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स्वराज्य के प्रतीक हैं छत्रपति शिवाजी के किले : संदीप माहिंद ‘गुरुजी’

सूर्या फाउंडेशन के तत्वावधान में स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के अंतर्गत आयोजित ‘श्री शिवछत्रपति दुर्ग दर्शन यात्रा’ पूर्ण, गौरवशाली इतिहास को अपने हृदय में संजोकर लौटे 13 राज्यों के 70 युवा

नईदिल्ली। छत्रपति शिवाजी महाराज के किले केवल पर्यटन के स्थल नहीं हैं। ये पवित्र तीर्थ हैं। भारत की स्वाधीनता के लिए हुए संघर्ष एवं बलिदान की गौरव गाथाओं को यहाँ आकर अनुभूत किया जा सकता है। ये किले सही मायनों में स्वराज्य के प्रतीक हैं। श्री शिवछत्रपति दुर्ग दर्शन यात्रा के समन्वयक श्री संदीप माहिंद ‘गुरुजी’ ने ये विचार देश के विभिन्न 13 राज्यों के 70 युवाओं के साथ साझा किए। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के तारतम्य में यात्रा का आयोजन सूर्या फाउंडेशन की ओर से किया गया। इस यात्रा में शामिल युवाओं ने न केवल शिवाजी महाराज के किलों और बलिदानी योद्धाओं की समाधियों का दर्शन किया बल्कि उनके गौरवशाली इतिहास की जानकारी भी प्राप्त की। इसके साथ ही युवाओं ने स्थानीय समाज और उसकी परंपराओं को जानने-समझने का प्रयास भी यात्रा के दौरान किया।

यात्रा के समन्वयक श्री संदीप माहिंद ‘गुरुजी’ ने कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज दूरदृष्टा एवं कुशल रणनीतिज्ञ थे। उन्होंने भौगोलिक क्षेत्रों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर तीन प्रकार के किलों का निर्माण किया- थल दुर्ग, गिरि दुर्ग एवं जल दुर्ग। शिवाजी महाराज ने सह्याद्री पर्वत शृंखलों के मध्य स्थित एक बहुत ऊंची एवं विशाल पर्वतरांग पर रायगढ़ का किला बनाया। यह किला हिन्दवी साम्राज्य की विशेष पहचान है। इसे दुर्ग दुर्गेश्वर भी कहते हैं। सन् 1674 में इसी किले को शिवाजी ने अपनी राजधानी बनाया। यहीं शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भी हुआ। जब तक शिवाजी महाराज जीवित रहे, इस किले को जीता नहीं जा सका। बाद में अंग्रेजों ने इस दुर्ग को बुरी तरह नष्ट किया। श्री गुरुजी ने बताया कि भारत में नौसेना के प्रणेता के तौर पर शिवाजी महाराज की पहचान है। जल मार्ग से होनेवाले आक्रमणों से भारत भूमि को सुरक्षित करने के लिए उन्होंने नौसेना एवं जल दुर्गों का निर्माण कराया। खान्देरी, उन्देरी और कोलाबा के दुर्ग इसके जीवंत प्रमाण हैं।

श्री शिवछत्रपति दुर्ग दर्शन यात्रा में शामिल युवाओं ने 24 से 29 दिसबंर तक उक्त दुर्गों के साथ ही सिंह गढ़, मल्हार गढ़, पुरंदर दुर्ग, रायरेश्वर गढ़, शनिवारवाड़ा एवं लाल महल के दर्शन भी किए। सिंह गढ़ में पहुंचकर युवाओं ने महान योद्धा तानाजी मालुसरे के बलिदान एवं वीरता की कहानी सुनी। वहीं, शनिवारवाड़ा में एक भी युद्ध नहीं हारनेवाले बाजीराव पेशवा की वीरता का परिचय प्राप्त किया। लाल महल में शिवाजी के बचपन के प्रेरक प्रसंग सुने। मल्हार गढ़ हिन्दवी साम्राज्य के तोपखाने एवं आसपास के क्षेत्र में निगरानी का केंद्र था। पाचाड में जाकर शिवाजी महाराज के चरित्र को गढ़नेवाली पुण्यश्लोका माँ जीजाबाई साहब के समाधी स्थल पर नमन किया। यात्रा वडु स्थित छत्रपति शंभूजी महाराज, सासवड में बाजी काका पासलकर और श्रीबाग में सरखेल कान्होजी आंग्रे के समाधी स्थल पर भी पहुँची।

श्री गुरुजी ने बताया कि रायरेश्वर गढ़ वह स्थान है, जहाँ महादेव के सम्मुख मात्र 16 वर्ष की उम्र में 27 अप्रैल 1645 को शिवाजी महाराज ने अपने मित्रों के साथ हिन्दवी स्वराज्य की स्थापना की प्रतिज्ञा की थी। यह स्थान बहुत ही दुर्गम हैं। इसी स्थान पर युवाओं की टोली ने स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण, देशभक्ति एवं अपने कर्तव्यों के निर्वहन की प्रतिज्ञा की। इस पाँच दिवसीय यात्रा में महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा सहित 13 राज्यों के युवा शामिल हुए।

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