Saturday, July 13, 2024
spot_img
Homeदुनिया मेरे आगेशालिग्राम शिला नहीं मानों रामजी स्वयं लोगों के बीच आ गए

शालिग्राम शिला नहीं मानों रामजी स्वयं लोगों के बीच आ गए

रात्रि विलंब से लौटा एक रात्रि भोज से जिसमें फ़िल्म उद्योग से जुड़े कुछ मित्र थे। कुछ महानुभाव चंडीगढ़ से आये थे ये जानने के लिये कि ‘बालिवुड’ की समस्यायें क्या हैं और उनके क्या समाधान हैं जो हमारे प्रिय प्रधानमंत्री जी को सुझाये जा सकें। ऐसी पार्टियों में कुछ होता नहीं है वैसे। सब अपनी अपनी कहते हैं, कुछ सच, कुछ झूठ, अधिकतर अर्थहीन बकवास, कुछ खाना-पीना होता है, कुछेक संपर्क सूत्र बनते हैं, धंधा चलता रहता है। सत्ता के निकट रहने का चाव है सब को।

प्रात: काल में उठा तो व्हाट्स ऐप पर गया। मेरे लिये भारत और विश्व के समाचार जानने का माध्यम सोशल मीडिया ही है। ट्वीटर पर प्रतिबंधित होने के बाद व्हाट्स ऐप और यू ट्यूब से काम चलाता हूँ।

मेरे एक पुराने सहकर्मी अरविंद पांडेय की एक पोस्ट पढ़ी। सर्वेश तिवारी जी के लिखे शब्दों को अरविंद आगे बढ़ा रहे थे। अरविंद ने मेरी २३ वर्ष पूर्व बनी टी वी श्रृंखला में काम किया था। वो मेरी तरह ही संवेदनशील व्यक्ति हैं, एक सुंदर अभिनेता और अभिनय कला के शिक्षक हैं।

सर्वेश तिवारी जी का लेख पढ़ा और खूब रोया। प्रात: वेला में छलकी अश्रु धारा ने मानो क्लेशित, कलुषित और थकित मन-मस्तिष्क को पवित्र गंगा जल से धो दिया हो। हिंदु मन स्वभावत: निश्छल होता है। सर्वेश तिवारी जी के शब्द उस निश्छलता के ही द्योतक थे और जब भी प्रभु राम और माँ जानकी की कल्पना मन में उभरती है तो छल-कपट और असत्य तिरोहित हो जाते हैं। फिर मुझे अनायास ही अपनी माता जी का स्मरण हो आया, उनका पूजा पाठ, सब स्मृति पटल पर ऊभरे। अपने माता-पिता से सब से बड़ा गुण यही ग्रहण किया है मैंने। निश्छलता।

तो आप सब के लिये सर्वेश तिवारी जी के शब्द ज्यों के त्यों रख रहा हूँ। राम होने का अर्थ क्या है पढ़िए गोपालपुर के सर्वेश कुमार तिवारी जी की इस पोस्ट में।
“मैंने अपने शहर को इतना विह्वल कभी नहीं देखा! तीन से चार लाख लोग सड़क किनारे हाथ जोड़े खड़े हैं।

अयोध्या में प्रभु की मूर्ति बनाने के लिए नेपाल से शालिग्राम पत्थर जा रहा है, और आज वह ट्रक गोपालगंज से गुजर रहा है। कोई प्रचार नहीं, कोई बुलाहट नहीं, पर सारे लोग निकल आये हैं सड़क पर… युवक, बूढ़े, बच्चे… बूढ़ी स्त्रियां, घूंघट ओढ़े खड़ी दुल्हनें, बच्चियां…

स्त्रियां हाथ में जल अक्षत ले कर सुबह से खड़ी हैं सड़क किनारे! ट्रक सामने आता है तो विह्वल हो कर दौड़ पड़ती हैं उसके आगे… छलछलाई आंखों से निहार रही हैं उस पत्थर को, जिसे राम होना है।

बूढ़ी महिलाएं, जो शायद शालिग्राम पत्थर के राम-लखन बनने के बाद नहीं देख सकेंगी। वे निहार लेना चाहती हैं अपने राम को… निर्जीव पत्थर में भी अपने आराध्य को देख लेने की शक्ति पाने के लिए किसी सभ्यता को आध्यात्म का उच्चतम स्तर छूना पड़ता है। हमारी इन माताओं, बहनों, भाइयों को यह सहज ही मिल गया है।

जो लड़कियां अपने वस्त्रों के कारण हमें संस्कार हीन लगती हैं, वे हाथ जोड़े खड़ी हैं। उदण्ड कहे जाने वाले लड़के उत्साह में हैं, इधर से उधर दौड़ रहे हैं। मैं भी उन्ही के साथ दौड़ रहा हूँ।

इस भीड़ की कोई जाति नहीं है। लोग भूल गए हैं अमीर गरीब का भेद, लोग भूल गए अपनी जाति- गोत्र! उन्हें बस इतना याद है कि उनके गाँव से होकर उनके राम जा रहे हैं।

हमारे यहाँ कहते हैं कि सिया को बियह के रामजी इसी राह से गये थे। डुमरिया में उन्होंने नदी पार की थी। हम सौभाग्यशाली लोग हैं जो रामजी को दुबारा जाते देख रहे हैं।

पाँच सौ वर्ष की प्रतीक्षा और असँख्य पीढ़ियों की तपस्या ने हमें यह सौभाग्य दिया है। हम जी लेना चाहते हैं इस पल को… हम पा लेना चाहते हैं यह आनन्द! माझा से लेकर गोपालगंज तक, मैं इस यात्रा में दस किलोमीटर तक चला हूँ, दोनों ओर लगातार भीड़ है।

कोई नेता, कोई संत, कोई विचारधारा इतनी भीड़ इकट्ठा नहीं कर सकती, यह उत्साह पैदा नहीं कर सकती। सबको जोड़ देने की यह शक्ति केवल और केवल धर्म में है, मेरे राम जी में है।

गोपालगंज में कुछ देर का हॉल्ट है। साथ चल रहे लोगों के भोजन की व्यवस्था है, सो घण्टे भर के लिए ट्रक रुक गया है। लोग इसी समय आगे बढ़ कर पत्थर को छू लेना चाहते हैं। मैं भी भीड़ में घुसा हूँ, आधे घण्टे की ठेलमठेल के बाद ठाकुरजी को स्पर्श करने का सुख… अहा!कुछ अनुभव लिखे नहीं जा सकते।

उसी समय ऊपर खड़ा स्वयंसेवक शालिग्राम पर चढ़ाई गयी माला प्रसाद स्वरूप फेंकता है। संयोग से माला मेरे हाथ में आ गिरती है। मैं प्रसन्न हो कर अंजुरी में माला लिए भीड़ से बाहर निकलता हूँ। पर यह क्या, किनारे खड़ी स्त्रियां हाथ पसार रही हैं मेरे आगे… भइया एक फूल दे दीजिये, बाबू एक फूल दे दीजिये। अच्छे अच्छे सम्पन्न घरों की देवियाँ हाथ पसार रही हैं मेरे आगे! यह रामजी का प्रभाव है।

मैं सबको एक एक फूल देते निकल रहा हूँ। फिर भी कुछ बच गए हैं मेरे पास! ये फूल मेरा सौभाग्य हैं…

कुछ लोग समझ रहे हैं कि एक सौ तीस रुपये में खरीद कर रामचरितमानस की प्रति जला वे हमारी आस्था को चोटिल कर देंगे। उन मूर्खों को कुछ नहीं मालूम… यह भीड़ गवाही दे रही है कि राम जी का यह देश अजर अमर है, यह सभ्यता अजर अमर है, राम अजर अमर हैं…”

साभार- kjullamkhulla.wordpress.com से

image_print

एक निवेदन

ये साईट भारतीय जीवन मूल्यों और संस्कृति को समर्पित है। हिंदी के विद्वान लेखक अपने शोधपूर्ण लेखों से इसे समृध्द करते हैं। जिन विषयों पर देश का मैन लाईन मीडिया मौन रहता है, हम उन मुद्दों को देश के सामने लाते हैं। इस साईट के संचालन में हमारा कोई आर्थिक व कारोबारी आधार नहीं है। ये साईट भारतीयता की सोच रखने वाले स्नेही जनों के सहयोग से चल रही है। यदि आप अपनी ओर से कोई सहयोग देना चाहें तो आपका स्वागत है। आपका छोटा सा सहयोग भी हमें इस साईट को और समृध्द करने और भारतीय जीवन मूल्यों को प्रचारित-प्रसारित करने के लिए प्रेरित करेगा।

RELATED ARTICLES
- Advertisment -spot_img

लोकप्रिय

उपभोक्ता मंच

- Advertisment -

वार त्यौहार