आजकल “#महाकाल से GMT को रिप्लेस” करने जैसी बातों का मज़ाक उड़ाया जा रहा है और यह कहा जा रहा है कि #विक्रम संवत पुराना, #अव्यावहारिक और अप्रासंगिक है, तथा उज्जैन को विश्व का #मेरिडियन बनाना असंभव है। परंतु यदि इस विषय को भावनात्मक दृष्टि से हटाकर ऐतिहासिक और #वैज्ञानिक आधार पर समझा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि इस प्रकार के दावे पूर्णतः निराधार नहीं हैं, बल्कि इनकी जड़ें प्राचीन भारतीय #खगोल विज्ञान की गहन परंपरा में निहित हैं।
#इतिहास बताता है कि आज जिस ग्रीनविच मेरिडियन को विश्व का मानक माना जाता है, वह कोई शाश्वत या प्राकृतिक सत्य नहीं है, बल्कि 1884 में अंतरराष्ट्रीय सहमति से निर्धारित किया गया एक मानक है। इससे पहले विभिन्न #सभ्यताओं के अपने-अपने मेरिडियन थे। भारत में प्राचीन काल से ही “मध्य रेखा” की अवधारणा विकसित हो चुकी थी और यह रेखा उज्जयिनी, अर्थात आज के उज्जैन से होकर मानी जाती थी। प्राचीन ग्रंथ #सूर्य सिद्धांत में उज्जैन को खगोलीय गणनाओं का आधार बिंदु बताया गया है, और आधुनिक शैक्षणिक स्रोत भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि भारतीय खगोलविद समय और देशांतर की गणना के लिए उज्जैन को मानक मानते थे।
प्राचीन #भारतीय खगोल विज्ञान केवल धार्मिक मान्यताओं पर आधारित नहीं था, बल्कि अत्यंत उन्नत #गणितीय और प्रेक्षणीय (observational) पद्धतियों पर आधारित था। महान गणितज्ञ और #खगोलशास्त्री आर्यभट्ट ने पृथ्वी के गोल होने और उसके घूर्णन का सिद्धांत प्रस्तुत किया तथा उनकी गणनाएँ एक निश्चित मेरिडियन रेखा पर आधारित थीं, जिसे उज्जैन-लंका रेखा के रूप में जाना जाता है। इसी प्रकार #वराहमिहिर ने अपनी प्रसिद्ध कृति पंचसिद्धांतिका में स्पष्ट रूप से उज्जैन को मानक मेरिडियन माना और यह स्थापित किया कि समय निर्धारण का सीधा संबंध #देशांतर से होता है। यह वही सिद्धांत है जिस पर आज का आधुनिक समय निर्धारण तंत्र आधारित है।
उज्जैन को मेरिडियन के रूप में चुनने के पीछे भी ठोस #वैज्ञानिक कारण थे। यह स्थान #कर्क रेखा के समीप स्थित है, जिसे खगोलीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। प्राचीन काल में इसे भारत के भौगोलिक और #खगोलीय केंद्र के रूप में देखा जाता था, जिससे ग्रहों की गति, नक्षत्रों की स्थिति और समय की गणना में संतुलन बना रहता था। यह चयन किसी धार्मिक आग्रह का परिणाम नहीं था, बल्कि जियो-एस्ट्रोनॉमिकल तर्कों पर आधारित था।
जहाँ तक विक्रम #संवत का प्रश्न है, इसे केवल “पुराना” कहकर खारिज करना भी वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। विक्रम संवत एक लूनी-सोलर कैलेंडर है, जिसमें सूर्य और चंद्रमा दोनों की गतियों का समन्वय किया जाता है। इसमें अधिमास जैसी व्यवस्थाएँ हैं, जो इसे खगोलीय रूप से संतुलित बनाती हैं और ऋतु चक्र के साथ इसका सटीक तालमेल बनाए रखती हैं। #आधुनिक खगोल विज्ञान में भी lunar-solar synchronization एक जटिल विषय है, जबकि भारतीय पंचांग प्रणाली इसे हजारों वर्षों से सफलतापूर्वक लागू करती आ रही है।
यह भी समझना आवश्यक है कि किसी मेरिडियन का चयन कोई #अपरिवर्तनीय प्राकृतिक नियम नहीं, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय सहमति का विषय होता है। जिस प्रकार ग्रीनविच को एक समय पर वैश्विक मानक बनाया गया, उसी प्रकार #सैद्धांतिक रूप से भविष्य में किसी अन्य स्थान को भी यह दर्जा दिया जा सकता है, यदि वैश्विक स्तर पर सहमति बने। आज के युग में, जब समय निर्धारण परमाणु घड़ियों और उपग्रह प्रणालियों पर आधारित है, तब “रेफरेंस मेरिडियन” का महत्व अधिक तकनीकी और मानक-निर्धारण से जुड़ा हुआ है, न कि किसी स्थायी भौगोलिक अनिवार्यता से।
अतः यह कहना कि उज्जैन को मेरिडियन मानने या महाकाल आधारित समय प्रणाली की चर्चा पूरी तरह #अवैज्ञानिक या असंभव है, स्वयं एक अधूरा निष्कर्ष है। ऐतिहासिक प्रमाण, प्राचीन ग्रंथों की गवाही, तथा खगोल विज्ञान के सिद्धांत यह स्पष्ट करते हैं कि यह विचार परंपरा, विज्ञान और इतिहास—तीनों के आधार पर स्थापित है। इसलिए इस विषय पर उपहास के बजाय गंभीर और #तथ्यात्मक चर्चा की आवश्यकता है, ताकि हम अपने वैज्ञानिक अतीत को सही संदर्भ में समझ सकें और भविष्य की संभावनाओं का भी संतुलित मूल्यांकन कर सकें।
साभार- https://www.facebook.com/THESHUBHAMV से





