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प्राचीन जैन मत में जीव विज्ञान के गूढ़ रहस्य

1892 में रशियन वैज्ञानिक डीमीट्री लांवोंस्की ने बीमार तंबाकू के पौधे का रस फिल्टर करके स्वस्थ प्लांट में डाला तो स्वस्थ प्लांट भी बीमार हो गया,तभी से दुनिया को वायरस के बारे में पहली बार पता चला लेकिन….

जैन धर्म में वायरस और बैक्टीरिया के बारे में 2000 साल प्राचीन जीवाभिगम और जीवविचार जैसे कई सूत्रों में वर्णन मिलता है-

1- परमात्मा महावीर के निर्वाण पर सूक्ष्म बैक्टीरिया उत्पन्न होने से साधु-साध्वियों ने अन्न-जल का त्याग कर दिया था।

2- “भद्रबाहुसंहिता” में भी भद्रबाहु स्वामी ने 2000 साल पहले बताया कि महामारी के वक्त संक्रमित व्यक्ति के स्पर्श किए हुए किसी भी वस्तु या लोहे आदि को ना छूए।

3- 17 वे तीर्थंकर कुंथूनाथस्वामी के जन्म के समय कुंथू अथार्त सूक्ष्म जीवो की रक्षा की बात कही गई है।

4-स्त्रिया मासिक धर्म में होती है तब उनके शरीर से निकलने वाली अशुद्धि और पसीने में भी हानिकारक वायरस होते हैं इसीलिए महिलाएं मासिक धर्म के समय क्वारंटीन यानी एकांत में रहती है।

4-मृत शरीर में भी वायरस उत्पन्न होने से मृत शरीर का स्पर्श करने के बाद नहाने और सूतक के नियमों का पालन किया जाता है,जैनधर्म में डेडबोडी का अग्निसंस्कार किया जाता है क्योकि यदि कोरोना जैसे वायरस से ग्रसित मृतशरीर को दफना दिया जाए तो उसके दुष्परिणाम से नए रोग उत्पन्न हो सकते हैं।

5-प्रभु महावीर ने कहा है-“जहा अंधकार होता है वहां जीवो की उत्पत्ति ज्यादा होती है”, इसीलिए सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए जैन धर्म में सूर्यास्त के बाद भोजन निषेध है। और जब सूर्य की किरणों से सूर्योदय के 48 मिनट के बाद जीवों की उत्पत्ति रुक जाती है तब जैन लोग नवकारशी(दिन का पहला अन्न-जल ग्रहण करना) करते हैं।

5-कंदमूल‌ भी जमीन के नीचे अंधेरे में उगने के कारण उसके कण-कण में अनंत जीव होते हैं(जैसे एक बीज=एक जीव, वैसे कंदमूल का एक कण=अनंत जीव) जिसकारण जैनधर्म में कंदमूल खाना निषेध है।

6- सूर्यग्रहण के वक्त भी अन्न-पानी ग्रहण करना निषेध कहा गया है वास्तव में सूर्य ग्रहण के कारण अंधकार होने से सूक्ष्म वायरस आदि जीवो की रक्षा हेतु अन्न-जल का त्याग करने को कहा गया है क्योंकि वायरस भोजन में मिलने पर रोग भी उत्पन्न कर सकते हैं।

7- अनंत तारामंडल में चंद्र की गति के अनुसार विशाखा रोहिणी आदि 27 नक्षत्र को माना गया है,22 जून पर आद्रा नक्षत्र शुरू होने पर मौसम आद्र हो जाता है जिसके कारण आम जैसे गीले फलों में बैक्टीरिया उत्पन्न होने शुरू हो जाते हैं इसलिए जैन लोग 22 जून के बाद आम जैसे फलों का त्याग करते हैं।

8- जैन शास्त्रो अनुसार पानी से ही जीवो की उत्पत्ति होती है इसीलिए जैन धर्म में बासी भोजन का त्याग करने को कहा है, लेकिन वैफर,खाकरा या कोई भी सुखी वस्तु जिसमें पानी का अंश ना हो वह दूसरे दिन भी खाई जा सकती है।

9- जैन शास्त्रों अनुसार दही को जैविक नहीं बल्कि रासायनिक प्रक्रिया से जमाना चाहिए,जिसके लिए नींबू की कुछ बूंदे चांदी,संगमरमर,सुखी लाल मिर्च या सूखे नारियल के टुकड़े पर डालकर हल्के गर्म दूध में मिलाकर जैन रासायनिक विधि से दही जमाया जाना चाहिए।
जैन शास्त्रों में कहा है कि 2 रात के बाद रासायनिक पद्धति से जमाये गये दही में भी जैविक प्रक्रिया शुरू हो जाती है इसलिए 2 रात के बाद का दही खाना जैन धर्म में निषेध हैं।

10-द्विदल- दाल,चने आदि जिनके दाने के दो दल होते हैं वे द्विदल कहलाते हैं, कच्चे दूध,दही में द्विदल का आटा मिक्स किया जाए तो तुरंत ही दो इन्द्रिय वाले जीव उत्पन्न हो जाते हैं। इसीलिए जैन लोग कड़ी बनाते वक्त दही या छाछ को पहले गर्म करते हैं और फिर उसमें बेसन डालते हैं। ताकि जीवोत्पत्ति ना हो।

11- जैन शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य के वात्त,पित्त,मल,मूत्र,थूंक,पसीना वीर्य आदि 48 मिनट में ना सूखे तो उसमें असंख्य समुर्च्छिम सूक्ष्म मनुष्य जीवों की उत्पत्ति होती है।ये अतिसूक्ष्म जीव शुक्राणु की तरह होते हैं, उनके सिर में आंख,कान,नाक, मुंह,स्पर्श पांचो इंद्रियां होती है,मात्र शरीर की जगह पूंछ होती है, इसीलिए जैन साधु इन सूक्ष्म जीवो की रक्षा के लिए स्नान ना करना आदि नियम पालन करते हैं,आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी लैब टेस्ट में यह जैन विज्ञान को 100% सही सिद्ध किया है।

12- जैनशास्त्रों अनुसार शहद,बटर(मक्खन),मांस(meat),शराब ये चारों महाविगई है जिनके प्रत्येक कण में प्रतिपल असंख्य दो इन्द्रिय वाले जीव (जिनके पास शरीर के साथ मात्र भोजन के लिए मुंह है,बाकि आंख,कान,नाक नही है ) ऐसे सूक्ष्म जीवो की उत्पत्ति होती रहती है।
मांसाहार में मात्र एक बडे पंचेन्द्रिय जीव की ही हत्या नहीं होती बल्कि मांस कच्चा हो या पक्का उसमें असंख्य सुक्ष्म दो इंन्द्रिय वाले जीव जिन्हें हम बैक्टीरिया कहते हैं प्रतिपल उत्पन्न होते रहते हैं,मांसभक्षण से उन असंख्य जीवो की भी हत्या होती है।

13- विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार नोनवेज के कारण 159 अलग-अलग प्रकार की बीमारियों का खतरा रहता है। जिनमें heart disease,B.P.,kidney, strock,आदि मुख्य हैं।

14- कोविड जैसे कई वायरस मांसाहार से ही पैदा हुए हैं,E.coli & BSE वायरस बीफ याने कि गाय के मांस से, trichinosis पोर्क याने कि सुअर के मांस से, salmonella चिकन से,scrapie मटन याने कि बकरे के मांस से एसे कई जानलेवा वायरस की उत्पत्ति का कारण मांसाहार खाना ही है।

15- वैज्ञानिकों को यह 1679 में ही पता चला है कि तितली के अंडे पहले कानखजूरे या ईयल की तरह विकसित होते हैं, बाद में उनके पंख आने पर वे तितली बन जाते हैं। लेकिन प्राचीन जैन शास्त्रों में लिखा है कि भ्रमर के डर से उसका ध्यान करते हुए ईयल खुद भ्रमर बन जाती है,जो इस वैज्ञानिक तथ्य को तो सिद्ध करता ही है,साथ ही जैनविज्ञान का साइकोलॉजी अप्रोच को भी सिद्ध करता है।

जैन धर्म में एकिन्द्रिय जीव से लेकर पांच इंन्द्रिय वाले मनुष्य तक के समस्त जीवों की मन,वचन,काया से अहिंसा का पालन करने को कहा गया है।
जैनधर्म अनुसार अहिंसा ही परम धर्म है। जैन धर्म अनुसार आत्मा ही ब्रह्म है।

साभार- https://www.facebook.com/jainnewsindia/ से

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