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औपनिवेशकता ने हमारा सांस्कृतिक और इतिहास बोध नष्ट किया है – प्रो अभय कुमार दुबे

दिल्ली। औपनिवेशिकता केवल हमारे शरीरों को गुलाम नहीं बनाती है बल्कि हमारे दिमागों को भी गुलाम बनाती है। यूरोपीय साम्राज्यवाद ने भारत और अपने अन्य उपनिवेशों में पहले हथियारों और बाद में स्कूलों के माध्यम से हमें मानसिक गुलाम बनाया है जिसके चलते भले ही आज हम राजनैतिक रूप से स्वतंत्र हो गए लेकिन मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो सके हैं।

सुविख्यात समाज विज्ञानी और लेखक प्रो अभय कुमार दुबे ने उक्त विचार हिन्दू कालेज में आयोजित ‘साहित्य का भारत और जनता का भारत’ विषयक व्याख्यान में व्यक्त किए। प्रो दुबे ने कहा कि हमारा अकादमिक ढांचा पूरी तरह से औपनिवेशिक गुलामी से बंधा हुआ है जिसके बाहर जाने की कल्पना भी हम नहीं कर पाते। उन्होंने तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों के उदाहरण देकर कहा कि भारतीय ज्ञानार्जन की यदि कोई पद्धति इन संस्थानों ने विकसित की थी तो उसे खोजना हमारे लिए आवश्यक है।

प्रो. दुबे ने हिंदी साहित्य सभा, हिंदी विभाग के वार्षिकोत्सव “अभिधा” के अंतर्गत अपने व्याख्यान में भारत में अंग्रेजी व हिंदी भाषा के आपसी तनाव और टकराव पर प्रकाश डालते हुए हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं का अंग्रेजी भाषा में समन्वय स्थापित करने वाले पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि अंग्रेजी को राज्य निर्माण की भाषा तथा देशी भाषाओं को सामाजिक तथा लोकोत्तर कार्यों के स्तंभ आधार में विभाजित किया जाना प्रचलित हो गया। इसका परिणाम है कि अंग्रेजी जहां गंभीर चिंतन और विमर्श की भाषा बन कर हमारे ऊपर काबिज है। वक्तव्य के अंत में हिंदी और देशज भाषाओं को समाज की आधारशिला बताते हुए औपनिवेशिक काल के इतिहास के संदर्भ में सांस्कृतिक पक्षों पर पुनर्विचार की जरूरत बताई। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अंग्रेजी विरोधी आंदोलन व भाषाई राजनीति करने के बजाय हमें सांस्कृतिक विमर्श करना चाहिए।

इससे पहले अभिधा का उद्घाटन दीप प्रज्वलन से हुआ। विभाग के प्रभारी प्रो रामेश्वर राय ने विषय प्रस्तावना रखी जिसमें हिंदी साहित्य की अनेक चर्चित कृतियों के माध्यम से देश के स्वरूप चित्रण को स्पष्ट किया। साहित्य सभा के परामर्शदाता डॉ पल्लव ने स्वागत वक्तव्य दिया। तृतीय वर्ष की छात्रा श्रेष्ठा आर्य ने प्रो.अभय कुमार दुबे का परिचय और सभा के अध्यक्ष कमलकांत उपाध्याय ने धन्यवाद दिया। सत्र का संचालन डॉ धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने किया।

अभिधा के दूसरे सत्र में जानी मानी लेखिका ममता कालिया ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम के अंतर्गत हिन्दू कालेज के युवा पाठकों से रूबरू हुईं। साहित्य की भूमिका पर बात करते हुए ममता कालिया ने एक व्यक्ति के भीतर लेखक बनने की इच्छा पर प्रकाश डालते हुए बताया की भाषा व्यक्ति को जीवित एवं पल्लवित रखने का काम करती है और लेखन कार्य व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार कभी भी कर सकता है। उन्होंने अपने चर्चित उपन्यास ‘दौड़’ की रचना प्रक्रिया पर बात करते हुए कहा कि यह उपन्यास आज की युवा पीढ़ी पर केंद्रित है कैरियर के लिए एक दौड़ में शामिल है। उन्होंने कहा कि आज की इस दौड़ ने बच्चों को साहित्य और जीवन के रस से दूर कर दिया है।

इस दौड़ में बहुत लोग जीवन जीने की कला भूलकर जीवन का गणित सीखने लगते हैं। उन्होंने साहित्य पर भी इस दौड़ के असर को लक्षित करते हुए कहा कि आज की युवा पीढ़ी तुरंत असर और परिणाम देखना चाहती है जो साहित्य में संभव नहीं। प्रेमचंद की रचनाओं का उदाहरण देते हुए कालिया ने कहा कि उनके लिखे जाने के वर्षों बाद अब हम लोग उनका अवास्तविक महत्त्व समझ पा रहे हैं इसका आशय स्पष्ट है कि साहित्य में बाज़ार की तरह तुरंत लाभ-हानि के पैमाने पर मूल्यांकन नहीं हो सकता। प्रश्नोत्तर सत्र में ममता जी ने अपने लेखन और जीवन के प्रसंगों को याद करते हुए अनेक बातें कीं।

एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि ‘कितने शहरों में कितनी बार’ और ‘दिल्ली : शहर दर शहर’ सरीखी रचनाएं अंतत: संस्मरण ही मानी जानी चाहिए क्योंकि इनमें लेखक का अपना व्यक्तित्व शहर के दायरे में आता है मुख्य जोर शहर पर नहीं है। वहीँ अपने मित्र और पति रवींद्र कालिया को याद करते हुए कहा कि उन्होंने मुझमें हमेशा आत्मविश्वास भरा कि मैं बेहतर लिख सकती हों – कर सकती हूँ। निजी जीवन के प्रसंगों को साहित्य से जोड़ने पर उन्होंने कहा कि अंतत: सभी कथाएं जीवन से ही आती हैं यह कथाकार का कौशल पर ही निर्भर करता है कि वह किस तरह उसे कला में रूपांतरित करता है।

द्वितीय वर्ष के छात्र कमल नारायण ने लेखक परिचय और हिंदी साहित्य सभा की उपाध्यक्ष रेनू प्रसाद ने धन्यवाद ज्ञापन किया ।कार्यक्रम का संचालन विभाग के प्राध्यापक नौशाद अली ने किया।

रिया गौतम
द्वितीय वर्ष, हिंदी विभाग
हिंदू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय

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