9वीं शताब्दी में जैन मुनि कुमुदेंदु आचार्य जिस तकनीक का उपयोग करते हुए सिरी भूवलय की रचना कर रहे थे। लगभग वैसी ही तकनीक से 16 वीं शताब्दी में प्रसिद्ध अंग्रेज ज्योतिषी और जादूगर जॉन डी (John Dee) और उनके सहयोगी एडवर्ड केली लोगाएथ ग्रिड की रचना कर रहे थे।
इस ग्रंथ को **जैन मुनि कुमुदेंदु आचार्य ** ने लगभग 9वीं शताब्दी के आसपास लिखा था।
यह चित्र जिस 'सिरी भूवलय' ग्रंथ से है, उसकी कुछ अविश्वसनीय बातें आपको जरूर जाननी चाहिए:
1. यह केवल संख्याओं का खेल नहीं, एक 'यूनिवर्सल भाषा' है। इस ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें कोई अक्षर या शब्द नहीं लिखे गए हैं। पूरा ग्रंथ 1 से 64 तक की संख्याओं  के ग्रिड्स से बना है। मुनि कुमुदेंदु ने कन्नड़ लिपि के 64 अक्षरों (ध्वनियों) को 1 से 64 तक के अंकों से बदल दिया। यानी यह प्राचीन भारत का डिजिटल या बाइनरी कोड जैसा प्रयास था।
2. एक ही ग्रिड में कई भाषाएँः इस ग्रंथ को डिकोड करना इसलिए भी चुनौतीपूर्ण और जादुई है क्योंकि इसके चक्रों को अलग-अलग पैटर्न में पढ़ने पर अलग-अलग भाषाएँ निकलती हैं:
यदि आप इसे सीधे (Horizontally) पढ़ेंगे, तो एक भाषा निकलेगी (जैसे प्राकृत या कन्नड़)।
यदि आप इसे ऊपर से नीचे या तिरछे पढ़ेंगे, तो संस्कृत, तमिल, तेलुगु, या पालि जैसी अन्य भाषाएँ प्रकट होंगी।
कहा जाता है कि इस अकेले ग्रंथ में गणितीय पैटर्न के आधार पर **718 भाषाएँ** और 18 लिपियाँ छिपी हुई हैं!
3. चित्र की संरचना: 27x27 का चक्र
चित्र में सिरी भूवलय के 27x27 खानों वाले चक्र का एक हिस्सा है। ग्रंथ के मूल संस्करण में कुल 6 लाख श्लोक हैं जो इसी प्रकार के महाचक्रों में समाहित हैं। इसमें केवल धार्मिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि विज्ञान, खगोलशास्त्र , रसायन शास्त्र और गणित के गुप्त सूत्र भी संख्याओं के जाल में बांधकर रखे गए हैं।
इसे डिकोड करने वाले आधुनिक विद्वानों का मानना है कि मुनि कुमुदेंदु ने ज्ञान को हमेशा के लिए सुरक्षित करने और विदेशी आक्रमणकारियों से बचाने के लिए इस अचूक 'क्रिप्टोग्राफिक' पद्धति का आविष्कार किया था।
लिबर लोगाएथ , जिसे 'इनोकियन मैजिक' (Enochian Magic) के संदर्भ में एक अत्यंत रहस्यमय ग्रंथ माना जाता है, 16वीं शताब्दी के प्रसिद्ध अंग्रेज ज्योतिषी और जादूगर जॉन डी और उनके सहयोगी एडवर्ड केली से संबंधित है।
अर्थ और उत्पत्ति:- 'लोगाएथ' का अर्थ स्वर्गदूतों की भाषा में "ईश्वर की वाणी" बताया जाता है। माना जाता है कि इसी भाषा का उपयोग करके ईश्वर ने ब्रह्मांड की रचना की थी।  इसे अक्सर "इनोकियन पुस्तक" भी कहा जाता है (हालांकि इसे बाइबिल की प्राचीन 'बुक ऑफ इनोक' से भ्रमित नहीं करना चाहिए)। इसमें 73 पृष्ठ हैं जिनमें जटिल अक्षरों के ग्रिड और तालिकाएं दी गई हैं।
जॉन डी और एडवर्ड केली का मानना था कि उन्हें स्वर्गदूतों द्वारा यह रहस्यमय ज्ञान दिया गया है ताकि वे आने वाले समय और मानवता के उद्धार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें। डी के अनुसार, यह पुस्तक दुनिया के रहस्यों, निर्माण और अंत की कुंजी थी।
यह पुस्तक अपनी जटिलता के लिए जानी जाती है। इसके उपयोग के लिए कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिए गए थे; कहा जाता है कि स्वर्गदूतों ने इसे उपयोग करने की विधि बताने से परहेज किया था, यह कहते हुए कि इसका सही समय केवल ईश्वर ही निर्धारित कर सकता है। सरल शब्दों में, यह एक गूढ़ हस्तलिपि है जिसे एक 'दिव्य भाषा' या 'एंजेलिक भाषा' का स्रोत माना जाता है, और आज भी यह रहस्यवाद और जादू के इतिहास में शोध का एक विषय बनी हुई है।
लिबर लोगाएथ का विषय पश्चिमी रहस्यवाद के इतिहास में सबसे जटिल और रहस्यमय अध्यायों में से एक है। जॉन डी और एडवर्ड केली के दावों के अनुसार, यह कोई इंसानी रचना नहीं थी, बल्कि स्वर्गदूतों द्वारा सीधे बोलकर लिखवाई गई एक 'दिव्य पुस्तक' थी। इसकी गहराई को समझने के लिए
इसे कुछ मुख्य पहलुओं में विभाजित किया जा सकता है:
1. दिव्य भाषा की खोज
जॉन डी 16वीं सदी के इंग्लैंड के सबसे बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक थे। वे रानी एलिजाबेथ प्रथम के सलाहकार, गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। लेकिन उनकी मुख्य रुचि ब्रह्मांड के परम सत्यों को जानने में थी। उनका मानना था कि:
आदम और ईश्वर के बीच की मूल भाषा, जिससे ब्रह्मांड का निर्माण हुआ था, समय के साथ खो गई है।
यदि उस भाषा को दोबारा खोज लिया जाए, तो इंसान प्रकृति के नियमों को समझ सकता है और सीधे स्वर्गदूतों से बात कर सकता है।
इसी खोज के दौरान उनकी मुलाकात एडवर्ड केली से हुई, जो एक 'क्रिस्टल गेज़र' थे और दावा करते थे कि वे एक रहस्यमयी कांच या क्रिस्टल मे स्वर्गदूतों को देख और सुन सकते हैं।
2. पुस्तक की संरचना और स्वरूप
मार्च से अप्रैल 1583 के दौरान, केली ने क्रिस्टल में देखकर जो बोला, जॉन डी ने उसे कागज़ पर उतारा। इसी संकलन को लिबर लोगाएथ कहा गया।
अक्षरों के ग्रिड :- इस पुस्तक में सामान्य वाक्यों की तरह पैराग्राफ नहीं हैं। इसके बजाय, यह 49x49 के बड़े चौकोर खानों से भरी हुई है। प्रत्येक खाने में इनोकियन भाषा के अक्षर भरे हुए हैं।
इन तालिकाओं को सीधे नहीं पढ़ा जा सकता। स्वर्गदूतों ने डी को बताया था कि इन अक्षरों को एक विशेष पैटर्न (जैसे शतरंज की चालों की तरह या तिरछे) में जोड़ने पर ही मंत्र या 'कॉल्स' बनते हैं।
3. इनोकियन भाषा
इस पुस्तक के माध्यम से जो भाषा सामने आई, उसे इनोकियन कहा गया (क्योंकि जॉन डी का मानना था कि पैगंबर इनोक आखिरी इंसान थे जिन्होंने यह भाषा सीखी थी)।
इस भाषा की अपनी एक अनूठी वर्णमाला है, जिसके 21 अक्षर हैं। आश्चर्यजनक रूप से, इस भाषा का अपना एक व्याकरण और वाक्य विन्यास है, जो किसी भी कृत्रिम रूप से बनाई गई भाषा के मुकाबले बेहद जटिल और सुसंगत है। भाषाई विश्लेषकों के लिए यह आज भी आश्चर्य का विषय है।
4. इसका आध्यात्मिक और जादुई उद्देश्य
जॉन डी और केली का मानना था कि लिबर लोगाएथ केवल ज्ञान का स्रोत नहीं है, बल्कि एक अत्यंत शक्तिशाली आध्यात्मिक उपकरण है:
सृष्टि का रहस्य:-स्वर्गदूतों के अनुसार, इन तालिकाओं में पूरी पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति, अदृश्य लोकों के नक्शे और उन पर शासन करने वाले राजाओं और राजाओं के मंत्रियों के नाम छिपे हैं।
अंतिम समय की तैयारी :- इस पुस्तक को एक ऐसे हथियार के रूप में देखा गया जो दुनिया के अंत के समय इंसानों को आध्यात्मिक शक्तियों से लैस करेगी।
5. इतिहास में इसका महत्व और प्रभाव
जॉन डी की मृत्यु के बाद उनकी यह हस्तलिपि लंबे समय तक ब्रिटिश म्यूजियम में दबी रही। 19वीं और 20वीं सदी में, **हर्मेटिक ऑर्डर ऑफ द गोल्डन डॉन और विशेष रूप से कुख्यात जादूगर एलिस्टर क्राउली ने डी के कार्यों को दोबारा खोजा।
उन्होंने लिबर लोगाएथ और डी के अन्य इनोकियन कार्यों के आधार पर आधुनिक 'इनोकियन मैजिक' की नींव रखी। आज भी रहस्यवादियों का मानना है कि लिबर लोगाएथ के ग्रिड्स को पूरी तरह डिकोड करना अभी बाकी है, और यह पश्चिमी तंत्र-मंत्र की सबसे कठिन पहेलियों में से एक है।
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