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यात्रा: पेशावर काण्ड के अमर सेनानी के गांव की- तीसरा भाग

वर्तमान में इस गांव में पांच इंजीनियर, बारह जूनियर इंजीनियर,तीन कॉलेज प्रवक्ता, आठ अध्यापक, तीन क्षेत्र विकास अधिकारी, तीन एम्. बी. बी. एस डाक्टर, एक फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट (तहसीलदार), एक अवकाश प्राप्त कोल इंडिया जनरल मैनेजर, एक आर्मी इंजीनियर कैप्टेन, राष्ट्रपति सम्मानित डाकवान श्री नत्थी राम चौकियाल, विभागीय दक्षता पुरस्कार प्राप्त अध्यापक श्री महीधर चौकियाल, पत्रकार स्वर्ण भारत नई दिल्ली, ठेकेदार सच्चिदानंद देवली, श्री चन्द्रवल्लभ थपलियाल और कई ज्योतिष शास्त्र और कर्म काण्ड के विद्वान् पंडित तथा छोटे बड़े सरकारी और गैरसरकारी अफसर तथा दुकानदार शामिल हैं |

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लेकिन जिस महान गढ़ सपूत की याद में मुझे यह लेख लिखने को बाध्य होना पड़ा वे हैं पेशावर काण्ड के वीर सेनानी, नायक स्व. श्री भोलासिंह बुटोला | इनके स्वंय के परिवार में आज कोई भी नहीं हैं | इनकी चार पुत्रियों में से तीन श्रीमती मथुरा देवी, श्रीमती सुदामा देवी तथा श्रीमती सुंदरी देवी जीवित हैं | ये सभी अपने-अपने ससुरालों में रहती हैं, चौथी श्रीमती सुरमादेवी पास के गांव कमेड़ा में ब्याही थीं | दो बच्चों के जन्म के बाद वे भगवान को प्यारी हो गई थी |

इनकी (श्री भोला सिंह जी) की धर्म पत्नी श्रीमती कृपाली देवी अपनी बड़ी लड़की श्रीमती मथुरा देवी के पास भैंसगांव में रहती थीं | उनका स्वर्गवास हुए दस साल हो गये हैं | स्व. श्री भोला सिंह जी के दो छोटे भाईयों के परिवारों में उनकी धर्म पत्नीयां, लड़के व बहुएं व पोते-पोतियां हैं, मगर अफ़सोस तो इस बात का है की न तो भारत सरकार ने और नहीं उ. प्र. सरकार ने अमर वीर श्री चन्द्रसिंह गढ़वाली के अलावा बाकी के जीवित या मृतक पेशावर काण्ड के सैनिकों के सम्मान में कुछ भी ऐसा काम नहीं किया है, जिससे ये वीर सैनिक वर्तमान तथा भावी पीढ़ी के दिलों-दिमाग में चिरस्मरणीय बने रह सकें |

श्री भोलासिंह बुटोला पेशावर काण्ड के मुक़दमे से बरी होने के बाद घर आ कर खेती करने लगे थे, जब तक जिये गरीबी में जिये | लेखक को आज भी (लगभग 47-48 वर्ष बाद) याद है कि जब कभी वे विमाता को छोड़ने हमारे गांव आते थे, तो मेरे गांव वालों को अपने पुश्तैनी पानी की गूल की मरम्मत तथा देखरेख न करने के लिये मज़ाक में गालियां देते थे | उनका हमारे खेतों की जुताई में शामिल होना, बावजूद इसके कि उनकी अलग ‘केर’ होने से उन्हें हमारे हल को छूना नहीं था और मुझे प्राइमरी स्कूल की पढाई के लिये उस खेत वाले रास्ते से गुजरना आज भी अच्छी तरह याद है |

ये सब बातें निसंदेह उनके कर्तव्यनिष्ठा, ईमानदारी तथा स्पष्टवादिता को प्रमाणित करती हैं | भारत सरकार ने 1971 में बंगलादेश की आजादी की लड़ाई के बाद आजाद हिन्द फौज के सैनिकों के साथ पेशावर काण्ड के ‘बागी’ सैनिकों या मृतक सैनिकों की विधवाओं को पेंशन स्वीकृत की, लेकिन इन सैनिकों को राष्ट्र की सच्ची धरोहर के रूप में संजोकर रखने के लिये न तो कोई समारक, स्टैच्यू या किसी सरकारी कालेज, स्कूल भवन का नाम इनके नाम से जोड़ना, आदि कुछ भी नहीं किया गया है |

मेरा केंद्रीय मंत्री माननीय श्री सतपाल महाराज, पर्वतीय विकास मंत्री श्री रमेश पोखरियाल, श्री मातवरसिंह कंडारी तथा उत्तराखंड विशेषकर गढ़वाल के एम. एल. ए. तथा अन्य राजनेताओं खासकर पूर्व पर्वतीय विकास मंत्री श्री हरक सिंह रावत जी से निवेदन है कि पेशावर काण्ड के बाकी के ‘बागी’ सैनिकों की स्मृति में अवश्य कोई ऐसा ठोस कदम उठायें जिससे पीढ़ी दर पीढ़ी लोग इनसे प्रेरणा ले सकें |

मैं उन समन्धित ग्रामवासियों, खासकर चोपड़ा वालों से अपेक्षा करता हूँ कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में श्री भोलासिंह बुटोला जी ने उनके गांव चोपड़ा-नागपुर को अपने त्याग से अमर किया है | वे भी कुछ ऐसा कार्य करने की सोचें जिससे स्वयं को अधिक गौरान्वित महसूस कर सकें ताकि निकट भविष्य में प्रवास में रहने वाले देश-विदेश के लोग इन महापुरुषों की मूर्तियों, स्मारकों-युक्त गढ़भूमि को तीर्थ स्थळ मानकर उनके दर्शन करके अपने जीवन को धन्य कर सकें |

***भोलासिंह बुटोला जी के सन्दर्भ में कुछ और जानकारी लेख के अंत में दी गयी है | ***

चोपड़ा गांव के सभी मकानों में बिजली की व्यवस्था है | अधिकतर घरों में शौचालय व स्नानागार की व्यवस्था है | सभी परिवार शिक्षित हैं (वर्ष 1996 में चमोली जिले को पूर्ण साक्षऱ घोषित किया गया था) | कुछ मकानों के छतों पर डिश एंटीना दिखे, तीन परिवारों के पास जनरेटर सेट भी हैं | शादी, सामूहिक भोज, रामलीला तथा अन्य समारोहों के समय बिजली गुल होने पर, इनसे बिजली की व्यवस्था को चालू रखा जाता है | काफी घरों में टी. वी., टेलीफोन, फ्रिज, वी. सी. पी. आदि उपकरण मौजूद हैं |

गांव की पंचायत के पास माइक व्यवस्था, हारमोनियम, ढोलक, टेबल, सामूहिक भोजन के लिए बिस्तर तथा ठहरने के लिये दो पंचायत घर हैं | इस वर्ष गर्मियों में गांव में ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य जगद्गुरु श्री माधवाश्रम जी का सत्संग हुआ था | गांव के बीचोंबीच उत्तर से दक्षिण दिशा में सिंचित भूमि है, जिसकी सिंचाई तीन नहरों (गुलों) से होती है | गांव की चारों दिशाओं में देवताओं के निवास स्थान हैं | पूर्व में भैरवनाथ, पश्चिम में शिवालय, उत्तर में लक्ष्मी नारायण मंदिर तथा दक्षिण में काली माता का मंदिर है | इनके अलावा घर-घर में नागराजा तथा नरसिंग भगवांन के पूजा स्थल हैं | संस्कृत का निम्न श्लोक इन बातों की पुष्टि करता है |

यस्य चर्तुरद्विग भागे, विष्णु, शिव, शक्ति, भैरवा, तत्रापि बद्रीबनारव्या स्वर्गादपि चोपड़ा | |

देवताओं में भैरव नाथ के अलावा सभी देवताओं के सुन्दर मंदिर हैं | इनका स्थान जंगल में पेड़ों के झुरमुठ के नीचे साफ़-सुथरी जगह पर है | समीप ही स्वच्छ पानी का नाला बहता है | इस स्थान पर कई बड़े-बड़े त्रिशूल, चिमटे तथा उन पर लाल रंग के झंडे लगे हुये हैं |

भैरव नाथ जी के बारे में प्रसिद्ध है कि गांव की कोई भी विवाहित कन्या (ध्याण) के कष्ट में उसकी मदद तथा कष्ट देने वाले व्यक्ति को दंड देने, याद करने या बिना पुकारे ही पहुंच जाते हैं तथा काफी समय तक पहिले स्वंय को प्रकट नहीं करते हैं, और यदि करते हैं तो किसी अन्य रूप जैसे नर्सिंग-डौंडिया के दोष में भ्रमित कर, पहिले घात-अहंकार के रूप में पूजा लेते हैं |

जब कष्ट देने वाला व्यक्ति या उसका परिवार ज्यादा दुखी हो जाता है तो देवी-देवताओं के पश्वों (बक्यों) के मार्फ़त प्रकट करते हैं | लेकिन एक बात तय है कि इनके कोप से किसी के जान-माल की हानि नहीं होती है | कभी-कभी ये सपने में कुत्तों के रूप में दर्शन देते हैं | इनके बावत कैप्टेन साहब ने लगभग 50 वर्ष का किस्सा इस प्रकार सुनाया:-

एक बार भैरव देवता के पुजारी ने अशुद्ध अवस्था में पूजा कर दी, तो गांव में पहिले तो रात को पत्थर गिरने शुरू हुए और बाद में दिन को भी पड़ने लगे | जब इसका कारण पता नहीं चला तो गांव में पटवारी-कानूनगो का डेरा लगा दिया गया | लेकिन ये लोग भी समस्या का हल न कर सके | ऐसा लगभग सात सालों तक चला, लेकिन किसी भी आदमी, औरत या बच्चे को चोट नहीं लगी |

आखिर बहुत खोज करने पर कहीं दूर के इलाके मैं भैरव नाथ के प्रकोप का पता लगा | गांव वालों ने सामूहिक रूप से शुद्ध तरीके से पूजा देकर उन्हें शांत किया | गांव के सरोला चौकियाल पुजारी इनकी पूजा में खीर का भोग लगाते हैं | इसलिये ये दूध भैरों हुए, लेकिन इनके सहयोगी गणों की तृप्ति के लिये बकरे की बली देनी पड़ती है |

गांव वालों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से इनका प्रकोप ज्यादा महसूस किया जा रहा है | लोग देश-विदेश से इनकी पूजा देने पहुंच रहे हैं | काफी बुजुर्ग महिलायें व उनके परिवारजन सुदूर अमेरिका तक से पूजा देने आयें हैं | लगभग आठ-दस पूजा साल भर में संपन्न होती हैं |

वैसे देवता की पूजा का पूरा सामान पुजारी के बतायानुसार पूजा देने वाले परिवार की तरफ से होता है, लेकिन गांव के सभी परिवार अपनी-अपनी तरफ से भी आटा, चावल, गुड़, चीनी, लकड़ी, इत्यादि वस्तुओं को ‘अग्याल’ के रूप में पूजास्थल पर लाते हैं और पूजा देने वाले परिवार के कार्य में बराबर का हाथ बंटाते हैं | खीर के अलावा वहां पर रोट, पूड़ियाँ, हलवा, सब्ज़ी तथा रोटियां बनती हैं | पूजा ख़त्म होने के बाद बकरे की बलि दी जाती है तथा उसके पकाये हुए मांस को भी अन्य खाद्य वस्तुओं की तरह प्रसाद के रूप में खाया जाता है | शाकाहारी लोग मांस के अलावा सब कुछ खाते हैं |

भैरवनाथ जी के बारे में एक बात प्रसिद्ध है कि कोई भी व्यक्ति जो उनकी पूजा में शामिल होता है अथवा प्रसाद ग्रहण करता है तो उसे भी बदले में पूजा देनी पड़ती है | इस वजह से ही चोपड़ा गांव के कुछ परिवार शुरू से इनकी पूजा में शामिल नहीं होते हैं | जाहिर है कि उनके स्वयं के तथा उनकी ध्याणीयों के कष्ट में ये किसी भी तरह की मदद नहीं करते होंगे | इनके प्रभाव के बदलने की मुख्य वजह बदलते परिवेश में आपसी मन-मुटाव, ईर्ष्या-द्वेष और लड़ाई-झगड़ा का होना है |

मुझे चोपड़ा गांव कई मायनों में एक आदर्श गांव लगा | अतः अधिक जानकारी के लिए मैंने कैप्टेन साहब के साथ मुख्य गांव में जाना अतिआवश्यक समझा | वहाँ पहुंचने पर कुछ देर विभागीय दक्षता-प्राप्त अध्यापक श्री महीधर चौकियाल जी से बातचीत की | तत्पश्चात ठेकेदार श्री देवली जी से बात हुई | उसके बाद में श्री राधाकृष्ण, अवकाश प्राप्त तहसीलदार जी को मिलने उनके निवास पर गया | वे अपनी बैठक में अपनी छोटी पौत्री को गोद में पकडे हुये मिले |

मेरे दिल में तहसीलदार साहब के लिये बचपन से ही अति स्नेह है जब वे हमारी बच्छणस्यूं पट्टी में पटवारी तैनात थे | मेरे विचार से वे पहिले और आखिरी पटवारी रहे होंगे जो जनता में इतने लोकप्रिय हुए कि लोग अब भी उनको मिलने आते हैं | मेरी विमाता के गांव के पुरोहित होने से भी उनके लिये मेरे परिवार के लोगों में श्रद्धा थी | मुझे आज भी लगभग पैंतीस साल बाद याद है कि एक बार उनकी धर्म पत्नी ने पतवार चौकी, मरगांव बच्छणस्यूं से रोट का कलेवा बना कर मेरी विमाता जी के लिये भेजा था | मेरे घर वालों ने भी मेरे मार्फ़त सेरा से प्याज उखाड़ने के दिन एक थैला प्याज का भेजा था | मैंने जब तहसीलदार जी से उनकी लोकप्रियता के बावत जानकारी चाही तो उन्होंने मुझे निम्न तीन घटनायें सुनाई ….

अगली कड़ी में पढिये कुछ और रोमांचक अनुभव

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