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डॉ. स्वामी की याचिका, मस्जिद इस्लाम का जरुरी हिस्सा नहीं

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की इजाजत का निर्देश देने की मांग करते हुए सोमवार (22 फरवरी) को उच्चतम न्यायालय में एक नयी याचिका दायर की। उस जगह पर विवादित ढांचे को 1992 में ध्वस्त कर दिया गया था। प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष याचिका को पेश किया गया जिसने कहा कि यह विषय पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा, जो मंदिर-मस्जिद विवाद के बारे में अन्य विषयों की पहले से सुनवाई कर रही है।

स्वामी ने दलील दी कि नयी याचिका पर अलग से सुनवाई की जाए लेकिन न्यायमूर्ति यूयू ललित की सदस्यता वाली पीठ ने कहा कि यह इसे अन्य पीठ पर छोड़ रही है जिसके पास अयोध्या विवाद से उपजे विषय हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘यदि संबद्ध पीठ इस पर अलग से विचार करना उपयुक्त मानती है तो यह सुनवाई करेगी। लेकिन यदि पीठ विषय को जोड़ने का फैसला करती है तो यह संबद्ध पीठ के ऊपर निर्भर होगा।’’ स्वामी ने अपनी याचिका में दावा किया है कि इस्लामी देशों में मौजूद परंपरा के तहत सड़क आदि बनाने जैसे सार्वजनिक उद्देश्य के लिए मस्जिद को हटा कर कहीं दूसरी जगह भी ले जाया जा सकता है, जबकि एक बार मंदिर बन जाने पर उसे छुआ तक नहीं जा सकता। उन्होंने कहा, ‘‘जहां तक पवित्रता की बात है तो एक मंदिर और एक मस्जिद को एक समान नहीं माना जा सकता है।

उच्चतम न्यायालय की एक संविधान पीठ के बहुमत वाले फैसले के मुताबिक मस्जिद इस्लाम धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं है जबकि ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स (1991) के मुताबिक मंदिर हमेशा मंदिर ही रहता है, भले ही इसका विध्वंस कर दिया गया हो।’’ स्वामी ने अपनी याचिका में दावा किया है, ‘‘इस तरह मूल सच्चाई यह है कि राम जन्मभूमि पर राम मंदिर किसी मस्जिद की तुलना में कहीं ज्यादा प्रभावी दावा रखता है।’’ उन्होंने विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल पर 30 सितंबर 2010 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का शीघ्र निपटारा करने के लिए निर्देश देने की भी मांग की।

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