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घुला रंग कविता का, दिखा ‘मेरा कवि रूप’

साक्षी द्वारा विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों संग कविताओं से सजी संध्या का आयोजन!!

नई दिल्ली। कविता को सामाजिक परिवर्तन और वैचारिक क्रांति का साधन कहा जाता है। हर कलाकार का अपना अंदाज होता है, कुछ जिंदगी के करीब जाकर अपना वकतव्य रखते हैं, कुछ प्रकृति को चुनते हैं, आस-पास का माहौल, घटनाक्रम आदि भी कवियों के रचना-कौशल की अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।

कलाकारों की ऐसी ही रचना-कौशल अभिव्यक्ति देखने को मिली गैर सरकारी संस्थान साक्षी-सिएट द्वारा नई दिल्ली स्थित इंडिया हेबीटेट सेन्टर के अन्तर्गत अमलतास सभागार में आयोजित कार्यक्रम ‘मेरा कवि रूप’ के दौरान, जहां विभिन्न क्षेत्रों की जानी-मानी हस्तियों के कवि रूप को श्रोताओं से रूबरू कराया गया। कार्यक्रम का संचालन प्रख्यात कवि लक्ष्मी शंकर बाजपयी ने किया।

कार्यक्रम की खास बात थी कि कवि रूप दिखाने वाली यह हस्तियां अपने क्षेत्र की माहिर थी परन्तु कवि नहीं, बावजूद इसके जो रचना-कौशल इन्होंने प्रस्तुत किया, बस तालियों, वाह-वाही और क्या बात से सभागार गूंजता दिखायी दिया।

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अपना एक दूसरा यानि कवि के रूप दिखाने हेतु इस कार्यक्रम से जुड़ी हस्तियों में डांस गुरू शोवना नारायण, राज्यसभा सांसद तरूण विजय, जानी मानी नृत्यांगना नलिनि, दिल्ली संगीत घराने के उस्ताद इकबाल अहमद खान, जज संजीव जैन, संगीतविद् पंडित विजय शंकर मिश्रा, गोल्फ कैडी विश्वमित्रा, योग गुरू प्रेम भाटिया, अभिनेत्री व फिल्मकार लवलीन थडानी, मूवी मेकर रमा पाण्डेय, थियेटर जगत की सर्वजीत सर्व, मारवाह स्टूडियो के संदीप मारवाह, प्रख्यात कवि लक्ष्मी शंकर बाजपयी, प्रख्यात पत्रकार व सम्पादक प्रताव सोमवंशी और कवियत्री ममता किरण आदि प्रमुख थे।

कार्यक्रम के दौरान इन कवियों ने अपने ही अंदाज में जीवन की पीड़ा, खुशहाल पल, समाज के विराजित कुरीतियों, सफलता, सकारात्मक रूख, मां, बेटी, गुड़िया, आपसी रिश्तों, प्रकृति, रास-लीला आदि विषयों पर अपनी कवितायें प्रस्तुत की। इन कलाकारों में से एक गोल्फ कैडी विश्वमित्र ने भोजपुरी भाषा में अपनी प्रस्तुति देकर जमकर वाह-वाही लूटी।

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मौके पर साक्षी की अध्यक्ष डॉ. मृदुला सतीश टंडन ने कहा कि हम चाहे किसी भी क्षेत्र में काम करें और अपनी कुशलता साबित करें। लेकिन हर व्यक्ति को हर दिन कुछ लिखने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि तकनीकी स्त्रोतों के चलते हम अपने विचारों को लफ़्ज़ों में अभिव्यक्त करने का हुनर खोते जा रहे हैं। जहां पहले मेल-मिलाप, बात-चीत का दौर होता था, आज मोबाइल व अन्य तकनीकों के चलते सब बदल गया है। जहां पहले खिलखिला के हंसना मुस्कुराना होता था आज उसकी जगह स्माईली ने लेली है। हमें जरूरत है अपने अंदर की सजगता को जगाने की, उसे बाहर निकालने की और रचना-कौशल से अच्छा अंदाज इसके लिए नहीं हो सकता। अगर हम आस पास हो रही व्यवस्थाओं और घटनाओं के बारे में ठीक से ज़िक्र नहीं कर पायेंगे तो उनको बदलने का अवसर कभी नही पायेंगे। भाषा के समुचित उपयोग और भावनाओं व विचारों को व्यक्त करने की विशाल क्षमता ही है जिसके चलते ‘कलम को तलवार से अधिक शक्तिशाली’ होने की संज्ञा दी गयी है। डॉ. टंडन का प्रयास प्रेरणादायक मूल्यांकन वाले अच्छे साहित्य को जनता से परिचित कराते हुए इसकी खूबसूरती को जीवंत करना है।

संदीप मारवाह ने बताया कि किस तरह से जब उन्होंने फिल्म सिटी बनाने की शुरूआत की थी, खुद को स्थापित करने की कोशिश की थी तो न जाने कितनी परेशानियां व मुशकिलें सामने आयी थी लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार आगे बढ़ते रहे। आज फिल्म सिटी का वर्चस्व आपके सामने है।

श्रीमति शोवना नारायण ने कहा, मैं नृत्यांगना हूं, कवियत्री नहीं हूं और अगर लिखती हूं तो उसका कारण कभी मन हो जाता है तो लिख लेती हूं। शायद जिस परिवेश में मैं पली-बढ़ी हूं कहीं न कही उसकी खुश्बू आ जाती है। मेरी मां समाज सेविका थीं, उनके साथ बहुत गांव में जाने का मौका मिला। बस उसी का कुछ समावेश मेरी कविता में है। उन्होंने गांव समावेश के जीवन व कुन्ती पर आधारित कविता प्रस्तुत की।

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