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लावारिस अस्थियों की वारिस बीना बुदकी

सामजिक ताने-बाने के अनुसार अभी भी अधिकतर महिलाओं को अपने प्रियजनों के अंतिम संस्कार में शामिल होने का अधिकार नहीं है। वे जो हवा के विरुद्ध बहना चाहती हैं उनमे से सिर्फ इक्का-दुक्का महिलायें और बच्चियां ही शायद शमशान घाट पर दिख सकतीं हैं अन्यथा शमशान घाट पर सिर्फ पुरुष ही दिखते हैं। ऐसे में एक महिला का शमशान घाट में जाना और उन अस्थियों का वारिस बन जाना जिनका कोई नहीं होता और उन अस्थियों को पूरे समर्पण भाव से गंगा को तर्पण करना एक साहसिक और सराहनीय कार्य है। “बीना बुदकी” एक ऐसा ही नाम है जो स्वयं से पहले दूसरों के बारे में सोचती हैं और समाज कल्याण और उत्थान में निरन्तन तत्पर रहती हैं। कश्मीर से विस्थापित बीना बुदकी जी ने अपने जीवन में बहुत से उतार-चढाव देखे हैं परन्तु हिम्मत नहीं हारी और न जाने कितने लोगों के जीवन में प्रकाश भरा है। एक महिला होकर लावारिस पड़ी अस्थियों का सम्मान और पूरे विधि-विधान से विसर्जन करना कोई आसान काम नहीं था। समाज और लोगों के तानों को भी सुना परन्तु वे अपने काम को करती रहीं। परम दुःख में भी वे सुख के बेलों की तरह बढ़ती रहीं, अपना रास्ता बनाया और दूसरों के अंधेरों में भी वे रौशनी भर रही हैं। आज बीना जी को भारत के सभी प्रमुख पुरस्कार प्राप्त हैं परन्तु इनकी विनम्रता ऐसी है कि सभी का दिल जीत लेती है। मेरा सौभाग्य है कि मुझको बीना जी से बात करने का और उनका साक्षात्कार लेने का मौका मिला। प्रस्तुत है उनसे की गयी बातचीत का प्रमुख अंश।

बीना जी आप कश्मीर में जन्मी हैं कैसा था आपका बच्चपन वहाँ ?
कड़वी गोलियाँ चबाई नही, निगली जाती हैं। उसी प्रकार जीवन में भी यदि अपमान, असफलता और धोखे जैसी कड़वी बातों को सीधे गटक जायें तो बेहतर क्योंकि यदि उन्हें चबाते रहेंगे तो जीवन कड़वा ही होगा। मेरा बचपन कई इलाकों में बीता है।पापा IPS सर्विस में थे तो कभी यहां और कभी वहां होते थे। मैं अपनी माँ पिता की आखिरी संतान हूँ तो मैं माँ पिता के साथ साथ बहुत देर तक रही।

आपको कब और किन हालातों में कश्मीर छोड़ना पड़ा ?
मेरा विवाह बहुत जल्दी (16 साल की आयु) हुआ। मेरे पति भी IPS थे। मेरे पति की उस वक्त कश्मीर में ही पोस्टिंग थी। 1990 जनवरी में आतंकवाद का आरंभ हुआ और 1992 तक मैने कई लोगों को कश्मीर से जम्मू पहुंचाने में मदद की। उसके बाद आतंकवाद के कारण ही मुझे भारत छोड़ना पड़ा। मैं पहले लंदन फिर 10 साल दुबई में रहने के बाद भारत लौटी। 7 सालों तक मैंने अपने दोनो बच्चो को नहीं देखा। खैर अंत भला तो सब भला। बहुत दुख परेशानियां देखी, लोगो के असली चेहरे देखे पर इस सबसे बहुत सीखने को मिला और हिम्मत फौलाद सी हो गई।

आपकी शिक्षा भारत के विभिन्न राज्यों में हुई, ऐसा क्यों ?
मेरी शिक्षा भारत के बहुत से प्रांतों में हुई। जहाँ-जहाँ मेरे पति की पोस्टिंग होती थी, मैं भी साथ जाती थी। मैंने सरकारी नौकरी 6 बार छोड़ी है, 2 बार बैंक से और फिर केंद्रीय विद्यालय से भी छोड़ी। मैंने हिन्दी में स्नातकोत्तर बरेली से, अर्थशास्त्र की शिक्षा मेरठ से, लखनऊ से स्नातक और जर्नलिज्म जम्मू से किया। मैंने M.Ed., आगरा हिंदी संस्थान से और B. Ed. Kashmir यूनिवर्सिटी से किया। मैंने हिन्दी में P. hd. कानपूर विश्वविद्यालय से और बाकी अनुवाद और भाषा विज्ञान में डिप्लोमा दिल्ली से किया।

आपका दुबई जाना कैसे हुआ?
आतंकवाद के कारण परिवार की सुरक्षा के खातिर मुझे भारत ही छोड़ना पड़ा। मैं पहले लंदन गई और जब वहाँ मन नहीं लगा तब दुबई आयी जहां शारजाह में मेरी बहन भी रहती थी।

आपने लिखना कब से और कैसे शुरू किया?
साहित्य जगत में मेरा प्रवेश जन्मजात नहीं बल्कि वक्त के साथ हुआ। 1992 में जब मैं नौकरी छोड़कर, बच्चो के साथ कश्मीर से दिल्ली आयी तब मुझे पता चला कि विद्या निवास मिश्र जी नवभारत टाइम्स दिल्ली में प्रधान संपादक हैं। मैं मिलने के लिए गई। मैं उनसे आगरा में एम एड के दौरान कई बार मिल चुकी थी। मेरे दोनों छोटे बच्चों को वे बहुत प्यार करते थे बल्कि छोटे वाले से विशेष स्नेह था। मिलने पर गुरु जी को मैने बताया की मैंने नौकरी छोड़ दी। अब क्या करूँ? गुरु जी ने कहा, लिखो “मैंने कहा”, “मुझे लिखना नहीं आता” तब तपाक से उन्होंने कहा,”कोई तीज त्यौहार तुम्हारे यहाँ मनाया जाता होगा उसी पर लिखो। “पर्व कॉलम” उस समय गुरु जी ने शुरू करवाया। यह थी लेखन की पहली सीढ़ी। फिर धीरे-धीरे महिलाओं, बच्चों, संस्कृति और शिक्षा सभी में मैं लिखने लगी। मैंने दूसरे अखबारों जैसे हिंदुस्तान टाइम्स,अमर उजाला और जनसत्ता के लिए भी लिखना शुरू कर दिया। नवभारत टाइम्स में ही भाई इब्बार रब्बी जी थे, उन्होंने मुझसे संस्कृति पर काफी लिखवाया। आशा जी ने महिलाओं पर और बस इस तरह मैं लेखन और साहित्य की सीढ़ियां चढ़ने लगी। परिवार में मेरी माँ मुझे गीत-भजन आदि लिखवाती और गवाती थीं क्योंकि साहित्य तथा संस्कृति पर उनकी गहरी पकड़ थी। बहुत कुछ बताती थीं, जिससे मेरे अंदर भी उत्सुकता पैदा होने लगी। माँ के बोए बीज आज फल फूल रहे हैं।

आज कागज़ के कवि और मंच के कवि दो अलग-अलग वर्ग में बंट गए हैं। क्या आप इस वर्गीकरण को उचित मानती हैं?
लेखन का कवि हो या मंच का कवि, उसका बँटवारा करना उचित नहीं है। कवि, सिर्फ कवि होता है उसकी वाणी समाज की चुनौतियों को काव्य द्वारा बयान करती है। कवि के काव्य में ललकारने की ताकत होती है।

आपकी पुस्तकों के नाम बहुत रोचक होते हैं कैसे सोच पाती हैं आप इतने अनूठे नाम ?
पुस्तकों के शीर्षक जीवन पर बीती सत्यता पर आधारित होते है। शरणार्थी कहानी संग्रह वह सच्ची कहानियां है जो आतंकवाद के दौरान घटित हुईं। जिस पर साहित्य अकादमी भोपाल और जम्मू से पुरस्कार मिला। नंगी इमारत का बलात्कार भी कश्मीर और जम्मू से आए शरणार्थियों की कहानियां है। इस पर भी हैदराबाद और कोलकता से पुरस्कार मिला। “जो तन लागे सो तन जाने” बस इसलिए शीर्षक वैसे होते है।

आपकी कहानियाँ बहुत ही अलग विषयों पर लिखी गयीं है। कहानियों के विषय का चुनाव आप कहाँ से करती हैं ?
ज्यादातर सभी कहानियाँ सच्ची और आँखों देखी है । गंभीर विषयों का चयन वक्त ने कराया। दो साल तक अनगिनत लोगो को कश्मीर से जम्मू रोज भेजती थी। रिश्तों और चेहरे के कई रंग देखे, इंसानियत और हैवानियत के कई दृश्य देखे। मुझे जो दिखाई देता है और दिल को पीड़ा देता है, मैं वो कहानी लिख कर दर्द को कम कर लेती हूं।

आप किसको अपना आदर्श मानती हैं ?
मेरी आदर्श मेरी माँ प्रभा रैना उर्फ संपाकुजी रैना हैं। मैं परिवार में 8-वीं और आखिरी बच्ची हूँ। माँ बताती थी कि डैडी ने मेरे पैदा होने पर घी के दिए जलाए और बहुत खुश हुए थे। क्योंकि उस समय तो लड़की पैदा होने पर रिश्तेदार माहौल को भारी और दुखी बना देते थे, लेकिन डैडी ने हम 6 बहनों की पैदाइश पर हमेशा खुशियां मनाई। डैडी का स्वर्गवास जल्दी ही हुआ था पर माँ ने सबको पढ़ाया लिखाया। बहुत जल्दी 15/16 की उम्र में सभी लड़कियों को ससुराल पहुंचा दिया। छोटी उम्र में घर का काम सिखाया, खाना बनाना सिखाया। आज मैं जो कुछ हूँ उनका सिखाया हुआ और बताया हुआ हूँ। जिंदगी को जीना, समय का सदुप्रयोग और दूसरों को प्रेरित करना उनका मुख्य ध्येय था। मेरी माँ मेरा आदर्श थीं और हमेशा रहेंगी।

जहाँ आप गंभीर विषयों पर लिखती हैं वहीँ आपने बाल साहित्य पर भी लिखा है। किस बात ने आपको बच्चों के लिए लिखने के लिए प्रेरित किया ?
दादी बनने पर, मेरे पोते ने मुझे कविता लिखना सिखाया। उनकी किलकारी, उसके प्यार को मैंने बाल साहित्य में लिखा। अब तो मोबाइल आ गए तब कहानियों का जमाना था। पोते को कहानी सुनाते-सुनाते “दादी की दास्तान” बाल साहित्य लिख डाला। अभी न सही कभी तो कहानी सुनाने का दौर आएगा तो यह कहानियाँ भी पुनर्जीवित हो जायेंगी।

आपने बहुत से अनुवाद कार्य भी किये हैं। अनुवाद करना कितना कठिन है और कितना आसान ?अनुवाद करने समय किन किन बायतों का ध्यान रखना रखना चाहिए ?
मैंने अनुवाद का डिप्लोमा दिल्ली से इसीलिए किया था कि बस का पास मिलेगा। लेकिन बाद में उस डिप्लोमा का बहुत लाभ भी हुआ। अनुवाद करते समय कठिन शब्दों का प्रयोग और शब्द से शब्द का अनुवाद जरूरी नहीं है बल्कि भाव स्पष्ट होना चाहिए। सरल, सहज और आम बोलचाल की भाषा अपनानी चाहिए ताकि सबको समझ आ सके।

आपकी अभी तक कितनी कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं? और किन-किन विधाओं में?
मैं एक साहित्यकार हूँ और मैं गद्य, कहानी, कविता, निबंध और अनुवाद में रुचि रखती हूँ। मैंने गीतों और ग़ज़लों को भी लिखा पर कुछ लिखने से गीतकार या ग़ज़लकार नही बन सकती। मेरा लेखन ही मेरा परिचय देता है। मेरी अभी तक कहानी, उपन्यास, निबंध, कविता और अनुवाद की 49 पुस्तकें छप चुकी हैं। मेरी कोशिश निरंतर नई दिशा नया विषय ढूंढती रहती है।

हिन्दी कश्मीरी संगठन की स्थापना का विचार आपको कैसे आया ?
दुबई में कार्य करते हुए मैं अपने पर्वों को मनाती थी। एक गणपति का रोठ पर्व पर मोटे मोटे मीठे बनाए जाते हैं। मेरा ही एक शिष्य जिसे मैंने घर के लिए प्रसाद दिया, उसने उसे मीट के साथ खाया था। जब मुझे पता चला तो दुख हुआ पर साथ ही एहसास हुआ कि कसूर इसका नही बल्कि माँ बाप का है जो अपने धर्म की संस्कृति को भूल चुके हैं। जब भारत आयी तो आकर, कश्मीर में ही हिन्दी-कश्मीरी संगम की स्थापना की और कश्मीर संदेश पत्रिका द्वारा संस्कृति पर्व और संत और साहित्य पर लिखा और लिखवाया।

माँ बचाओ परिवार बचाओ अभियान का प्रारम्भ कैसे हुआ ?
माँ बचाओ, परिवार बचाओ अभियान का आरंभ उन महिलाओं को देखकर हुआ जिनको बच्चे पूछते नहीं और पति छोड़ देते हैं। काश वह समझ पाते कि जब तक माँ है, घर, परिवार और समाज भी जुड़ा रहता है। माँ ही केवल हर तीज त्यौहार में बच्चो की राह देखती है, माँ के बाद कोई राह नहीं देखता। फिर लेन-देन के रिश्ते शुरू हो जाते है। माँ ही सिर्फ निस्वार्थ रिश्ता है।

अस्थियों के विसर्जन का जो महान कार्य आप कर रहीं हैं उसका प्रारम्भ कैसे हुआ और इस कार्य को करने में कौन कौन सी समस्याएँ आयीं ?
कश्मीरमें संगोष्ठी के दौरान एक बिहारी मजदूर की मृत्यु हो गई। उसकी पत्नी 15 दिन पहले ही आई थी। वह किसी को नही जानती थी। उस दिन एहसास हुआ कि उसको ले जाने के लिए चार कंधे भी नही मिल रहे थे। किसी तरह नहला धुला कर चादर में लपेट कर ऑटो रिक्शा में उसकी पत्नी और मैं लेकर गई। तब पहली बार एहसास हुआ कि ऐसे जाने कितने होंगे और जब मैं बादामी बाग के शमशान गई तो बहुत सी अस्थियां पड़ी थी। उनको मोक्ष हेतु हरिद्वार ले जाने का निर्णय किया। 2014 से इस तरह यह कार्य आरंभ हुआ और हर पितृ पक्ष मैं अस्थियों को हरिद्वार ले जाती थी। 2014 से 2016 तक कश्मीर से हरिद्वार यात्रा पर गयी, 2017 से 2019 तक दिल्ली से हरिद्वार यात्रा पर गयी और 2019 से मुंबई से हरिद्वार यात्रा आरंभ हुई। हम मुंबई, दिल्ली, गाजियाबाद, चंडीगढ़,अहमदाबाद, जम्मू-कश्मीर सभी जगह के शमशानो से अस्थियां लाते है। सिंगापुर और दुबई संगोष्ठी के लिए गए थे और वहां 14 साल से रखी अस्थियां लेकर आए। दुबई से मजदूरों की अस्थियाँ लाए जो पैसे के कारण अपने गाँव न आ सके। दिक्कत यह है कि लोग शमशान जाने से डरते हैं, उन दिव्य आत्माओं की अस्थियों से डरते है। काम कोई कोई दिल से करता है बाकी फोटो खिंचवाने आते हैं। हमें कही से कोई मदद नहीं मिलती है। कोई इक्का-दुक्का थोड़ी मदद कर देता है। खैर ईश्वर द्वारा दिया कार्य है, हमेशा वही नैय्या पार लगाते है।

अपने परिवार के बारे में कुछ बताइये और आपके कार्यों में उनका सहयोग कितना रहा ?
मेरे परिवार में पति दीपक बुदकी (IPS ऑफिसर), संदीप और ज्योति, विनीत और निधि पोते रूशिल, काविश और विवान है। पति भी उर्दू लेखक हैं और नौकरी के साथ साथ कई पुस्तके लिखीं। हमारे घर में सब अपना काम स्वयं करते हैं। पति और बेटे खुद ही इतना व्यस्त हैं कि कोई उम्मीद नहीं रखती इसलिए अपना काम चुपचाप करती हूँ। वर्ना किसी दिन कह दिया कि बैठ जाओ घर में, कुछ नहीं करना तो बेवजह कलह होगी। मेरा विश्वास कर्म में है, मैने अपना कर्म किया और ईश्वर ने अपना आशीर्वाद दिया। उन पैसों से संस्था चली, संगोष्ठिया की कई पुस्तकों को प्रिंट करवाया और भी कई काम हो जाते है ।

आपको बहुत से पुरस्कार मिलें हैं। पुरस्कार आपके लिए जीवन में क्या महत्त्व रखते हैं?
माँ बचाओ पुरस्कार आदि भी देते हैं। पुरस्कार से कार्य करने की क्षमता बढ़ जाती है। कश्मीर की पहली महिला हूँ जिसने आतंकवाद में भी निरंतर संगोष्ठी की, कर्फ्यू में भी और बम धमाकों में भी निरंतर कार्य किया। कम से कम 80 साहित्यकार देश विदेश से आते थे। एक सप्ताह मेरे साथ रहते थे और पूरे विश्व में सूचना जाती थी। निस्वार्थ कार्य हमेशा फल देता है। मैंने जो सपने में भी नही सोचा था, वह सभी कुछ मिला। उस ईश्वर का बहुत-बहुत धन्यवाद जिसने अपना हाथ मुझ पर रखा, हर मुश्किल में साथ दिया और उन सभी लोगों का जिनका स्नेह हमेशा आशीष बनकर मुझ पर रहा।

लेखन के माध्यम से आप समाज को क्या संदेश देना चाहती हैं?
मेरा सन्देश उन सभी के लिए है जो कुछ करना चाहते हैं। दुश्मनों की बातों को गौर करें और उनको अपने जीवन में सुधार करके अपनाए। ईर्ष्या, किसी से न करें, जो भी काम करें कुछ अलग करें। कोई काम छोटा नहीं होता। घर की जिम्मेदारियों और कार्य को बोझ नहीं अपना कर्म समझें। बुराई-भलाई के खेल में कम भाग लें। अपने अंदर मानवता को पनपने दें, कुछ कार्य निस्वार्थ भी करें। “मैं” को अपने दिलो दिमाग से निकाल दें। हर पुरुष और महिला में कोई न कोई गुण है। अपनी कमजोरी को ही शक्तिशाली बनायें। महिलाएं श्रोता ज्यादा बनें, वक्ता कम। हर किसी को दादागिरी या जवाब देना बहादुरी नहीं बल्कि आपके व्यक्तित्व में आप दीमक को पनपने देते हैं। मदद की भावना रखें। अपने धर्म और कर्म को करते रहें। झूठ के सहारे आगे बढ़ने का प्रयत्न न करें उसमें ज्यादा सफल नहीं होंगें। अपने बड़े बुजुर्गो का आशीर्वाद लें। हर काम बढ़िया है, सिर्फ अपने अंदर “कोशिश” का बीज बोकर उस वृक्ष की सेवा करें, कोशिश आपको मंजिल तक ज़रूर पहुंचाएगी। गालिब का भी कहना था, “खुदी को कर बुलंद इतना कि, खुदा बंदे से पूछे कि बता तेरी रज़ा क्या है”l

रचना श्रीवास्तव (लॉस एंजेल्स )
रचना श्रीवास्तव अमरीका में रहती हैं और वहाँ रह रहे भारतीय लोगोॆं की गतिविधियों पर नियमित रूप से लिखती हैं।

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