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रेल मंत्री के ये प्रयोग अगर सफल हो जाएँ

हादसे का वक्त इससे ज्यादा अपशकुन वाला नहीं हो सकता था। जिस दिन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने नवाचार पर सुझाव के लिए कायाकल्प परिषद की कमान संभालने के लिए रतन टाटा को आमंत्रित किया, उसी दिन हुए रेल हादसे में 39 लोग मौत के शिकार हो गए। अगले दिन इसी अखबार ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसमें अर्थशास्त्री विवेक देबरॉय की अगुआई वाली समिति की सिफारिशों को शामिल किया गया था, समिति का गठन रेलवे की गाड़ी को पटरी पर लाने में मदद के मकसद से किया गया था।
 
राजीव गांधी ने रतन टाटा को एयर इंडिया का चेयरमैन और राहुल बजाज को इंडियन एयरलाइंस का चेयरमैन बनाया था ताकि नए विचारों और त्वरित फैसलों के साथ उन दोनों कंपनियों का कायाकल्प हो सके। राजीव गांधी का प्रधानमंत्रित्वकाल बहुत लंबा नहीं चला और हम जानते हैं कि बाद में इन दोनों कंपनियों के साथ क्या हुआ। एंप्रेस मिल्स और नेलको को संभालने में रतन टाटा को कामयाबी नहीं मिली लेकिन टाटा समूह को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने में उन्होंने ऐतिहासिक भूमिका अदा की। यह संभवत: अत्यधिक सरलीकरण होगा लेकिन फिर भी सच है कि किसी एक कंपनी के प्रबंधन के मामले में रतन टाटा उतने कारगर नहीं रहे लेकिन जब किसी संगठन को एक दृष्टिïकोण देने की बारी आई तो वह बेजोड़ साबित हुए।

अभी रेलवे को सबसे पहले किस तरह के प्रबंधकीय उपचार की दरकार है? तात्कालिक रूप से विचार कितने प्रासंगिक होंगे? मेरे ख्याल से इस गंध को साफ करने के लिए आपात कदम उठाने की जरूरत है। सबसे बुनियादी स्तर आधारभूत खामी दुर्घटना के मामलों में नजर आ रही है जो वक्त के साथ और बदतर होती जा रही है। पिछले दस वर्षों के दौरान यात्री हादसों में चार गुना वृद्घि हुई है। मार्च, 2013 में लोकसभा सचिवालय द्वारा तैयार एक विवरणिका के अनुसार 2002-03 में प्रति दस लाख मुसाफिरों पर 0.03 के आंकड़े से 2011-12 में यह बढ़कर 0.126 हो गया। जब हम इन हादसों में हुई मौतों पर नजर डालते हैं तो तस्वीर और साफ होती है। वर्ष 1965-96 के बीच तीन दशकों तक अगर अपवादस्वरूप कुछ बुरे वर्षों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश वर्षों में दुर्घटनाओं में हुई मौतों का आंकड़ा 100 से कम के दायरे में ही रहा।
पिछले एक दशक में चीजें खराब होना शुरू हुईं। वर्ष 2003-04 से 10 में से नौ वर्षों के दौरान दुर्घटनाओं में मृतकों की संख्या 100 से ज्यादा रही जबकि इनमें से छह वर्षों में यह आंकड़ा 200 से अधिक और तीन वर्षों में 300 से अधिक रहा। पिछले कुछ वर्षों के दौरान रेलगाडिय़ों में आग लगने के भी काफी मामले सामने आए हैं। रेलगाडिय़ों के डिब्बे बनाने में, जिस सामग्री का इस्तेमाल होता है, वह वास्तव में अग्निरोधी है या नहीं, जैसा कि अनिवार्य होता है? विवरणिका के अनुसार अधिकांश हादसे प्रक्रियात्मक नाकामियों की वजह से होते हैं। सिग्नल और रूट रिले इंटरलॉकिंग जैसे तंत्र पुराने पड़ चुके हैं, जिनसे गड़बडिय़ां होती हैं और जिन पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। 1990-91 में 16 लाख कर्मियों की तादाद को पिछले तीन वर्षों में घटाकर 13 से 14 लाख करने पर रेलवे ने बड़ी शाबाशी हासिल की लेकिन आखिर किस कीमत पर? लाखों सुरक्षाकर्मियों के पद रिक्त हैं।

तमाम हादसे गाड़ी के पटरी से उतर जाने, दो रेलगाडिय़ों की भिड़ंत और क्रॉसिंग पर गड़बड़ी के कारण होते हैं। इसकी वजह भी रेलवे की पुरानी पड़ चुकी पटरियां और गड़बड़ी वाला रॉलिंग स्टॉक है। खराब रखरखाव भी एक  महामारी है। हालिया हादसे में भी खुद रेलवे की ओर से आरोपों की झड़ी लगी। रखरखाव के लिहाज से रेलगाड़ी की हालत खराब थी और कर्मचारी संघ के नेताओं का आरोप है कि दो स्टेशनों पर कमजोर ब्रेकों की शिकायत पर संबंधित विभागों ने गौर ही नहीं किया। दुर्घटना का स्पष्टï कारण सिग्नल का अतिक्रमण करना था लेकिन यह कमजोर ब्रेक पावर के कारण हो सकता है। आने जाने के पूरे चक्कर के लिए रखरखाव पंजीकरण प्रत्येक दौरे के निरीक्षण के बाद दिया जाना चाहिए। कर्मचारी संघों के सदस्यों की तो छोडि़ए रेलवे के ही तमाम लोग निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि लागत में कटौती और लंबी प्रक्रियाओं से बचने की कवायद ही दुर्घटनाओं की असल वजह हैं।

विवेक देबरॉय समिति के बारे में माना जा रहा है कि वह रेलवे के पूरी तरह निजीकरण या व्यवसायीकरण के बजाय यात्री और मालगाडिय़ों के संचालन के अलावा रॉलिंग स्टॉक के उत्पादन के निजीकरण का सुझाव दे सकती है। इसमें निजी रेलगाडिय़ों द्वारा टै्रक के उपयोग को लेकर स्वतंत्र नियामक का प्रावधान हो सकता है। टै्रक सहित बुनियादी ढांचे का प्रबंधन एक मूल कंपनी के तहत स्वतंत्र कंपनी द्वारा किया जाना चाहिए।

रेल यातायात बहुत बढ़ा है, जिसमें कई रेलगाडिय़ां जुड़ी हैं और अधिक नौकरियां सृजित हुई हैं। ग्राहक सेवा, विश्वसनीयता, मुनाफा और सक्षमता में कोई खास सुधार नहीं हुआ लेकिन सुरक्षा रिकॉर्ड स्पष्टï रूप से सुधरा है। निजीकरण के साथ ही सरकारी नियंत्रण भी वास्तव में बढ़ा है, नतीजतन ढांचा और जटिल हुआ है। असली सबक यह नहीं है कि निजीकरण नाकाम हुआ है बल्कि यह है कि अनुभवों से सीखने वाला और कारगर युक्तियों को तलाशने वाला एक तंत्र है। अगर स्वास्थ्य रूपकों का इस्तेमाल करें तो देबरॉय समिति द्वितीयक देखभाल में परिर्वतन की सिफारिशें करेगी और रतन टाटा तृतीयक देखभाल के लिए एक दृष्टिïकोण को विकसित करेंगे लेकिन असल में रेलवे को इस समय प्राथमिक देखभाल की दरकार है। बुनियादी चीजों की ओर लौटना बेहद जरूरी है, पुराने ढांचे को बदलना होगा, रखरखाव के क्रम को लेकर सख्त होना होगा और प्रक्रियात्मक अभ्यास करना होगा ताकि आने वाले वर्षों में सुरक्षा सुनिश्चित हो सके और कर्मियों की प्रतिबद्घता और हौसला बढ़े। उदासीनता और भ्रष्टïाचार की मौजूदा संस्कृति की जगह वास्तव में नए नेतृत्व की जरूरत है, जो वफादारी और प्रतिबद्घता वाला हो।
 
साभार- बिज़नेस स्टैंडर्ड से

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