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हैदराबाद सत्याग्रह के बलिदानी चौ. मातुराम

हरियाणा प्रांत का एक जिला है हिसार| इस जिले की एक तहसील का नाम है हांसी| इस हांसी तहसील में एक गाँव आता है मलिकपुर| इस मलिकपुर गाँव में एक अत्यंत धनाढ्य जिमींदार रहते थे, जिनका नाम था चौ.गुगन सिंह जी| यह जाट घराने से थे| इन्हीं के यहाँ संवत् १९४६ विक्रमी को एक बालक ने जन्म लिया| यह बालक ही चौ.मातुराम के नाम से जाना गया| एक धनाढ्य जिमींदार और वह भी अंग्रेज के जमाने का,के यहाँ जन्म लेने वाला बालक कभी देश, धर्म अथवा जाति के काम आवेगा, यह उस समय कोई स्वप्न में भी सोच नहीं सकता था क्योंकि साधारणतया ऐसा माना जाता है कि क्रान्ति कि चिंगारी सदा गरीब की कुटिया से ही उठती है| धनवान् जिमींदार और वह भी शिवरान गौत्रीय जाट भला क्या क्रान्ति करेगा? किन्तु इस परिवार में जन्म लेने वाला इस बालक मातुराम के जीवन तथा बलिदान ने इस मिथक को गलत सिद्ध कर दिया| चौ. मातुराम जी ने अपने जीवन का बलिदान देकर यह तथ्य सब के सामने सिद्ध कर दिया कि बलिदानी मार्ग पर चलने वाले वीर के लिए धन, एश्वर्य कभी बाधा नहीं बन सकता| यही ही वह कारण था कि ६५० बीघे नहरी जमीन के मालिक तथा पांच पुत्रों और दो पुत्रियों के पिता होते हुए भी चौ. मातुराम जी ने हैदरबाद सत्याग्रह के बलिदानी मार्ग पर जब कदम रखे तो फिर निरन्तर आगे ही बढ़ते चले गए, फिर कभी पीछे नहीं देखा|

मातुराम जी अभी अल्पायु के ही थे, जब वह आर्य समाजी हो गए| आर्य समाजी भी इस प्रकार के हुए कि ऋषि दयानद जी के सिद्धांतों को अपने जीवन का भाग बना लिया| अत: अच्छे धनाढ्य जिमींदार होते हुए भी अछूतोद्धार की धुन सिर पर सवार हो गई| इस प्रकार इसी धुन को दिखाते हुए सन् १९२४ ईस्वी में इस सीधे सादे स्वभाव के किन्तु दृढ निश्चयी चौ, मातुराम जी ने अपने गाँव के अछूतों का उद्धार करते हुए उनका न केवल यज्ञोपवीत संस्कार ही करवाया अपितु उन्हें कुओं से पानी लेने सहित अन्य जितने भी मानवीय अधिकार होते हैं, वह सब उन्हें दिलवा दिए|

इन्हीं दिनों हैदराबाद निजाम के अत्याचार वहां की हिन्दू तथा आर्य जनता के ऊपर निरंतर बढ़ते जाने के कारण, बार बार इन अत्याचारों को रोकने के लिए होने वाली बातचीत की असफलता के कारण सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा ने हैदराबाद में देशव्यापी सत्याग्रह आन्दोलन का उद्घोष कर दिया| सत्याग्रह के लिए हुए इस उद्घोष को सुनकर आपका खून भी ख़ोलने लगा और आप भी सत्याग्रह के लिए रवाना हो गए| वहां जाकर सत्याग्रह किया और निजाम की जेल में अपना निवास बना लिया|

इन दिनों हैदराबाद रियासत के निजाम उस्मान अली थे| यह निजाम हिन्दुओं और विशेष रूप से आर्यों के रक्त का सदा ही प्यासा रहता था| इनको किसी प्रकार का मानवीय अधिकार देने को वह कभी भी तैयार नहीं होता था| यही कारण है कि जब आपको हिरासत में लिया गया तो आपको भी जेल में डालकर दारुण अर्थात् असहनीय कष्ट देने आरम्भ कर दिए| केवल भयंकर कष्ट देने पर ही निजामी जेल में बस नहीं करता था, इसके अतिरिक्त गंदा गला-सडा खाना और इस गंदे खाने में भी मिट्टी तथा कंकर- पत्थर मिले रहते थे| इस प्रकार का खाना यदि किसी सांड को भी दिया जावे तो वह भी बीमार होकर मर जावे, फिर यह सत्याग्रही तो मनुष्य थे| मुस्लिम निजाम और उसकी पुलिस के अत्याचारों तथा उनको दिए जाने वाले इस गंदे खाने के कारण नित्य ही जेलों में बंद सत्याग्रही बीमार होकर मर रहे थे| जो सत्याग्रही बीमार हो जाता, उसको तो और भी अधिक परेशान किया जाता| इस अवस्था से चौ. मातुराम जी भी किस प्रकार बच सकते थे, वह भी कुछ ही दिनों में रोगी हो गए|

बीमारी की अवस्था में चौ.मातुराम जी पर भी निजामी अत्याचार बढ़ गए, इस कारण उनका रोग भी दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा| आप नहीं चाहते थे कि रोग से छुटकारा पाने के लिए आप जेल से बाहर आवें | आप की इच्छा थी कि मृत्यु हो तो जेल में ही हो किन्तु निजाम इस बात से बेहद परेशान था कि जेल में दिए जा रहे कष्टों के कारण आर्यों की मृत्यु हो रही है और दुनियाँ के सामने उनके प्रश्नों का निजाम के पास उत्तर नहीं बन पा रहा था, उसकी पूरे देश में ही नहीं संसार भर में बदनामी हो रही थी| निजाम इस बदनामी से बचना भी चाहता था किन्तु आर्यों पर किये जा रहे अत्याचारों को रोकना भी नहीं चाहता था| इस कारण जब जेल कर्मचारियों को आप के बच पाने की कुछ भी आशा नहीं रही तो आपको जबरदस्ती उठा कर जेल के फाटक से बाहर फैंक दिया गया| जेल के फाटक के बाहर फैंके जाने के पश्चात् आप किसी प्रकार उठ कर मनमाड पहुंचे| मनमाड में ही २८ जुलाई सन् १९३९ ईस्वी को लगभग पचास वर्ष की आयु में आपका बलिदान हो गया| इस प्रकार आपकी जो अभिलाषा जेल में ही प्राण त्यागने की थी, वह पूर्ण न हो सकी, जाते जाते आपने धन वाले लोगों को यह दिखा दिया कि बलिदान के मार्ग पर चलने वाले किसी भी बलिदानी के लिए धन उसकी पगबाधा नहीं बन सकता| .

बलिदानी का बलिदान मृत्यु के रूप में नहीं अपितु दूसरों को जीवन देने वाला होता है| एक बलिदान से सैंकड़ों बलिदानी जन्म लेते हैं| बलिदान की यह धारा इस प्रकार अविरल रूप से चलती रहती है| बलिदान अन्यों के लिए प्रेरणा का एक प्रकार का स्रोत होता है| इसलिए बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता| इसी प्रकार ही चौ. मातुराम जी ने भी अपना बलिदान देकर स्वामी दयानंद सरस्वति जी की बलिदानी माला का स्वयं को एक मोती बना दिया| इस प्रकार संसार को बता दिया कि धनवान् चौधरी जाट लोग भी बलिदान के मार्ग को जानते हैं, बलिदानी मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं और धर्म रक्षा के लिए बलिदान ही एक मात्र साधन है| इस मार्ग को अपना भी सकते हैं| अन्य भी जो इस बलिदानी मार्ग पर आगे बढेगा, वह इस जगत् में सदा सदा के लिए अमर हो जावेगा| वह केवल अमर ही नहीं होगा अपितु अपने पीछे एक न टूटने वाली बलिदानी परम्परा की कड़ी भी छोड़ जावेगा, जिस कड़ी में आने वाली पीढियां अपना बलिदान देकर अपने सिरों को पिरोती चली जावेंगी| इस प्रकार बलिदानियों की यह माला विशाल ही नहीं होगी अपितु निरंतर बढ़ती ही चली जावेगी|

डॉ.अशोक आर्य
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