त्री ई . एफ.शुमेखर ने अपनी लोकप्रिय पुस्तक’ स्माल इज ब्यूटीफुल’ में गांधीवादी आर्थिक संरचना को आर्थिक विकास का सही मॉडल बनाया है ।गांधीजी के उपादेयता के कारण रविंद्र नाथ टैगोर ने सार्वजनिक रूप से’ महात्मा’ कहा था। सुभाष चंद्र बोस ने ‘ राष्ट्रपिता ‘ कहा है और जन सामान्य ने ‘ बापू’ का नाम दिया है।

2007 में संयुक्त राष्ट्र संघ की सामान्य सभा द्वारा गांधी जी के जन्म दिवस 2 अक्टूबर को ‘ अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ मनाने की घोषणा की गई थी। गांधी जी का उपादेयता था कि नीतिगत निर्णय लेते समय सबसे गरीब और कमजोर व्यक्ति को ध्यान रखना चाहिए कि सबका कल्याण हो ।1919 में खिलाफत आंदोलन से उन्हें लगा कि मुस्लिम सहयोग से भारत शीघ्र स्वतंत्र हो जाएगा तथा उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ा जा सकेगा। राजनीति के क्षेत्र में वह धर्ममय राजनीति के महान पोषक तथा पक्षधर थे । महात्मा गांधी अपने देश के स्वतंत्रता संघर्ष में 1919 से 1944 तक नेतृत्व किए थे, इसी कारण वर्ष 1919 से 1948 तक के काल को “गांधीवादी काल “की संज्ञा दी जाती है ।महात्मा गांधी जी गीता के अनन्य भक्त थे तथा कर्म के अटल सिद्धांत में पूरा आस्था रखते थे। उनका मत था कि गीता का आदर्श सदा – सर्वदा के लिए सत्य है, उनकी सर्वदा इच्छा रही की वे गीता को कंठस्थ कर लें।

महात्मा गांधी गोरक्षा का अर्थ ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा बतलाए ।महात्मा गांधी गोरक्षा को हिंदू धर्म का केंद्रीय बिंदु मानते हैं ।उनका कहना है कि “जो हिंदू गौ रक्षा के लिए जितना तत्पर है वह उतना ही श्रेष्ठ हिंदू है “।गांधीजी गाय को माननीय सृष्टि का पवित्रमय रूप” माना है ।महात्मा जी के अनुसार “हिंदुस्तान में गाय ही मनुष्य का सबसे सच्चा साथी, सबसे बड़ा आधार है । गाय हिंदुस्तान की कामधेनु है। गाय दूध ही नहीं देती बल्कि सारी खेती का आधार – स्तंभ थी ।गाय दया धर्म की मूर्तिमान कविता है। इस गरीब और शरीफ जानवर में हम केवल दया ही उमरते देखते हैं। लाखों करोड़ों हिंदुस्तानियों का पालन करने वाली माता है “।महात्मा गांधी के प्रमुख शिष्य विनोबा भावे का कथन था कि” गौ – हत्या मातृ हत्याही है “।

गांधीजी को पूर्ण विश्वास था कि भारत की स्वतंत्रता के साथ गोहत्या पर प्रतिबंध लग जाएगा ।उन्होंने यह भी कहा था कि “गोवध बंद न करने पर स्वराज का महत्व नहीं रहता, जिस दिन भारत स्वतंत्र होगा सब बूचड़खाने बंद कर दिए जाएंगे “।सामाजिक दृष्टि में भारतीय जनमानस में उत्पन्न अनेक बुराइयों एवं दोषों का वर्णन करते हुए उन्होंने छुआछूत को प्रमुखता से लिया है। वे छुआछूत को धार्मिक नहीं, बल्कि वे शैतान की चाल कहते हैं। उन्होंने इसे हिंदू धर्म के मस्तक पर लगा कलंक बताया था। उन्होंने छुआछूत के नियमों को आत्मा के विकास में बाधक बताया था ।नितिन गडकरी ने महात्मा गांधी के विचारों पर कहा है कि “महात्मा गांधी के समय राजनीति समाज ,राज्य एवं संविधान के विकास के लिए होती थी, लेकिन अब राजनीति सिर्फ सत्ता के लिए होती है कभी-कभी उनका मन है राजनीति छोड़ देने को करता है”।

महात्मा गांधी ने उदार वादियों तथा राष्ट्र वादियों को एक मंच पर लाने के लिए नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस का लक्ष्य शांतिपूर्ण तथा कानूनी तरीकों से भारत की जनता द्वारा स्वशासन की प्राप्ति बताया था । गांधीजी का रौलट एक्ट विरोधी सत्याग्रह आंदोलन के अतिरिक्त 1919से 1944 के दौरान अखिल भारतीय स्तर पर 3 बड़े आंदोलन किए। सभी आंदोलनों में अधिराज्य (डोमिनियन स्टेटस)के विभिन्न भागों के विभिन्न संप्रदायों की सहभगिता थी। लंबे काल तक चले आंदोलनों के कारण इन्हें गांधीवादी आंदोलन या गांधी युग के नाम से भी पुकारा जाता है ।एक बार लुई फिशर 1942 में सेवाग्राम आश्रम में गांधीजी से पहली बार मिलने गया तो गांधीजी ने कहा कि” मैं तुम्हें बताऊंगा कि वह कौन सी घटना थी जिसके कारण मैंने अंग्रेजों के भारत छोड़ने पर जोर देने का निश्चय किया। यह घटना1 917 की है”।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में महात्मा गांधी ने क्षेत्रीय स्तर पर तीन एवं अखिल भारतीय स्तर पर तीन आंदोलन का सफल नेतृत्व किया था। महात्मा गांधी जी की उपादेयता इस तथ्य में निहित है कि इनका आंदोलन पूर्णत: अहिंसात्मक था। शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को महात्मा जी के जन नेतृत्व/लोक नेतृत्व के सामने घुटने टेकना पड़ा था। गांधीजी के सफल नेतृत्व में कांग्रेस ने अपने आप को जनता से जोड़ने का कार्य किया एवं जनता को शिक्षित करना, जनता को प्रशिक्षित करना एवं जनता को अनुशासित करना एवं अपने मौलिक अधिकारों के लिए अहिंसक संघर्ष करना जनता को सिखाया था। महात्मा जी ने कांग्रेस को जन सहमति पर आधारित संगठन बनाने का प्रयास किए, इसके लिए कांग्रेस की सदस्यता की राशि न्यूनतम रखा( जिसको आम जनता के लिए भार ना हो),हिंदी भाषा को सम्मेलनों का आधार बनाया, सभी कांग्रेसी नेताओं को खादी पहनना अनिवार्य किया था

(लेखक प्राध्यापक एवँ राजनीतिक विश्लेषक हैं) ।

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