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पांचवीं पास उत्तरा बाई ने जीवन की दूसरी पारी में शुरू की जैविक खेती, बनीं मिसाल

कठिन परिस्थितियों से लड़कर अपने साथ-साथ समाज के भी जरूरतमंद लोगों को अपने पैरों पर खड़ा करने वाली पांचवीं पास उत्तराबाई समाज के लिए आज एक मिसाल बन गई हैं। कटनी की रहने वाली उत्तराबाई के परिवार की आर्थिक स्थिति जब बिगड़ी, तो उन्होंने समाज के दकियानूसी रिवाजों को ताख पर रखते हुए पहली बार घर से बाहर कदम निकाला। समाज पर हावी दकियानूसी सोच के कारण उसे कहीं भी काम नहीं मिला।

फिर उन्होंने निर्णय लिया कि, अपने ही खेतों को इस लायक बनाऊंगी कि वे सोना उगलें। उन्होंने बंजर पड़े अपने 5 एकड़ खेतों में 2002 में जैविक खेती की शुरुआत की और धीरे-धीरे से ये सोच इतनी सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ी कि सरकार ने प्रदेश की पहली जैविक खेती पाठशाला उत्तरा के गांव में बनावाई। जहां आज के समय में भारत से ही नहीं डेनमार्क और जर्मनी जैसे कई देशों के वैज्ञानिक भी उत्तरा से जैविक खेती का गुर सीखने आते हैं।

इच्छाशक्ति ने बंजर जमीन पर खिलाए फूल:

उत्तरा ने कहा कि मैंने कृषि विभाग के डायरेक्टर जीएस कौसर से कई बार जैविक खेती के बारे में सुना था, लेकिन उस समय मैं केवल चूल्हे-चौके तक सीमित थी। जब खुद मेहनत करने का मन बनाया तो पहली बात दिमाग में यही आई कि बंजर पड़े मेरे खेतों में ही क्यों ना जैविक खेती शुरु की जाए और मन की सोच को खेतों तक लेकर आई। खेतों को खेती लायक बनाने में काफी संघर्ष का सामना करना पढ़ा।

लेकिन मैंने मेहनत करनी नहीं छोड़ी। पहली खेती में सब्जियों बोईं फसल बहुत अच्छी रही। फिर क्या आस-पास के किसानों ने भी इसके बारे में जानने और इसी विधि से खेती करने का मन बनाया। गांव में इसे लेकर चर्चा चली और निर्णय हुआ कि हर मंगलवार हमारे ही आंगन में जैविक खेती की पाठशाला लगेगी। पिछले 13 सालों से इस पाठशाला में 30 से 50 किसान नियमित रूप से शामिल होते हैं और जैविक खाद, फसलों और जैविक कीटनाशकों पर चर्चा करते हैं। अब हमारा गांव नईवां ही “जैविक ग्राम” के नाम से जाना जाता है।

36 लाख में बनीं पहली जैविक पाठशाला:

कुछ महीनों पहले ही मंडी बोर्ड ने इस जैविक पाठशाला की सफलता को देख 36 लाख 40 हजार रुपए खर्च कर एक स्कूल बनवाया। अब हर मंगलवार यहां दोपहर 2 बजे से किसानों के लिए पाठशाला लगती है। अब तक करीब 3,000 से भी ज्यादा टीमें को उत्तरा बाई जैविक खेती के तरीके को सीख चुके हैं। उत्तरा के पति राम सिंह ठाकुर ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद मैं पिछले 5 सालों से अपने पत्नी के इस कार्य में मदद कर रहा हूं। मुझे तो कभी नहीं पता था कि एक हाथ का लंबा घूंघट करने वाली उत्तरा एक दिन जैविक खेती भी करेगी और लोगों को इसके बारे में बताएगी भी।

लोकगीतों को प्रचार-प्रसार का माध्यम:

उत्तराबाई भले ही 5वीं तक की तालिम हासिल की है, लेकिन जैविक खेती की उन्हें अब काफी समझ है। वे इसे लेकर नित नए प्रयोग भी करती रहतीं है। इसी के तहत जैविक खेती के तरीकों को को जन-जन तक पहुंचाने के लिए वे लोक गीतों लिख रहीं हैं। गीत पूरी तरह से जैविक खेती करने के तरीकों को बताएंगे। उत्तरा के मुताबिक, गांव और लोकगीत आपस में इस तरह रचे-बसे हैं कि इन्हें कोई अलग नहीं कर सकता।

मैं चाहती थी कि खेती सिर्फ पुरुषों की जिम्मेदारी न हो, महिलाएं भी इसमें उतनी ही भागीदारी निभाएं। गांव में शादी हो या बच्चे का जन्म… हर मौके पर लोकगीत गाए बजाए जाते हैं। इसीलिए मैंने लोकगीतों में जैविक खेती के तरीकों को लाने की शुरुआत की। अभी तक गौ-मूत्र खाद, मटका खाद, बीजामृत, वर्मी कम्पोस्ट, जीवामृत और मछली खास आदि को बनाने के तरीकों पर केन्द्रित मैं करीब 15 लोकगीत बना चुकी हूं, जिन्हें अब मैं ही नहीं बल्कि गांव की पूरी महिलाएं मिलकर गाती हैं।

– साभार- http://naidunia.jagran.com से

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