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अविकल, अभिराम मालिनी

देश प्रेम की इस महफ़िल के दर्शकों में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल , मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ भी थे। तमाम और सारे नामचीन लोग। और अविकल , अभिराम मालिनी थीं। मालिनी अवस्थी। आज़ादी के गीत गाती हुई , मीरा की तरह नाचती हुई। बहुत समय बाद आज की शाम इतनी मधुर , इतनी संगीतमय , इतनी सघन , इतनी गरिमामयी , इतनी भावुक और इतनी समृद्ध हुई। यह आज़ादी के अमृत महोत्सव पर सोनचिरैया द्वारा मुक्तिगाथा की शाम थी। मुक्तिगाथा की प्रस्तुति में मालिनी अवस्थी ने आज कलेजा काढ़ लिया। मालिनी अवस्थी निःसंदेह अब बहुत बड़ी स्टेज परफार्मर हो चली हैं। हेमा मालिनी और इला अरुण को पीछे छोड़ती हुई। मालिनी का आज का स्टेज परफॉर्मेंस अविरल , अलहदा , अदभुत और अनूठा था। मालिनी अवस्थी को मैं चार दशक से भी अधिक समय से सुनता और देखता आ रहा हूं। मालिनी की गायकी की किसिम-किसिम के रंग से रुबरु और वाकिफ़ हूं। मुतासिर भी। ग़ज़ल गायकी , शास्त्रीय गायन , लोक गायन जैसे कई पड़ाव हैं मालिनी के। स्टेज शो , टी वी शो भी उन की पहचान और शोहरत में शुमार हैं। बेतरह।

संगीत साधना है। तपस्या है। आत्मा भी। मालिनी ने आज इसी आत्मा को देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम को संगीतात्मक कथा में निरुपित कर लखनऊ में संगीत नाटक अकादमी के संत गाडगे प्रेक्षागृह में सदानीरा नदियों की अजस्र धारा को जैसे प्रवाहित कर दिया। मंगल पांडेय की क्रांति कथा से ब्रिटिश राज के अत्याचारों की कथा को गायन , नृत्य , अभिनय , वाचन और चित्रों के कोलाज में जिस तरह शुरु किया वह अनिर्वचनीय था। अविकल था। आल्हा गाते आज मालिनी को सुनना जैसे किसी हरहराती नदी के वेग को सुनना था। क्रांतिकारियों की वीरता को आल्हा में ही सही स्वर दिया जा सकता था। मालिनी ने यही किया। सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, / खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

रानी लक्ष्मी बाई की वीरगाथा गाते हुए मालिनी चौरीचौरा , काकोरी , नेता जी सुभाष चंद्र बोस , भगत सिंह , बिस्मिल , आज़ाद आदि अनेक क्रांतिकारियों की वीरगाथा में पगा आल्हा गाते हुए अचानक भोजपुरी गीतों पर आ गईं। भोजपुरी गाते-गाते ग़ज़ल पर आ गईं। आज़ादी की लड़ाई के समय तमाम प्रतिबंधित लोकगीतों , गीतों को मालिनी ने फिर से स्वर दे दिया। हम नहीं जानते थे कि अंगरेजों ने चैती , कजरी , ठुमरी बिरहा आदि को भी कभी प्रतिबंधित कर दिया था। पर मालिनी ने आज यह बताते हुए ऐसे कई सारे प्रतिबंधित गीत गाए। प्रार्थना , ग़ज़ल और बंदिश भी मालिनी की आज की गायकी के गमक के अंग थे। खटका , मुरकी कब आए और कब गए , यह जोहने और सोचने का अवकाश भी कहां था किसी के पास। था तो एक जादू था। सिर चढ़ कर बोलता जादू। गायकी में ठहर कर , आज़ादी की सांस का जादू।

कोई घंटे भर की इस मुक्तिगाथा में कब 15 अगस्त और वंदे मातरम आ गया। कथा में कब विराम आ गया , पता ही नहीं चला। स्वतंत्रता संग्राम के इतने बड़े कालखंड को एक घंटे से कुछ कम समय में संगीत और नृत्य में बांध कर पेश करना बहुत कठिन और श्रमसाध्य था। खचाखच भरे हाल में अजब जोश था। लोग एकटक , अभिराम देख रहे थे। सुन रहे थे। लोग थे , वीरों की गाथा थी , मालिनी की गायकी थी और रह-रह तालियों की गड़गड़ाहट थी। दर्शकों में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल , मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ भी थे। तमाम और सारे नामचीन लोग। और अविकल , अभिराम मालिनी थीं। मालिनी अवस्थी। आज़ादी के गीत गाती हुई , मीरा की तरह नाचती हुई। मंत्रमुग्ध करती हुई।

मुक्तिगाथा की गायकी और इस के संगीत , नृत्य की जितनी तारीफ़ की जाए , कम है। नृत्य संयोजन लेकिन अप्रतिम था। कई बार बिरजू महराज याद आ गए। मालिनी की इस मुक्तिगाथा का जादू इसी एक बात से समझ लीजिए कि राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने कहा कि इस मुक्तिगाथा को देश भर के स्कूलों , कॉलेजों में दिखाया जाना चाहिए। वह मुक्तिगाथा से इतनी प्रभावित थीं कि राजभवन की तरफ से दस लाख रुपए सोनचिरैया को दिए जाने का ऐलान कर दिया। मुख्य मंत्री योगी ने कहा कि सोनचिरैया मतलब सोने की चिड़िया। ऐसे कार्यक्रम से देश को फिर से सोने की चिड़िया बना सकते हैं। बातें और भी बहुतेरी हुईं। फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है। ठीक वैसे ही जैसे मुक्तिगाथा के सहयोगी कलाकारों की फ़ेहरिस्त बहुत लंबी है।

मुक्तिगाथा से अभिभूत मालिनी अवस्थी को मैं ने बधाई देते हुए कहा कि 2023 की आप पद्म भूषण हैं। यह सुन कर वह संकोच से भर गईं। मेरा दोनों हाथ पकड़ कर विनम्रता में शीश नवा दिया। यह मालिनी की विनम्रता है। लेकिन तय मानिए कि मैं ने कुछ भी ग़लत नहीं कहा है। मुक्तिगाथा मालिनी के संगीत का शिखर है। वह और भी शिखर ज़रुर छुएंगी। पर आज़ादी के इस अमृत महोत्सव में मुक्तिगाथा मालिनी का उत्कर्ष है। अभी तो मुक्तिगाथा को लखनऊ के लोगों ने देखा है। देश जब देखेगा , देखता ही रहेगा। थकेगा नहीं। मालिनी की मुक्तिगाथा से किसी को मुक्ति नहीं मिलने वाली। आज़ादी के इतिहास की ऐसी संगीतमय कथा दुर्लभ है। मुक्तिगाथा की लय और इस का लास्य दोनों ही इस कथा को अप्रतिम बनाते हैं। मालिनी को मानिनी ! अविकल , अभिराम मालिनी ! निर्मल गंगा सी बहती हुई। जानिए कि गंगा का एक नाम मालिनी भी है। निर्मल गंगा की तरह कल-कल बहती हुई गिरिजा देवी की यह शिष्या अभी बहुत आगे जाने वाली है। दिल थाम कर बैठिए।

(दयानंद पाण्डेय वरिष्ठ पत्रकार एवँ लेखक हैं, लखनऊ में रहते हैं और किस्सागोई की रोचक शैली में साहित्य, समाज और चर्चित व्यक्तित्वों पर अपने ब्लॉग https://sarokarnama.blogspot.com/2022/07/blog-post.html पर लिखते है, उनकी कई पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी है।

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