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कश्मीर घाटी में हो रहे वैचारिक प्रदूषण को सिर्फ आर्थिक प्रावधानों से नहीं रोका जा सकता

भारत का जम्मू कश्मीर राज्य आज बन्दूकधारी अत्तंक्बाद से तो पीडित है है पर इस से भी ज्यादा चिंता भारत के राजनीतिक और सामाजिक नेत्रित्व को इस बात की होनी चाहिए कि जम्मू कश्मीर के निबासी ( ख़ास कर कश्मीर घाटी के ) अब भावनात्मक और विचारत्मक प्रदूषण से भी पीड़ित होते जा रहे है. यह भी कहा जा सकता है सिधान्त्बादिकता का प्रदूषण या वैचारिक प्रदूषण उस बन्दूकधारी आतंकबादी से कहीं अधिक चिंता का विषय होना चाहिए जो किसी को सिर्फ शारीरिक क्षति पहुंचा सकता है पर वैचारिक प्रदूषण एक ऐसे अत्तंक्बाद को जनम दे सकता है जो सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और राष्ट्रियता की दृष्टि से कहीं अधिक हानिकारक हो सकता है. जम्मू कश्मीर में कुछ संगठन और कई लोग भोतिक वातावरण प्रदूषण से भी अधिक घातक होने बाले वैचारिक प्रदूषण को फैलाने में ब्यस्त हैं और भारत सरकार ने तो इस ओर अब ज्यादा ध्यान देना ही पड़ेगा .

भारत के जम्मू कश्मीर राज्य के बारे में कई प्रकार की भ्रांतियां अक्टूबर १९४७ में इस राज्य का भारत के साथ अधिमिलन होने के बाद भी पनपती रही है. संक्षेप में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि भारत सरकार सत्ता में रहने बालों ने भी कुछ ऐसी भ्रांतियां पनपने दी हैं जिन का अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की प्रभुसत्ता और जम्मू कश्मीर राज्य की आंतरिक सम्बिधानिक स्थिती पर प्रभाव दीखता है.. यही नहीं उन नेताओं पर भी कुछ दोष जरूर दिया आ सकता है जो जम्मू कश्मीर से सम्बंधित मामलों को घम्भीरता से न लेने का दूसरों पर आरोप लगाते रहे हैं और स्वयं भी आम नागरिक तक सही तथ्य पहुँचाने के कोई प्रतक्ष प्रयास करते नहीं दीखते हैं.

जम्मू कश्मीर राज्य के लोग आज आतंक और प्रिथिक्ताबाद से ग्रसित वातावरण में रह रहे हैं.ऐसा १९९० के बाद ही हुआ है यह कहना उचित नहीं है पर इतना जरूर कहा जा सकता है कि १९९० के बाद भी शीर्ष स्तर पर सत्ता में बैठे और राजनीति की डोर पकडे लोगों ने १९९० के बाद भी इस राज्य को सत्ता के खेल में ऊल्जाए रखने में कोई परहेज नहीं किया है. इस का नतीजा यह हुआ है कि कश्मीरी हिन्दू के घाटी से विस्थापन के २५ साल बाद भी आज जम्मू कश्मीर आतंकबाद घ्रसित है और यह आतंकबाद एवं भारत विरोध सिर्फ बन्दूक तक ही सीमित नहीं रहा है , इस ने मानसिक स्तर पर भी कुछ हद तक असर डाल दिया है . आज के दिन भारत सरकार और २६ अक्टूबर १९४७ को भारत के साथ जम्मू कश्मीर के अधिमिलन के पक्षधर वर्ग को सिर्फ पाकिस्तान , विदेशी आतंकबादियोँ, बंदूकधारी विरोधिओं और अधिमिलन पर प्रश्न करने बालों से नहीं निबटना है. आम जम्मू कश्मीर के बासी के मस्तिक्ष में घर कर रही भ्रन्तिओं और प्रश्नों का भी निबारण करना है जो केबल आर्थिक और प्रशासनिक तंत्रों से ही नहीं किया जा सकता.
जम्मू कश्मीर के विधान की धारा 3 में साफ़ लिखा गया है कि जम्मू कश्मीर राज्य भारत का एक अटूट अंग है और यह राज्य भारत के संबिधान के अनुच्छेद -१ के अनुसार भी भारत की मूल राज्य सूची का हिस्सा है. इस पर भी कई सालों से कश्मीर घाटी के कुछ मुख्यधारा के कहे जाने बाले नेता भी यह कहते आ रहे हैं कि भारत के संबिधान का अनुच्छेद ३७० जम्मू कश्मीर राज्य और भारत के बीच एक पुल या सेतु है इसलिए इस अनुच्छेद को अगर छेड़ा गया / हटाएया गया तो जम्मू कश्मीर राज्य भारत का अंग नहीं रहेगा. केन्द्र सरकार एवं भारत के कुछ शीर्ष राजनीतिक नेताओं द्वारा इस प्रकार के कथन पर कोई सही टिपण्णी न करने या इस प्रकार के कथन को न नकारने के कारण जम्मू कश्मीर के तो क्या भारत के अन्य राज्यों में रहने बाले कई बुद्धिजीवी भी इस प्रकार के दाबों के शिकार होते आज तक दीखते रहे हैं.
कांग्रेस के नेत्रित्व बाली सरकारों पर अकसर राष्ट्रहित में काम न करने के आरोप लगते रहे हैं, पर २०१४ में दिल्ली में बीजेपी की सरकार आने के बाद भी किस प्रकार से अधिमिलन पर प्रश्न खड़े करने बाले विचारक और जम्मू कश्मीर राज्य की सम्बेधानिक स्थिति पर प्रश्न लगाने बाली विचारधारा हाबी रहे हैं इस का प्रतिबिम्ब २८ फरबरी २०१५ को राज्य सभा में पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर से भी मिलता है. राज्यसभा सदस्य डॉ0 संजय सिंह के प्रश्न संख्या १९७ दिनांक २५ फरबरी २०१४ कि क्या गृह मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि : (क) क्या सरकार जम्मू-कश्मीर राज्य के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने का इरादा रखती है; … और (ग) यदि नहीं, तो इसके क्या कारण है ? के उत्तर में गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री हरिभाई परथीभाई चौधरी जी ने कुछ इस तरह कहा कि वर्तमान में संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने का कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है और ऐसा इस कारण है कि (i) अधिमिलन लिखत के आधार पर भारत संघ के साथ जम्मू एवं कश्मीर राज्य के बने रहने के लिए भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 बनाया गया था (ii) इस प्रकार, अनुच्छेद 370 भारत संघ के साथ जम्मू एवं कश्मीर राज्य के मौजूदा संबंध को बनाए रखने का एक माध्यम है (iii) इस अनुच्छेद के माध्यम से, केन्द्रीय संसद को अधिमिलन लिखत में अथवा जम्मू एवं कश्मीर राज्य सरकार की सहमति से बाद में शामिलही दिया किए गए विनिर्दिष्ट मामलों के संबंध में कानून अधिनियमित करने का अधिकार प्राप्त है।

ऐसा उतर यकिनन सही प्रकार से विचार न करके दिया गया लगता है. अगर ऐसी बात न होती तो ११ मार्च के दिन प्रश्न संख्या १३८ का उसी राज्य सभा में दिया गया उतर प्रश्न १९७ के उतर से इतना भिन्न न होता . सांसद श्री अनिल देसाई के प्रश्न कि क्या गृह मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि क्या यह सच है कि संविधान में अनुच्छेद 370 के माध्यम से जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान किया गया है के उतर में गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री हरिभाई परथीभाई चौधरी ने 11 मार्च २०१५ को लिखित तोर पर कहा कि भारत के संविधान में, “जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा” का कहीं उल्लेख नहीं है एवम अनुच्छेद 370 में “जम्मू और कश्मीर राज्य के संबंध में अस्थायी उपबंधों” के लिए प्रावधान हैं।
देखिये प्रश्न १९७ और प्रश्न १३८ के उतर में कितना अन्तर है. हाँ यह कहा जा सकता है कि प्रश्न १३८ का उतर देने से पहले विषय की गंभीरता पर कुछ विचार जरूर किया गया है. प्रश्न संख्या १९७ के उतर से भारत के हित में सोचने बालों को काफी निराशा हुई होगी क्यों कि इस से अगर कोई कहे कि अल्गाब्बादी तत्बों को इस से कोई लाभ नहीं मिलता है तो भी इस से ग्रेटर ऑटोनोमी या सेल्फ रूल की बात करने बालों को तो जरूर कुछ बल मिला होगा. पर जिस प्रकार से जम्मू कश्मीर के कथित विशेष दर्जे और अनुच्छेद ३७० से संबंधित प्रशन संख्या १३८ का उतर भारत सरकार ने ११ मार्च २०१५ को संसद में लिखित दिया उस से लगा था कि कुछ मंथन दिल्ली में अब आरम्भ हुआ है. पर बीजेपी नेत्रित्व बाली दिल्ली सरकार को अभी जम्मू कश्मीर सम्बंदित समस्याओं के संधर्व में बहुत कुछ समझने और करने की जरूरत है. कश्मीर घाटी में हो रहे वैचारिक प्रदूषण को सिर्फ आर्थिक प्राबधानों से नहीं रोका जा सकता इस के लिए सरकार को सामजिक स्तर पर भी काम करना होगा.

दया सागर वरिष्ठ स्तंभकार एं लखक हैं और जम्मू कश्मीर के लाखों पीड़ितों में से हैं
संपर्क 09419796096 [email protected]

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