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वेद भी पढ़ाए और स्वतंत्रता सेनानी भी बने आचार्य रामनाथ वेदालंकार

उत्तर प्रदेश के बरेली जिला की तहसील फरीदपुर के निवासी महाशय गोपाल राम ने देश के स्वाधीनता संग्राम में अपना अतुलनीय योगदान दिया था| इनकी पत्नी श्रीमती भाववन्ति देवी थी| इनके यहाँ दिनांक ७ जुलाई सन् १९१४ इस्वी को जिस सुपुत्र ने जन्म लिया इसे ही आगे चल कर आचार्य रामनाथ वेदालंकार के नाम से जाना गया| जन्म के समय कोई नहीं जानता था कि यह बालक कभी वेदों का अद्वितीय विद्वान् बनेगा और वेद भाष्य का कार्य भी करेगा|

पिता म.गोपालराम जी अपने इस सुपुत्र को निरंतर आगे बढ़ता हुआ देखना चाहते थे| पिताजी की इस आकांक्षा के कारण इस बालक ने पहले तो काशी से तथा फिर गुरुकुल कांगड़ी से शिक्षा प्राप्त करते हुए स्नातक की उपाधि प्राप्त की| अब यह बालक युवा होकर उच्चकोटि का विचारक बन चुका था| इस कारण सन् १९३३ ईस्वी में इसी गुरुकुल काँगडी में ही अध्यापक के रूप में नियुक्त हुए| कुछ ही समय में शोधकर्ता भी बन गये| फिर यह वैदिक साहित्य के उपाध्याय बने और फिर इसी गुरुकुल कांगड़ी में ही लम्बी सेवा के पश्चात् संस्कृत विभाग के अध्यक्ष के पद पर आसीन हुए| कुछ ही समय में आपने आगरा से एम.ए, करने के अनंतर “ वेदों की वर्णन शैलियां” विषय पर पी. एच. डी. की उपाधि भी प्राप्त कर ली | इस के पश्चात् आप इसी गुरुकुल के रजिस्ट्रार, आचार्य, कुलपति आदि पदों पर आसीन हो गुरुकुल कांगड़ी की शोभा बढाने का कारण बने| निरंतर ३८ वर्ष तक विभिन्न शास्त्रों का अध्यापन करवाते हुए आप सेवा से निवृत हुए|

सन् १९७६ ईस्वी में गुरुकुल कांगड़ी की सेवा से मुक्त होकर पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ की महर्षि दयानंद अनुसंधान पीठ में प्रथम प्रोफैसर व अध्यक्ष के पद पर आसीन हुए| इस पद पर रहते हुए आपने अनेक शोधार्थियों का दिशा निर्देशन किया| इसी काल में आपने तीन शोध ग्रन्थ भी लिखे| आपके “ वैदिक ग्रन्थ विचार” नामक ग्रन्थ का प्रकाशन भी पंजाब विश्वविद्यालय ने ही किया| आपका सामवेद भाष्यम् दो जिल्दों में समर्पण शोध संस्थान से प्रकाशित हुआ| इस उत्तम भाष्य के कारण आपकी गणना प्राचीन वेद भाष्यकारों में होने लगी|

वैदिक वीर गर्जना आपकी एक अन्य अपूर्व कृति है| “ वेदों की वर्णन शैलियाँ” अपने आप में एक विशिष्ट कृति है| आपकी एक अन्य कृति “ यज्ञ मीमांसा” में न केवल वैदिक यज्ञ की विषद् व्याख्या ही की है अपितु इसके चिकित्स्कीय उपयोगों को भी विस्तार से बताया गया है| प्रत्येक व्यक्ति को वेदानुरागी बनाने तथा वेद पढ़ने का आदी बनाने के लिए “वेद मंजरी” नामक पुस्तक भी आपने लिखी| इसमें आपने यह सन्देश दिया है कि प्रत्येक व्यक्ति को नियम पूर्वक कम से कम एक वेद मन्त्र को प्रतिदिन भरपूर व्याख्या के साथ पढ़कर अपने जीवन में उतरना चाहिए| इसीलिए इस पुस्तक में चारों वेदों के चुने हुए ३६५ मन्त्र व्याख्या सहित दिए हैं|

पंडित जी की एक अन्य पुस्तक “वैदिक नारी” में नारी का अत्यधिक सटीक चित्रण किया है तो एक अन्य पुस्तक “वैदक मधु वृष्टि” में लघु निबंधों का संकलन कर विभिन्न विषयों पर प्रकाश डाला गया है| “आर्ष ज्योति” में भी निबंध दिए गए हैं तो “ऋग्वेद ज्योति” में ऋग्वेद के २०० मन्त्रों का विस्तार पूर्वक वर्णन किया गया है| आपकी एक अन्य पुस्तक “उपनिषद् दीपिका” के माध्यम से उपनिषदों का उपदेश इतनी सरल भाषा में कर दिया है कि सर्व साधारण व्यक्ति भी बड़े ही सुन्दर ढंग से उपनिषदों की कथा कर सकता है|

इस के अतिरिक्त महर्षि दयानंद जी के शिक्षा, राजनीति और कला कौशल सम्बन्धी विचारों को भी आपने पुस्तक बद्ध कर दिया| आचार्य जी की महान् विद्वत्ता पूर्ण उनकी सब कृतियों का जहाँ जन जन ने भरपूर लाभ उठाया है, वहां इन सब की उपयोगिता को देखते हुए आपको अनेक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया| साधारण पुरस्कार तो मिलते ही रहते हैं किन्तु आप के ग्रन्थों की भरपूर उपयोगिता को देखते हुए भारत के राष्ट्रपति महोदय ने भी आपको संस्कृत के उच्चकोटि के विद्वान् होने के फलस्वरूप पुरस्कार से सम्मानित किया| गुरुकुल कांगड़ी ने भी आपको “विद्या मार्तंड” की मानद उपाधि से सुशोभित किया|

आज आप हमारे मध्य नहीं है| आपके देहांत से आपके उत्तम लेखन के समकक्ष साहित्य की और पुस्तके हमें नहीं मिल पा रहीं किन्तु जो कुछ आपकी कलम से निकला और जो कुछ आपकी पुस्तकों में प्रकाशित हो गया, वह सब ही इतना है कि युगों युगों तक हमारा मार्ग दर्शन करता रहेगा|

डॉ.अशोक आर्य
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