Tuesday, April 16, 2024
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सामाजिक न्याय की प्रासंगिकता

सामाजिक न्याय का विचार सभी मनुष्य को समान मानने की धारणा पर आधारित है ।इस विचार के अनुसार किसी व्यक्ति के साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों के आधार पर भेदभाव नहीं होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के पास इतने न्यूनतम संसाधन होने चाहिए कि वह” उत्तम जीवन” व” खुशामद जीवन” की संकल्पना को साकार कर सकें। सामाजिक न्याय का आशय सभी व्यक्तियों का मूलभूत सुविधाओं तक पहुंच होना है, जिससे यह  सामाजिक परिवर्तन और जनता के सशक्तिकरण का शक्तिशाली उपकरण होकर सबका प्रभावशाली संवाहक यंत्र हो सके।
भारत के संविधान की उद्देशिका (प्रस्तावना)की उपादेयता को रेखांकित करते हुए सभी व्यक्तियों के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को प्रदान करने के साथ ही सामाजिक स्तर और आर्थिक उन्नयन के स्तर पर समानता को उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध सामाजिक न्याय की अवधारणा उद्देशिका में स्पष्ट है ।
मौलिक अधिकार की उपादेयता सामाजिक क्रांति के प्रयोजन के लिए है। सामाजिक क्रांति के लिए आवश्यक अवयव  समानता का अधिकार(अनुच्छेद 14), भेदभाव का निषेध(अनुच्छेद 16), सबको समान अवसर मिले(अनुच्छेद 16), अस्पृश्यता का निषेध हो (अनुच्छेद 17),मानव तस्करी और बेगार प्रतिबंधित हो(अनुच्छेद23) और बाल श्रम पर रोक लगे(अनुच्छेद24) और  सामाजिक न्याय के सशक्तिकरण के लिए अल्पसंख्यकों के अधिकारों को भी संविधान द्वारा संरक्षित किया गया है। वर्ग, समुदाय ,धर्म ,जाति  एवं राजनीतिक कद को परे रखकर समाज के प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए अवसर उपलब्ध कराना ही  सामाजिक न्याय है। सामाजिक न्याय का सिद्धांत वंचित वर्गों( अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और विकलांगों) को आरक्षण और  अन्य अवसर उपलब्ध कराने के लिए मार्ग प्रशस्त करना  है।
समाजिक न्याय की संकल्पना के अंतर्गत समाज के निचले पायदान पर खड़े व्यक्तियों को सहायता प्रदान करके उनको मुख्यधारा में ला दिया जाए; जिससे समाज में सामाजिक न्याय का  अवयव स्पष्ट दिखाई दे। समाज से सभी प्रकार के शोषण, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असमानता  को समाप्त करके समस्त नागरिकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है। उपयोगिता वादी चिंतकों ने “अधिकतम लोगों के अधिकतम कल्याण” की अवधारणा दिया, व समाज  में समाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूती प्रदान किया था।
सामाजिक न्याय को  स्थापित करने में गरीबी हटाने, बेरोजगारी को दूर करने ,वेश्यावृत्ति को समाप्त करने ,बीमारी की अवस्था में सहायता करने और बुढ़ापे में सहयोग और  समतावादी समाज के निर्माण में सुनिश्चित किया गया है ।भारत के संविधान के अनुच्छेद 39 (बी) और( सी) की प्रासंगिकता पर बल देते हुए केशवानंद भारती के मामले में उच्चतम न्यायालय का कहना था कि संविधान के इन भागों में अन्य प्रावधानों के साथ एक प्रमुख उद्देश्य यह भी  है कि लोक कल्याणकारी समाज और समतामूलक समाज की स्थापना की जाए ।सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए अहिंसक सामाजिक क्रांति को सुनिश्चित करके ऐसे सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य रखे जाएं जिनकी  पूर्ति समाज को आवश्यक रूप से की जाए।
अहिंसक सामाजिक क्रांति को सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक और आर्थिक उद्देश्य रखा जाए, जिनकी आपूर्ति सामाजिक उन्नयन में की जा सके। इस तरह की सामाजिक क्रांति से आम आदमी की बुनियादी आवश्यकताओं(रोटी,कपड़ा एवं मकान) की पूर्ति के साथ समाज की संरचना को बदला जा सकता है ;जिससे राजनीतिक लोकतंत्र को उदीयमान सफलता प्राप्त हो सके।  सामाजिक न्याय की अवधारणा को पूर्ण करने के लिए गरीबी से ग्रस्त समाज के विकास के लिए बुनियादी आवश्यकताओं जैसे  विद्यालय, स्वास्थ्य सेवाएं, नागरिक समाज के लिए सुरक्षा, संरक्षा एवं औषधि प्रदान करके कार्य  किया जाए, मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के द्वारा गरीबी व बेरोजगारी समाप्त करने का प्रयास किया गया है।
 भारत के संविधान में विभिन्न सामंती और सामाजिक विभेद  वाले समाज को एक समतामूलक व शोषण मूलक समाज का स्वरूप प्रदान किया है। 1 976 में संविधान के 42 वें संशोधन के द्वारा प्रस्तावना में “समाजवादी” व “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़ा गया था, जिसने सामाजिक और आर्थिक न्याय के संवैधानिक तत्व को मजबूत किया है ।भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 जो  प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता व  कानून के समान संरक्षण के सिद्धांत का पैरवी किया, जो सामाजिक न्याय की दिशा में मील का पत्थर साबित हुआ है। सामाजिक न्याय के विषय पर डॉ राजेंद्र प्रसाद का कहना था कि “जब प्रत्येक व्यक्ति स्वतंत्र होगा और उसे अपने विकास के उच्चतम स्तर पर पहुंचने के संसाधन उपलब्ध होगें; जब गरीबी ,गंदगी ,अज्ञानता और रोगों का नामो निशान नहीं रहेगा; जब समाज में ऊंच-नीच, अमीर – गरीब का भेदभाव समाप्त होगा; जब अस्पृश्यता की सामाजिक कुरीति का उन्मूलन होगा एवं व्यक्ति द्वारा व्यक्ति के शोषण का अस्तित्व समाप्त होगा”। वास्तविक अर्थों में यही सामाजिक न्याय की संकल्पना है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
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