मुंबई आयोजनों और उत्सवों की नगरी है, ऐसे में यहाँ कई बार कुछ ऐसे आयोजन हो जाते हैं जो अपनी अमिट छाप छोड़ देते हैं। भरतनाट्यम की सिध्दहस्त युवा नृत्यांगना चार्वी धूत ने रवीन्द्र नाट्य मंदिर के मंच पर भरतनाट्यम् के अरंगेत्रम् (अरंगम) की जो प्रस्तुति दी वह प्रेक्षकों के लिए रंजक ही नहीं अपितु नृत्य की लय-भावभंगिमा, पदताल, अंगिक अभिनय और कला के प्रति उनके समर्पण का चरमोत्कर्ष था। किसी शास्त्रीय प्रस्तुति में दर्शक लगातार तीन घंटे तक बैठकर अगली प्रस्तुति की प्रतीक्षा करे, किसी कलाकार की साधना का इससे बड़ा सम्मान नहीं हो सकता।
अरंगेत्रम् एक पारंपरिक तमिल शब्द है—‘अरंगम’ अर्थात् मंच और ‘एत्रम’ अर्थात् उस पर आरोहण करना। अर्थात् ‘मंच पर पदार्पण’। किन्तु एक नर्तकी के लिए यह केवल प्रथम प्रस्तुति नहीं, बल्कि वर्षों की कठोर साधना, समर्पण और तपस्या का फल है। यह एक लंबी यात्रा है—स्वयं को निखारने की, धैर्य सीखने की, और हर दिन स्वयं को बेहतर बनाने की। अरंगेत्रम् केवल एक मंचीय प्रस्तुति नहीं, बल्कि साधना, अनुशासन और समर्पण की वर्षों लंबी यात्रा का सार्वजनिक उद्घोष होता है। चार्वी धूत की इस प्रस्तुति में प्रारंभ से अंत तक एक परिपक्वता और संतुलन स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि जानी मानी नृत्यांगना और अभिनेत्री सुधा चंद्रन ने कहा कि यह कहना गलत है कि बच्चों को अगर कोई कला सिखाई जाती है तो उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि जब बच्चा कोई कला चाहे नृत्य हो या अन्य कोई विधा, सीखता है तो उसकी सोचने समझने की, सीखने की क्षमता ज्यादा विकसित होती है और वह अपनी पढ़ाई में ज्यादा समर्पित होता है। उन्होंने कहा कि कला के माध्यम से व्यक्ति में नवरसों का सृजन होता है। उन्होंने कहा कि मात्र हाथ-पैर हिलाना ही नृत्य नहीं होता इसमें हर एक मुद्रा का अपना एक महत्व होता है। उन्होंने कहा कि कोई बच्चा कुछ सीखता है तो उसके पीछे उसके माता-पिता और परिवार वालों का भी पूरा समर्पण रहता है। इसके बगैर कोई एक अच्छा कलाकार नहीं बन सकता। माता-पिता और गुरू के बाद ही भगवान का आशीर्वाद मिलता है। इस अवसर पर उनकी गुरू प्रिया जी ने कहा कि चार्वी में सीखने का समर्पण ऐसा है कि उसने अपने आपको इस नृत्य को सीखने में झोंक दिया। उन्होंने बताया कि वे 30 साल से नृत्य सिखा रही है और उनकी कई शिष्याएँ आज देश और दुनिया में कई बड़े पदों पर हैं। उनके माता-पिता ने कहा कि चार्वी को निखारने से लेकर उसे नियमित नृत्य की कक्षा में ले जाने की जिम्मेदारी उसके दादा-दादी ने निभाई।
चार्वी धूत कक्षा 12 की एक होनहार छात्रा हैं, जो अपनी पढ़ाई में उत्कृष्ट प्रदर्शन के साथ-साथ नृत्य के प्रति अपने गहन प्रेम को भी निरंतर पोषित कर रही हैं। उन्होंने मात्र 7 वर्ष की आयु में गुरुग्राम में श्रीमती प्रिया वेंकटरामन जी के मार्गदर्शन में भरतनाट्यम् का प्रशिक्षण आरंभ किया। मुंबई आने के बाद भी उनका समर्पण अटूट रहा और उन्होंने सुश्री अनन्या गणेश जी के निर्देशन में अपनी उन्नत शिक्षा जारी रखी। नृत्य के अतिरिक्त भी चार्वी अनेक रचनात्मक गतिविधियों में गहरी रुचि रखती हैं।
चार्वी ने ने जिस आत्मविश्वास के साथ मंच पर प्रवेश किया, और इसी के साथ दर्शकों से जो तादात्मय व संवाद स्थापित किया वह जादू अंतिम प्रस्तुति तक बना रहा। नृत्य ही वह शास्त्रीय कला है जिसमें कलाकार और कला दोनों एकाकार हो जाते हैं जैसे ही नृत्य बंद होता है, कलाकार अलग हो जाता है। जबकि अन्य कलाओं में कलाकार और कला दोनों अलग ही होते हैं।
शास्त्रीय व तकनीक दृष्टि से चार्वी ने मंच पर अपनी उपस्थिति की सार्थकता प्रदर्शित करते हुए हर प्रस्तुति को रंजकता, भावप्रवणता और शास्त्रीय अनुशासन के साथ प्रस्तुत किया । अदवु, मुद्राएँ, अंग-संचालन और लय-नियंत्रण में स्पष्टता और शुद्धता उनकी साधना और समर्पण की अनुभूति करा रहे थे।
जतिस्वरम् और तिल्लाना में नृत्यांगना की गति, पद संचालन संतुलन, और तालबद्धता ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। वहीं शब्दम् और वर्णम् में भावाभिनय (अभिनय) की गहराई ने प्रस्तुति को आत्मीयता प्रदान की। नायिका के अंतर्मन की व्यथा, भक्ति और प्रेम को जिस सूक्ष्मता से अभिव्यक्त किया गया, वह इतनी कम आयु की नृत्यांगना के लिए कर पाना अपने आप में एक चुनौती थी जिसे चार्वी ने बहुत सहजता और परिपक्वता से प्रस्तुत किया। संगीत और नृत्य का समन्वय इस अरंगम की एक विशेष शक्ति रहा।
शास्त्रीय गायन और संगीत के साथ नृत्यांगना का तालमेल अत्यंत सुसंगत था, जिससे पूरी प्रस्तुति में एक प्रवाह बना रहा। गुरु के निर्देशन की छाप हर प्रस्तुति में स्पष्ट झलकती रही—चाहे वह संरचना की शुद्धता हो या भावों की अभिव्यक्ति।
अरंगम की यह प्रस्तुति केवल एक सफल प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक उदीयमान कलाकार के उज्ज्वल भविष्य का संकेत है। नृत्यांगना ने यह सिद्ध किया कि वह केवल तकनीकी रूप से दक्ष ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और आध्यात्मिक स्तर पर भी इस कला से गहराई से जुड़ी हुई हैं। यदि यही समर्पण और साधना आगे भी बनी रही, तो निश्चित ही वे भरतनाट्यम् की दुनिया में एक विशिष्ट स्थान प्राप्त करेंगी।
कुल मिलाकर यह अरंगम एक सुंदर, संतुलित और प्रभावशाली प्रस्तुति रही—जो कला, साधना और सौंदर्य का उत्कृष्ट संगम थी, इसका सम्मोहन दर्शकों पर बरसों तक बना रहेगा।
कुप्पुस्वामी जी (गायन), श्री सतीश कृष्णमूर्ति जी (मृदंगम), श्री जी. राघवेंद्र प्रसाद जी (वायलिन) ने जिस तरह से रस वर्षा की वह संगीत और गायन के सौंदर्य का जादुई संगम था।
इस पूरे आयोजन को सफलता की ऊंचाई तक पहुँचाने में श्री पंकज बागरेचा और उनकी पूरी टीम का योगदान भी कम महत्वपूर्ण नहीं था। ध्वनि व्यवस्था और प्रकाश संयोजन की अद्भुत संकल्पना के बिना इस प्रस्तुति में वो सौंदर्य नहीं झलकता जिसका रसास्वादन दर्शकों ने पूरे तीन घंटे तक किया।
चार्वी अपनी प्रस्तुति का आरंभ पुष्पांजलि से किया। इसके पश्चात् अपनी मुद्राओं और अंग-संचालन के माध्यम से विघ्नहर्ता भगवान गणेश का स्वरूप प्रदर्शित कर प्रेक्षकों और मंच को एक तादात्म्य प्रदान किया इसके बाद चार्वी ने जतिस्वरम् की प्र्सतुति दी। यह भरतनाट्यम् का एक अत्यंत महत्वपूर्ण शुद्ध नृत्य है,जिसमें कोई कथा या भावाभिनय नहीं होता, केवल तकनीकी कौशल का प्रदर्शन होता है। जतिस्वरम् कल्याणी राग में तथा रूपक ताल में प्रस्तुत किया गया। शुध्द शास्त्रीय गायन और मृदंगम व वायलिन के संगीत का जादू एक अभिनव छाफ छोड़ गया।
अगली प्रस्तुति थी रागमालिका में एवं मिश्र चापु ताल में भावपूर्ण शब्दम्, की। यह भगवान कृष्ण की मोहक बालसुलभ लीलाओं का प्रदर्शन किया। इस प्रस्तुति में वायलिन की बजाय यदि बाँसुरी का स्वर घोला जाता तो यह प्रस्तुति ज्यादा सार्थक बन सकती थी। कृष्ण के चरित्र में बगैर बाँसुरी के उनकी लीलाओं के साथ न्याय नहीं किया जा सकता।
चार्वी की अगली प्रस्तुति थी वर्णम्—जो किसी भी नर्तकी के कौशल, धैर्य और भावनात्मक परिपक्वता की परीक्षा होती है। चार्वी ने “रूपमु जूची” तोड़ी राग एवं आदि ताल में वर्णम का प्रदर्शन किया इसमें नायिका भगवान शिव से अपनी व्यथा व्यक्त करती है और उनके स्नेह की याचना करती है। कहना ना होगा कि मृदंगम की ताल और शास्त्रीय गायन की शुध्दता ये प्रस्तुति उपस्थित प्रेक्षकों के लिए एक अलौकिक अनुभव लेकर आई।
अगली प्रस्तुति थी “शंकरा श्री गिरि” जो भगवान शिव के नटराज रूप की स्तुति है। इसके बाद “पाहिमाम श्री” की प्रस्तुति से देवी राजराजेश्वरी की वंदना प्रस्तुत कर चार्वी ने एक बार फिर अपनी श्रेष्ठता सिध्द की।

कार्यक्रम का समापन तिल्लाना एवं मंगलम् से हुआ । यह एक तरह से पूरे कार्यक्रम का उत्सवपूर्ण समापन था । तिल्लाना केबाद मंगलम् प्रस्तुत किया गया जिसमें नर्तकी समस्त देवताओं, गुरु, माता-पिता एवं दर्शकों को कृतज्ञता ज्ञापित करती है। इस प्रस्तुति में चार्वी ने अपने विनम्र अहोभावों के साथ गुरु और प्रस्तुति में सहायक गायक, वादक आदि को नमन कर प्रेक्षकों को भावविभोर कर दिया
भरतनाट्यम- अरंगेत्रम के बारे में
भरतनाट्यम् का इतिहास अत्यंत प्राचीन है, जिसकी जड़ें लगभग 2000 वर्ष या उससे भी अधिक पुरानी मानी जाती हैं। इसका आधार ग्रंथ नाट्यशास्त्र है, जिसे महर्षि भरत मुनि ने रचा। इस ग्रंथ में नृत्य, संगीत और नाट्य की विस्तृत विधियाँ वर्णित हैं।
प्राचीन काल में भरतनाट्यम् को “सदिर” कहा जाता था और यह दक्षिण भारत के मंदिरों—विशेषकर तमिलनाडु के मंदिरों—में देवदासी परंपरा के अंतर्गत प्रस्तुत किया जाता था। यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ईश्वर की आराधना और भक्ति का माध्यम था। नर्तकियाँ मंदिरों में भगवान के समक्ष नृत्य करती थीं, विशेषकर नटराज (भगवान शिव) की उपासना में।
मुगल काल और फिर ब्रिटिश शासन के दौरान देवदासी प्रथा को सामाजिक दृष्टि से आलोचना का सामना करना पड़ा, जिससे यह नृत्य कला भी धीरे-धीरे पतन की ओर चली गई। 19वीं सदी के अंत तक भरतनाट्यम् लगभग लुप्तप्राय हो गया था।
लेकिन 20वीं सदी के प्रारंभ में इस कला का पुनर्जागरण हुआ। इसमें प्रमुख योगदान रहा रुक्मिणी देवी अरुंडेल और बालासरस्वती जैसे महान कलाकारों का।
रुक्मिणी देवी ने इसे एक शास्त्रीय मंचीय कला के रूप में प्रतिष्ठित किया और चेन्नई में कलाक्षेत्र संस्थान की स्थापना की। इस प्रकार भरतनाट्यम् मंदिरों से निकलकर वैश्विक मंचों तक पहुँचा। यह परंपरा प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़ी हुई है। जब कोई शिष्या वर्षों (आमतौर पर 6 से 10 वर्ष) की कठोर साधना के बाद नृत्य की बुनियादी और उन्नत तकनीकों में दक्ष हो जाती है, तब उसके गुरु उसे सार्वजनिक प्रस्तुति देने की अनुमति देते हैं। यही अरंगेत्रम् होता है।





