इंसान ने अपनी सहूलियत और संप्रभुता के लिए ज़मीन पर लकीरें खींच दीं, नक्शों पर सरहदें बना दीं और देशों को बांट दिया। लेकिन क्या प्रकृति भी इन राजनीतिक सरहदों को मानती है? हाल ही में हमारे पड़ोसी देश नेपाल में मची तबाही ने इस कड़वे दार्शनिक सच को एक बार फिर दुनिया के सामने ला खड़ा किया है कि जब प्रकृति कराहती है, तो उसके जख्म किसी एक देश की सीमा तक सीमित नहीं रहते। नेपाल में आई भीषण बाढ़ और भूस्खलन ने न केवल सैकड़ों जिंदगियां लीं, बल्कि पूरे एशिया और वैश्विक समुदाय के लिए एक ऐसा आईना रख दिया है, जिसमें हमें पूरी मानव जाति का धुंधला और डरावना भविष्य साफ नज़र आ रहा है। यह त्रासदी केवल नेपाल की नियति नहीं है, यह समूची दुनिया के लिए प्रकृति की आखिरी चेतावनी है।

विकास की अनिवार्यता और प्रकृति का प्रकोप: एक दार्शनिक द्वंद्व

आज के आधुनिक दौर में हम विकास से मुंह नहीं मोड़ सकते। बढ़ती आबादी, रोजगार की जरूरतें और सुदूर क्षेत्रों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण अनिवार्य है। बिजली के लिए बांध, परिवहन के लिए चौड़े रास्ते और रहने के लिए शहरों का विस्तार हमारी मजबूरी भी है और जरूरत भी। लेकिन दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो संकट तब खड़ा होता है जब विकास और प्रकृति के बीच का संतुलन टूट जाता है।दर्शन कहता है कि बदलाव संसार का नियम है, लेकिन जब यह बदलाव प्रकृति की सहनशक्ति से आगे निकल जाता है, तो वह 'प्रकोप' का रूप ले लेता है। यह प्रकृति की कोई सोची-समझी दुश्मनी नहीं है, बल्कि संतुलन बिगड़ने का एक स्वाभाविक वैज्ञानिक परिणाम है। 

पहाड़ों को जब हम उनकी क्षमता से अधिक छेड़ते हैं, तो भूस्खलन और मलबे के रूप में प्रकृति अपना संतुलन दोबारा हासिल करने की कोशिश करती है। चुनौती विकास को रोकने की नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने की है।बेकसूर इंसानों का दर्द और वैश्विक कड़वा सचइस पूरी त्रासदी का सबसे क्रूर पहलू यह है कि प्रकृति के इस भयानक प्रकोप का सबसे पहला और सीधा शिकार वे बेकसूर लोग बनते हैं, जिनका इस औद्योगिक और आधुनिक अंधी दौड़ में कोई सीधा दोष नहीं था। दर्शन कहता है कि इंसान मकान ईंट और पत्थरों से बनाता है, लेकिन एक 'घर' वह अपनी उम्र, अपनी मेहनत के पसीने और अपनी उम्मीदों के तिनकों से बुनता है। जब पहाड़ों से उतरा मलबे और पानी का सैलाब नेपाल की निचली बस्तियों को लील रहा था, तब वह सिर्फ कंक्रीट के ढांचे नहीं ढहा रहा था, बल्कि किसी जीवनभर की जमा-पूंजी, किसी की दैनिक दिनचर्या की छोटी-छोटी सुख-सुविधाएं और किसी के भविष्य के सपने बहाकर ले जा रहा था।इस त्रासदी ने ऐसे दिल दहला देने वाले मंज़र छोड़े हैं जो इंसानियत को झकझोर देते हैं। 

अपनी पूरी जिंदगी की कमाई से बनाई रसोई, बच्चों के खिलौने, और व यह बेकसूरों की आह है, जो यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे तथाकथित 'विकास' की कीमत इन मासूमों की जिंदगियों से चुकाई जाएगी?*दुनिया के लिए सबक: ग्लेशियरों का पिघलना और भविष्य का रोडमैप* 

इस गहरे दर्द और वैश्विक समस्या का व्यावहारिक समाधान खोजने के लिए विश्व स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए:

सस्टेनेबल इंजीनियरिंग और जोनिंग  संवेदनशील पहाड़ी और ग्लेशियर वाले क्षेत्रों में डायनामाइट ब्लास्टिंग जैसी भारी तकनीकों की जगह 'इको-फ्रेंडली' निर्माण पद्धतियों को अपनाना चाहिए।अंतिम छोर तक सटीक चेतावनी  आधुनिक सैटेलाइट और रडार प्रणाली के जरिए ग्लेशियरों की निगरानी होनी चाहिए। यदि कोई खतरा हो, तो इसकी जानकारी कुछ घंटे पहले सीधे निचली बस्तियों तक पहुंचनी चाहिए, ताकि कम से कम 'इंसानी जानों' को पूरी तरह बचाया जा सके।ग्लोबल क्लाइमेट कूटनीति: चूंकि पर्यावरण की कोई सरहद नहीं होती, इसलिए दुनिया के देशों को राजनीतिक सीमाओं से ऊपर उठकर पर्यावरण संरक्षण की साझा नीतियां बनानी होंगी I आइए, अंधाधुंध दोहन की जगह 'सीमित और सुरक्षित विकास' का संकल्प लें, क्योंकि जब प्रकृति और इंसान दोनों सुरक्षित होंगे, तभी हमारा भविष्य भी सुरक्षित होगा।

 श्रद्धा तिलवाड़ीया

 मोटिवेशनल ऑथर  

पचपहाड़ तहसील, भवानी मण्डी ब्लॉक, जिला झालावाड़ ,राजस्थान।