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कान फिल्म समारोह के मुख्य प्रतियोगिता खंड में इस बार भी कोई भारतीय फिल्म नहीं है।

कान फिल्म समारोह को लेकर भारतीय मीडिया में झूठी और मनगढ़ंत खबरों ( फेक न्यूज) की भरमार है।

विश्व सिनेमा में यह समय दुनिया के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित 74 वें कान फिल्म समारोह ( 6-17 जुलाई , 2021) की वापसी के लिए चर्चा में है। इस बार भी हमेशा की तरह आफिशियल सेलेक्शन में कोई भारतीय फिल्म नही है, हालांकि सहयोगी गतिविधि ‘ डायरेक्टर्स फोर्टनाइट’ में पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ आ नाइट आफ नोईंग नथिंग ‘ जरूर है जिसे वहां एक अवार्ड भी मिला- , ‘ द गोल्डन आई डाक्यूमेंट्री प्राइज।’ जबकि कान फिल्म समारोह के इतिहास में पहली बार बांग्लादेश के अब्दुल्ला मोहम्मद साद की फिल्म ‘ रेहाना मरियम नूर ‘ आफिशियल सेलेक्शन (अन सर्टेन रिगार्ड खंड) में चुनी गई है। हालांकि इससे पहले 55 वे कान फिल्म समारोह (2002) की सहायक गतिविधि ‘ डायरेक्टर्स फोर्टनाइट’ में बांग्लादेश के तारिक मसूद की फिल्म ‘ द क्ले बर्ड ( माटिर मैना ) दिखाई जा चुकी है।

कोरोनावायरस के कोहराम मे पिछले साल 73 वां कान फिल्म समारोह नहीं हो सका था। जिस भव्य पैलेस में हर साल दुनिया भर के सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों और कलाकारों का मेला लगता है , वहां कोरोना के मरीजों की देखभाल हो रही थी और बाद में उसे वैक्सीनेशन सेंटर में बदल दिया गया था। इसी 6 जुलाई की जगमगाती शाम ग्रैंड थियेटर लूमिएर में अमेरिका की मशहूर अभिनेत्री जोडी फोस्टर ने इस साल जूरी के अध्यक्ष अश्वेत फिल्मकार स्पाइक ली, दक्षिण कोरिया के आस्कर विजेता बोंग जून हो और स्पेन के पेद्रो अलमदोवार के साथ जब 74 वें कान फिल्म समारोह का शुभारंभ किया तो इसे जीवन में सिनेमा की वापसी के रूप में देखा गया। कोरोनावायरस की महामारी के कारण लंबे समय तक चले लाकडाउन के बाद यह दुनिया का पहला ऐसा फिल्म समारोह था जिसमें कुछ भी वर्चुअल या आनलाइन नहीं था, सबकुछ फिजिकल था। उसी शाम पेद्रो अलमदोवार ने जोडी फोस्टर को ‘आनरेरी पाम डि ओर ‘ अवार्ड से सम्मानित किया। पिछले एक-डेढ साल से बंद पड़े फिल्म उद्योग के लिए यह सचमुच खुशी का मौका था क्योंकि सिनेमा के विश्व बाजार का राजस्व करीब अस्सी फीसदी तक कम हो गया है। जोडी फोस्टर ने ठीक ही कहा कि इस जानलेवा लाकडाउन में उन जैसे करोड़ों फिल्म प्रेमियों के लिए सिनेमा ने लाइफ लाइन रहा है। स्वास्थ्य के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद एक बार फिर कान का रेड कार्पेट गुलजार हुआ।

आमतौर पर मई के दूसरे सप्ताह में होनेवाला कान फिल्म समारोह कोरोना के कारण इस बार जुलाई के पहले हफ्ते में शुरू हो सका। रेड लिस्ट में शामिल भारत सहित कई देशों के फिल्म कलाकार और पत्रकार वहां नहीं जा सके। प्रत्येक व्यक्ति को हर 48 घंटे में कोरोना का पीसीआर टेस्ट कराना पड़ा। फ्रांस ने कोरोना के डेल्टा ( इंडियन) वैरिएंट के कारण अपनी सीमाएं लगभग सील कर दी। फिर भी कान में सिनेमा का जश्न जबरदस्त हुआ। समारोह की शुरुआत फ्रांस के लेओस कोरेक्स की अंग्रेजी फिल्म ‘ अनेट ‘ से हुआ जबकि समापन निकोलस बेदास की फिल्म ‘ फ्राम अफ्रीका विद लव ‘ से हुआ। इटली के मास्टर फिल्मकार मार्को बेलुचियो की नई फिल्म ‘ मार्क्स कैन वेट ‘ आकर्षण का केंद्र रही। मार्को बेलुचियो को समापन समारोह में पाउलो सोरेंटीनो ने ‘आनरेरी पाम डि ओर’ अवार्ड प्रदान किया ।

74 वें कान फिल्म फेस्टिवल के प्रतियोगिता खंड में आस्कर अवार्ड विजेता असगर फरहादी की ईरानी फिल्म ‘ अ हीरो’, ‘ दीपन’ के लिए कान फिल्म समारोह (2015) में पाम डि ओर अवार्ड पाने वाले फ्रांस के जैक ओदियार की फिल्म ‘ पेरिस 13 डिस्ट्रिक्ट’ , वेस एंडरसन की ‘ द फ्रेंच डिस्पैच’, नाबिल आयुच की ‘ कासाब्लांका बीट्स’, रूस में नजरबंद कर दिए जाने वाले कीरील सेरेब्रेनिकोव की ‘ पेत्रोव्स फ्लू’ , मोहम्मत सारेन हारून की ‘ लिंगुई ‘ , पाल वेरहोवेन की ‘बेनेडेटा’, ब्रूनो ड्यूमांट की ‘ पार अन डेमी क्लेयर मैटिन’ और सीन पेन की ‘ फ्लैग डे ‘ सहित करीब चौबीस फिल्मों को चुना गया है।

इस बार कान फिल्म समारोह के आफिशियल सेलेक्शन में मुख्य प्रतियोगिता खंड, अन सर्टेन रिगार्ड, आऊट आफ कंपीटिशन, स्पेशल स्क्रीनिंग, मिडनाइट स्क्रीनिंग, कान क्लासिक, सिनेफौंडेशन और शार्ट फिल्म, तथा सहयोगी उपक्रमों , क्रिटिक्स वीक और डायरेक्टर्स फोर्टनाइट के साथ साथ समुद्र किनारे आम जनता को दिखाई जाने वाली फ्री स्क्रीनिंग की खूब चर्चा रही। इसकी वजह उन महत्वपूर्ण फिल्मों का चुनाव है जिसे फिल्म प्रेमी बार बार देखना चाहते हैं। इस खंड में 25 जून को रिलीज हुई और पहले ही सप्ताहांत में 523 करोड़ कमाने वाली जस्टीन लीन की फिल्म ‘ फास्ट एंड फ्यूरियस – 9 ‘ का फ्रेंच प्रीमियर हुआ। इस खंड में पिछले साल की चुनी हुई कुछ महत्वपूर्ण फिल्में भी दिखाई गई जिनका कोरोना के कारण समारोह रद्द होने से प्रदर्शन नहीं हो सका था। इनमें इस साल जूरी के अध्यक्ष स्पाइक ली की नई फिल्म ‘ अमेरिकन यूटोपिया ‘ (2020) और ब्रिटेन के स्टीव मैक्वीन की ‘ लवर्स राक’ प्रमुख हैं। वांग कार वाई की ‘ इन द मूड फार लव’ (2000), ज्यां पियरे जूनेट की ‘ एमिली’ (2001) और अमेरिकी राष्ट्रपति जान एफ कैनेडी की हत्या की जांच पर ओलिवर स्टोन की ‘ जे एफ के’ भी काफी पसंद की गई। कान फिल्म समारोह के इतिहास में पहली बार किसी अश्वेत फिल्मकार ( स्पाइक ली) को मुख्य प्रतियोगिता खंड की जूती का अध्यक्ष बनाया गया।

हमेशा की तरह इस बार कान फिल्म समारोह के आफिशियल सेलेक्शन में कोई भारतीय फिल्म नहीं थी। केवल पर्यावरण विशेष ‘ सिनेमा फार द क्लाइमेट ‘ में दिल्ली के जानलेवा प्रदूषण पर भारतीय फिल्मकार राहुल जैन की डाक्यूमेंट्री ‘ इनवीजीबल डीमंस’ और सहयोगी गतिविधि डायरेक्टर्स फोर्टनाइट मे पायल कपाड़िया की फिल्म ‘ आ नाईट आफ नोइंग नथिंग शामिल की गई है। इस बार का कान फिल्म समारोह पर्यावरण संरक्षण को भी समर्पित है। यहां आने वाले हर दर्शक से 24 यूरो ( करीब 2200 रूपये ) का पर्यावरण टैक्स देना पड़ा। कागज, प्लास्टिक और कूड़े को जड़ से ही समाप्त कर दिया गया।

कान फिल्म फेस्टिवल के आफिशियल सेलेक्शन में किसी भी भारतीय फिल्म के न होने के बावजूद आश्चर्य है कि भारत के कई समाचार माध्यमों में भारतीय फिल्मों के कान में प्रदर्शन की झूठी खबरों की भरमार रही। ऐसा हर साल होता है। इसकी वजह यह है कि भारत में धोखेबाज फिल्म निर्माताओं की प्रेस रिलीज के आधार पर जो पत्रकार खबरें चलाते हैं, उन्हें कान फिल्म समारोह के बारे में कम जानकारी होती है। मुंबई में कान फिल्म समारोह के नाम पर अब एक नया धंधा शुरू हुआ है। यहां कई धोखेबाज एजेंसियां खुल गई है जो पचास हजार से एक लाख रुपए लेकर झूठे वायदे करती है कि वे भारतीय फिल्मों को कान फिल्म समारोह में प्रदर्शित करवा देंगी। वे इंटरनेट से कान फिल्म समारोह का लोगो, पोस्टर और तस्वीरें चुराकर यह खेल खेलती है।

सचाई यह है कि कान फिल्मोत्सव के आफिशियल चयन के साथ विशाल फिल्म बाजार में भी भारत कहीं नहीं है। यह जरूर होता रहा है कि कई फिल्मकार आठ-दस सीटोंवाले छोटे-छोटे थियेटर किराये पर लेकर अपनी फिल्में दिखाते रहें है। वे भारत के कई शहरों मे प्रेस कांफ्रेंस कर बताते रहे हैं कि कान में उनकी फिल्म स्वीकृत हो गई है।यही हालत शार्ट फिल्मों की है।यहॉ कोई भी पैसे देकर अपनी शार्ट फिल्म दिखा सकता है और भारत में प्रचार कर सकता है कि उसकी फिल्म कान में दिखाई गई।

भारत के शाजी एन करूण की मलयालम फिल्म ” स्वाहम” वह आखिरी फिल्म है जिसे 47 वे कान फिल्मोत्सव (1994) के मुख्य प्रतियोगिता खंड में चुना गया था। पिछले 27 सालों में कोई भी भारतीय फिल्म कान फिल्म समारोह के मुख्य प्रतियोगिता खंड में नही चुनी गई है।1913 में कान ने भारत को अतिथि देश का सम्मान जरूर दिया था।लेकिन आफिशियल सेलेक्शन या मुख्य खंड में तब भी कोई भारतीय फिल्म नहीं थी।

‌‌बताते हैं कि पेरिस की सौंदर्य प्रसाधन बनानेवाली कंपनी लारिएल कान का लगभभग साठ फीसद बजट प्रायोजित करती है। लारिएल ने भारत में अपना बिजनेस बढ़ाने के लिए पहले ऐश्वर्या राय फिर सोनम कपूर को ब्रांड एम्बेसडर बनाया , उनके लिए रेड कारपेट खरीदा और भारत में प्रचारित किया गया कि कान ने उन्हे आमंत्रित किया है। यह भी प्रचार हो रहा है कि कौन कितनी बार कान आ चुका है।अनुराग कश्यप की ” गैंग्स आॉफ वासेपुर’ “अगली”और ” साइको रमण” डाइरेक्टर्स फोर्टनाईट में चुनी गई जिसे फ्रेंच फिल्ममेकर्स एसोशिएशन कान फिल्मोत्सव के मुख्य स्थल से आधा किलोमीटर दूर जे डब्लू मेरियट जैसे पॉच सितारा होटल में आयोजित करता है ।
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प्रथम कान फिल्मोत्सव(1946) में चेतन आनंद की हिंदी फिल्म “नीचा नगर” को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला था। दूसरी बार 1956 में सत्यजीत राय की “पथेर पांचाली” को यह पुरस्कार मिला। फिर मृणाल सेन की फिल्म “खारिज”(1983) को स्पेशल जूरी अवार्ड और मीरा नायर की ” सलाम बॉम्बे ” (1988) को कैमरा डि ओर तथा आडियंस अवार्ड मिल चुका है। इस समय कान सिनेमा का ओलंपिक बन चुका है। यहॉ आफिशियल सेलेक्शन में फिल्म के प्रदर्शन का सीधा मतलब है कि उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार मिल जाता है। एक साल में बनी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों का पहला प्रदर्शन कान में हीं होता है।इसी वजह सें दुनियाभर के दिग्गज फिल्मकार कान आना चाहते हैं।

भारत सरकार का भारी भरकम प्रतिनिधि मंडल हर साल कान आता है। फिर हर साल भारत के अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह गोवा को कान की तरह बनाने के दावे किए जाते हैं।पिछले कई दशकों से यही हो रहा है। इसे ऐसे समझा जा सकता है ।कान में पिछली बार 32465 डेलिगेट और 4660 फिल्म पत्रकार आए जबकि गोवा में लगभग 12000 डेलिगेट और 400 फिल्म पत्रकार आए। कान का बजट 142 करोड़ रूपये है जबकि गोवा का 12-15 करोड़। कान में दुनियाभर से हर बड़ा फिल्मकार आना चाहता है जबकि गोवा में साधारण फिल्मकार भी नही आना चाहता।

यहॉ दुनिया का हर देश अपनी फिल्मों के प्रोमोशन में लगा रहता है।दुनिया भर से आए मीडियाकर्मियों के पास हर देश की गतिविधियों की जानकारी होती है।केवल भारत ही ऐसा देश है जिसके बारे मे किसी को कोई जानकारी नहीं है। यहॉ आये किसी बड़े फिल्मकार से भारत के बारे में पूछिए तो जवाब मिलेगा- सत्यजीत राय। मतलब यह कि यूरोप के लिए भारतीय सिनेमा पचास साल पहले सत्यजीत राय तक ही ठहरा हुआ है।सचाई तो यहीं है कि कान फिल्मोत्सव में भारतीय फिल्मों के लिये ‘ नील बट्टे सन्नाटा ‘ ही है।

साभार- http://ajitrai.com/ से

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं व राष्ट्रीय एवँ अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों से जुड़े विषयों के जानकार हैं)

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