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हरियाली की राहों में भविष्य की खुशहाली

प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा मानते हैं कि अगर दुनिया को बचाना है तो हिमालय को पूरी तरह पेड़ों से ढकना होगा।पर्यावरण के खतरों पर विश्व में चिंता तो बढ़ी है और कुछ पहल भी शुरू हुई है, लेकिन भारत की स्थिति इन देशों से अलग है। विकसित देशों में जमीन ज्यादा है और आबादी कम। इस कारण वहां जंगल लगाए जा रहे हैं, जबकि हमारे यहां आबादी बसाने और बांध बनाने के लिए जंगल काटे जा रहे हैं। इतना ही नहीं, खेती की जमीन को रासायनिक खादों के जरिए नशेबाज बनाया जा रहा है। पेड़ हैं नहीं सो मिट्टी बह रही है। स्थिति यह है कि जमीन का पानी समाप्त हो रहा है। इसलिए हम अब भी न चेते तो कुछ समय बाद न तो जमीन बचेगी और न हमें पानी मिलेगा। वे कहते हैं कि भारत में वृक्षों की पूजा के पीछे अंधविश्वास नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के शिक्षक लुई फाउलर स्मिथ अपने शोधकार्य के सिलसिले में पांच वर्षो तक पूरे भारत के जंगलों में घूमे। उन्होंने हिंदुओं की वृक्ष पूजा की परंपरा का वैज्ञानिक आधार बताया है। हमारी संस्कृति ही अरण्य संस्कृति थी। हमारे गुरुकुल वनों में थे। 

लिहाज़ा, विशेषज्ञों की ये बात भी पते की है कि आईटी के बाद ग्रीन जॉब्स यानी हरियाली से जुड़े जॉब में होगा खुशहाल आने वाला कल। आखिर क्या हैं ग्रीन जॉब्स? एक सर्वे के अनुसार, ज्यादातर एमबीए आवेदक ऐसे जॉब चाहते हैं, जिसमें न केवल खूब कमाई हो, बल्कि उनके स्किल का प्रयोग पर्यावरण को हरा-भरा रखने में भी हो। इसे आप एक पंथ दो काज या आम और गुठलियों के दाम की तरह भी देख सकते हैं। यूनाइटेड नेशंस एन्वॉयरनमेंट प्रोग्राम, इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन और इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कॉन्फेडरेशन और इंटरनेशनल एम्प्लॉयर्स ऑर्गेनाइजेशन ने मिलकर लॉन्च किया ग्रीन जॉब्स इनिशिएटिव। एनर्जी एफिशिएंसी और एन्वॉयरनमेंटल फ्रेंडली फील्ड, जैसे-एनर्जी, युटिलिटी, कंस्ट्रक्शन और मैन्यूफैक्चरिंग आदि को ग्रीन जॉब्स में रखा गया है।

क्या है ग्रीन जॉब ?
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उत्पादन और खपत  का ऐसा काम जो ईको फ्रेंडली यानी पर्यावरण हितैषी हो, ग्रीन जॉब कहलाता है। इसे हम कुछ उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि कोई आर्किटेक्ट सौर ऊर्जा का प्रयोग करने वाले बिल्डिंग की डिजाइन तैयार कर रहा हो या अनाज उपजाने के काम में लगी ग्रामीण महिला या फिर वाटर री-साइक्लिंग सिस्टम से जुडा हुआ प्लंबर-ये सभी काम ग्रीन जॉब्स के अंतर्गत आते हैं। एग्रिकल्चर, रिसर्च ऐंड डेवलॅपमेंट, मैनूफैक्चरिंग, सर्विस और एडमिनिस्ट्रेटिव सेक्टर, जो एन्वॉयरनमेंट को सुरक्षित रखने और ईकोसिस्टम को बैलेंस रखने का काम करते हैं ग्रीन जॉब कहते हैं।

इसी तरह वानिकी एक ऐसा रोचक अध्ययन क्षेत्र है जो उन सब सिद्धांतों तथा व्यवहारों से मिलकर बना है जिनमें वनों के सृजन, संरक्षण तथा वैज्ञानिक प्रबंधन और उनके संसाधनों का उपयोग शामिल है। भारत में वैज्ञानिक वानिकी की शुरुआत सबसे पहले 1864 में वन प्रबंधन के लिए वानिकी व्यावसायिकों को प्रशिक्षित करने के वास्ते हुई थी। देश में विश्वविद्यालय स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्ष 1985 में उस समय आरंभ हुई जब राज्य कृषि विश्वविद्यालयों-वाईएसपी यूएचएफ, सोलन तथा पीडीकेवी, अकोला में चार वर्ष के डिग्री कार्यक्रम के रूप में बीएससी वानिकी पाठ्यक्रम शुरु किया गया। बाद में यह कार्यक्रम 1986 में जीबीपीयूएटी, पन्त नगर तथा टीएनएयू, कोयम्बत्तूर में तथा इसके बाद 1987 में ओयूएटी, भुवनेश्वर तथा जेएनकेवीवी, जबलपुर में शुरु किया गया। अब यह कार्यक्रम बहुत से राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में संचालित किया जा रहा है। इसके अलावा कुछ कृषि विश्वविद्यालयों में वानिकी से संबंधित विशेष विषय में विशेषज्ञता के साथ वानिकी/कृषि-वानिकी में मास्टर और डॉक्टरल डिग्री पाठ्यक्रम संचालित किए जाते हैं। हाल के दिनों में कुछ परंपरागत विश्वविद्यालयों ने भी वानिकी शिक्षा की शुरुआत की है। 

ताजा अनुमानों से यह सिद्ध होता है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वानिकी क्षेत्र का उल्लेखनीय योगदान और महत्व है। विपरीत वन्य स्थिति से निपटने के लिए कुशल मानवशक्ति की आवश्यकता होती है ताकि शोध कार्यों और निर्देशक सिद्धांतों के आधार पर उपर्युक्त कार्य योजनाएं तैयार की जा सकें। इस प्रकार नीति और अनुप्रयोग की दृष्टि से वानिकी/कृषि वानिकी प्रबंधन से जुड़े पाठ्यक्रमों का बहुत महत्व है। वर्ष 2007 में भारत में कृषि (वानिकी सहित) शिक्षा पर बनाई गई भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की चौथी डीन कमेटी की सिफ़ारिशों पर स्नातकपूर्व-स्तर पर वानिकी कार्यक्रम हेतु समय की मांग के अनुरूप पाठ्यक्रम और निर्देशन व्यवस्था में संशोधन किए गए हैं। सामान्यतः वानिकी शिक्षा, अनुसंधान, प्रशिक्षण और विस्तार पर्यावरण और वन मंत्रालय, भारत सरकार के पर्यवेक्षणाधीन है। 

पर्यावरण और वन मंत्रालय के अधीन सर्वोच्च संस्था के रूप में कार्यरत भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसी एफआरई) वानिकी अनुसंधान, प्रशिक्षण, विस्तार और शिक्षा में सक्रियता के साथ जुड़ा हुआ है। मंत्रालय के अधीन विभिन्न आठ वन संस्थान कार्यरत हैं। ये हैं ईसीएफआरई, देहरादून,इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वन अकादमी, हेदरादून, जो सर्वोच्च वन प्रशासक (आईएफएस) तैयार करती है, वन शिक्षा निदेशालय, जिसके अधीन चार राज्य वन सेवा महाविद्यालय (राज्य स्तर के) हैं, भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून, भारतीय प्लाइवुड उद्योग अनुसंधान और प्रशिक्षण संस्थान, बंगलौर तथा वन और पर्यावरण मंत्रालय से संबद्ध जीबी पंत हिमालयन पर्यावरण और विकास संस्थान। स्नातकपूर्व कार्यक्रम स्तर पर वानिकी शिक्षा वर्तमान में वानिकी में स्नातकपूर्व, स्नातकोत्तर और डॉक्टरल कार्यक्रम विभिन्न राज्य कृषि विश्वविद्यालयों तथा कुछ अन्य परंपरागत विश्वविद्यालयों/संस्थानों में संचालित किए जाते हैं। 

ज्यादातर राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में चार वर्षीय व्यावसायिक डिग्री कार्यक्रम बीएससी वानिकी संचालित किए जा रहे हैं तथा शेष संस्थान भी यह कार्यक्रम बहुत जल्दी ही शुरू करने की योजना बना रहे हैं। वानिकी स्नातक तकनीकी रूप से योग्य, कुशल तथा पर्यावरण और जीवन की सुरक्षा से जुड़े वानिकी क्षेत्र की उभरती चुनौतियों तथा मुद्दों से निपटने के लिए तैयार होते हैं। वानिकी स्नातकों को तैयार करने का मूल उद्देश्य वानिकी क्षेत्र के विकास तथा इसकी उद्यमशीलता हेतु वर्तमान स्थितियों तथा अपेक्षाओं के अनुरूप मानव शक्ति तैयार करना तथा दूसरी तरफ वानिकी स्नातकों को पर्यावरण सुरक्षा, वानिकी उत्पादों के मूल्य संवर्द्धन और वानिकी किसानों को वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बनाने के वास्ते सुयोग्य प्रबंधक माना जाता है। बीएससी वानिकी के छात्रों को वानिकी के सभी क्षेत्रों से संबंधित विभागवार पाठ्यक्रमों का अध्ययन कराया जाता है तथा वे सही अर्थों में वनपाल बनकर उभरते हैं। 

शोध उपाधि कार्यक्रम 
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चार राज्य कृषि विश्वविद्यालयों दो डीम्ड विश्वविद्यालयों तथा तीन परंपरागत विश्वविद्यालयों द्वारा वानिकी/कृषि वानिकी में पी.एचडी. के रूप में न्यूनतम तीन वर्षीय डॉक्टरल कार्यक्रम भी संचालित किए जाते हैं। पी.एचडी. स्तर पर किया जाने वाला शोध कार्य वानिकी और संबद्ध क्षेत्रों के विशेषीकृत विषयों के बारे में होता है। राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में वानिकी कार्यक्रमों में प्रवेश/चयन प्रक्रिया : बी.एससी. वानिकी (चार वर्षीय डिग्री) में प्रवेश/चयन प्रक्रिया के लिए पीसीबी/पीसीएम/पीसीएमबी/कृषि समूह के छात्र १०(+)२ के बाद आवेदन कर सकते हैं। इसमें प्रवेश विश्वविद्यालय/संस्थान द्वारा आयोजित प्रवेश-परीक्षा के आधार पर प्रदान किया जाता है। कुछ विश्वविद्यालयों में प्रवेश उम्मीदवारों की मैरिट तथा सीटों की उपलब्धता के आधार पर प्रदान किया जाता है। 

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले राज्य के बाहरी उम्मीदवारों के लिए विशेष कोटे की व्यवस्था होती है। यह परीक्षा वानिकी में बैचलर डिग्री तथा अन्य कृषि विज्ञानों में बैचलर डिग्री हेतु राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में कुल सीटों की संख्या का 15% भरने के लिए आयोजित की जाती है। बी.एससी. वानिकी पूरी करने के उपरांत उम्मीदवार वानिकी में मास्टर डिग्री संचालित करने वाले राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य संस्थानों/विश्वविद्यालयों में एम. एससी. वानिकी/कृषि-वानिकी के लिए आवेदन कर सकते हैं। 

मास्टर डिग्री में चयन या तो प्रवेश-परीक्षा में सफल होने पर अथवा विश्वविद्यालय/संस्थान की मैरिट के आधार पर होता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वानिकी सहित कृषि एवं संबद्ध विज्ञानों के क्षेत्र में आईसीएआर की कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति (जेआरएफ) तथा सभी राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में मास्टर डिग्री कार्यक्रमों की 25% सीटों में प्रवेश हेतु एक अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया जाता है। इसी प्रकार पी.एचडी. वानिकी कार्यक्रम में राज्य कृषि विश्वविद्यालयों या अन्य विश्वविद्यालयों/संस्थानों में प्रवेश सीधे संस्थान/ विश्वविद्यालयों के नियमों के अनुरूप या प्रवेश-परीक्षा उत्तीर्ण करने के आधार पर प्राप्त किया जा सकता है। वानिकी में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) भी लेक्चररशिप के लिए एक महत्वपूर्ण प्रमाण-पत्र है जिसे कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड, भा.कृ.अ.प., पूसा, नई दिल्ली द्वारा हर वर्ष आयोजित परीक्षा के जरिए उत्तीर्ण किया जा सकता है।

छात्रवृत्तियां 
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वानिकी में स्नातक तथा स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति भी उपलब्ध है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा वानिकी सहित कई कृषि विषयों में आयोजित अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त करने वाले उम्मीदवारों को भा.कृ.अप./रु. 1200 प्रति माह की दर से स्नातकपूर्व पाठ्यक्रम के अध्ययन हेतु राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति प्रदान करती है, बशर्ते कि उम्मीदवार ने अपने गृह राज्य के बाहर किसी संस्थान में प्रवेश लिया हो। स्नातकोत्तर स्तर पर संबंधित संबंधित राज्य सरकारें तथा भा.कृ.अ.प. कई तरह की छात्रवृत्तियां प्रदान करती है। भा.कृ.अप.वानिकी सहित कृषि विज्ञानों के क्षेत्र में कनिष्ठ अनुसंधान अध्येतावृत्ति (जेआरएफ) प्रदान करने के लिए अखिल भारतीय प्रवेश परीक्षा का आयोजन करती है। वर्तमान में भा.कृ.अ.प. अध्येतावृत्ति एमएससी छात्रों के लिए दो वर्ष की अवधि हेतु / रु. 5760 प्रतिमाह है तथा 6000 रु. वार्षिक आकस्मिक खर्च अनुदान के रूप में प्रदान किए जाते हैं। इसी प्रकार पी.एचडी छात्रों के लिए अध्येतावृत्ति वर्तमान में / रु. 7000 प्रतिमाह, तीन वर्ष की अवधि के लिए है तथा साथ में 10000 रु. वार्षिक आकस्मिक खर्च अनुदान के रूप में दिए जाते हैं। इसके अलावा वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा भी पादप विज्ञानों में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट छात्रों को छात्रवृत्तियां प्रदान की जाती हैं।

कुछ ख़ास बातें 
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बायोमास गैसिफिकेशन में 2025 तक भारत में लाख 9 लाख जॉब्स होंगे।आईटी के बाद भारत में नया रिवॉल्यूशन ग्रीन जॉब्स लाएगा।व्हाइट हाउस काउंसिल ऑन एन्वॉयरन्मेंटल क्वालिटी (सीईक्यू) में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ग्रीन जॉब्स, एंटरप्राइज और इनोवेशन के लिए वेन जॉन्स को स्पेशल एडवाइजर नियुक्त किया।

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प्राध्यापक, शासकीय दिग्विजय पीजी 
ऑटोनॉमस कालेज, राजनांदगांव 
मो.9301054300

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