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इतिहास और प्राचीन सभ्यता का आइनाआहड़ संग्रहालय

उदयपुर का आहड़ संग्रहालय इतिहास,सभ्यता और पुरातत्व के साथ अब एक आकर्षक संग्रहालय बन गया है। जीर्णोद्धार के बाद आधुनिक शो केशों में सामग्री को आकर्षक रूप से प्रदर्शित किया गया है। अस्त्र – शस्त्र,पेंटिंग आदि नई सामग्री का समावेश किया गया हैं। पहले से ज्यादा पर्यटक अब यहां आने लगे हैं। आग्नतुकों को दो लघु डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी दिखाने की व्यवस्था भी की गई है।

उदयपुर के गणेशपुरा में आहड़ नामक प्राचीननगर के खण्डर हैं जहां ईसा से लगभग दो हजार वर्ष पहले से लेकर ईसा के एक हजार साल बाद तक के अवशेष प्राप्त हुए हैं। माना जाता है यहां एक समृद्धशाली नगर था जो कालान्तर में ध्वस्त हो गया। यहां एक प्राचीन कुण्ड बना है जिसमें वर्ष भर श्रद्धालु स्नान करते हैं। कुण्ड के दक्षिण में शिवालय के सामने दूसरा कुण्ड व तिबारियां बनी हैं।

यहां के खण्डहरों में धूलकोट नामक ऊंचा टीला है जहां खुदाई करने पर बड़ी-बड़ी ईटें, मूर्तियां व प्राचीन सिक्के मिले हैं। यहां से खुदाई में चमकदार लालरंग के चिकने पात्र भी प्राप्त हुए हैं। ये पात्र काले, चकतेदार, सलेटी व भूरे रंगों के भी पाये गये हैं। सभी में किसी न किसी प्रकार का अलंकरण देखने को मिलता हैं कुछ पात्र अत्यन्त मजबूती लिये हुए हैं। मृदपात्रों में छोटे प्याले, कम गहरी थालियां तथा छोटे-ऊंचे-संकरे गर्दन के छोटे गोलपात्र मिले हैं। रसोई घर के काम में आने वाले कई पात्र मिले हैं। यहां से कई प्रकार के पाषाण उपकरण जिनका उपयोग चाकू अथवा अन्य प्रकार हथियारों के रूप में किया जाता था प्राप्त हुए हैं। मिट्टी के बने हुए बच्चों के खिलोने व पशु आकृति के पाये गये हैं। आहड़ से ठप्पे , बैलो की मृण मुर्तिया,मिटटी तथा अर्ध कीमती पत्थरो के मनके ताम्बे की वस्तुए कुल्हाड़ी ,तीर ,चाक़ू ,चुडिया ,छेनी आदि प्र्राप्त हुई है तथा लघु अस्त्र ,सिलबट्टे ,हेमर स्टोन आदि भी प्राप्त हुवे है बैलो की मृण मुर्तिया दो प्रकार की कूबड़ वाली और बिना कूबड़ वाली प्राप्त हुई है इसके अलावा चार मानव मृण मूर्तिया भी प्राप्त हुई है। जिनसे आहड संस्कृति के वस्त्र के बोध तथा मनको आभूषणों को यहां दर्शाया गया है।

धूलकोट के टीले पर भवनों के अवशेष भी पाये गये हैं। यहां मुख्य उद्योग ताम्बा गलाना और उसके उपकरण बनाना रहा होगा, इस बात का पता यहां से मिले ताम्बे की कुल्हाड़ियों एवं अस्त्रों से चलता है। एक घर में ताम्बा गलाने की भट्टी भी मिली है। इसी कारण इस बस्ती को ताम्बावती के नाम से भी पुकारा गया। यहाँ स्थित संग्रहालय में खुदाई में प्राप्त वस्तुओं का प्रदर्शन दर्शनीय है।

पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग द्वारा संग्रहालय परिसर में स्थित धुलकोट के प्राचीन मिटटी के टीलों में उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों को आमजन के लिए प्रदर्शित किये जाने के उद्देश्य से आहड़ संग्रहालय स्थापित किया गया है| धुलकोट के इन प्राचीन टीलों पर सबसे पहले कर्नल जेम्स टॉड की नजर पड़ी थी और उन्होंने अपनी पुस्तक एनाल्स एंड एंटीक्विटिज आफ राजस्थान में इसका वर्णनं भी किया है। कर्नल जेम्स टाड के बाद पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के पुरातत्विद डा. अक्षय कीर्ति व्यास ने सर्वप्रथम 1950 में लघु स्तर पर इन टीलों का उत्खनन किया था।इसके बाद में सन 1952 -53 तथा 1954 -55 में डा. आर सी अग्रवाल द्वारा यंहा उत्खनन करवाया गया उसके उपरान्त पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग और दक्कन यूनिवर्सिटी पूना के संयुक्त तत्वावधान 1960 -61 में डा हंसमुख धीरजलाल सांकलिया ने यहाँ उत्खनन कार्य किया। इनसे यंहा पर अनेक बार बस्ती बसने और उजड़ने के संकेत प्राप्त होते हैं। डा. सांकलिया ने इसे यहाँ से प्राप्त विशिष्ट प्रकार के काले और लाल मृदभांड के कारण आहड़ संस्कृति का नाम दिया|

यहाँ दो प्रमुख दो संस्कृतियों ताम्र पाषाण कालीन संस्कृति तथा ऐतिहासिक कालीन संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं।| निम्न स्तरीय अवशेष आहड़ संस्कृति से सम्बंधित हैं तथा ऊपरी स्तर बाद के है।डॉ. श्री कृष्ण अनुसार अब तक यह पांच स्तरों का उत्खनन किया जा चूका है और लगभग इतने ही और प्राप्त होने की आशा है।

आहाड़ बालाथल और गिलूण्ड में आयताकार मकानों के अवशेष प्राप्त हुवे है। खुदाई में 30 गुणा 15 फ़ीट तथा 9 गुणा 9 फ़ीट वाले तथा एक 45 फ़ीट के आवास के अवशेष प्राप्त हुवे है| डा जुगनू जी के अनुसार आहड़ संस्कृति के निवासियों ने वही से प्राप्त पत्थर और मिटटी की कच्ची ईटो से आवास की दीवारों का निर्माण किया तथा बांस चटाइयों और घांस फुंस तथा मिटटी के लेप से हलकी फुलकी छटे बनाई तथा छटे भी मध्य भाग में ऊपर तथा दोनों तरफ ढलुआ रखी जाती थी ताकि वर्षा का जल आसानी से निकल जाए तथा इस प्रकार छत को मध्य से ऊपर रखने के लिए घर के मध्य में लकड़ी के खम्बे खड़े किये जाते थे आहड के मकानों के अवशेष के फर्श के मध्य इस प्रकार के काष्ट स्तम्भों के गाड़े जाने हेतु खड्डो के प्रमाण प्राप्त होते है। उक्त आवाज़ से चूल्हो के तथा अनाज पीसने वाले सिलबट्टों के अवशेष भी प्राप्त हुवे है। आहड के ऐतिहासिक काल के आवासों में घरो में गंदे निकासी हेतु मिटटी के वाले वलय युक्त खड़े बनाने की परम्परा भी प्रारम्भ हो गई थी जो अपने आप में अद्भुत है। संग्रहालय अवकाश के दिनों को छोड़ कर प्रातः 10 बजे से सायं 5 बजे तक दर्शकों के लिए खुला रहता है।

(लेखक राजस्थान जन संपर्क विभाग के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं व विभिन्न समसामयिक विषयों पर लिखते हैं)

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