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माफिया का हर राज करती है तार-तार किताब मुं’भाई

कराची स्थित घर मोईन पैलेस में बने स्वीमिंग पूल के सामने खड़े दाऊद इब्राहिम के अनदेखे और ताजातरीन फोटो के साथ खोजी पत्रकार – लेखक विवेक अग्रवाल की बहुप्रतीक्षित किताब मुं’भाई आ चुकी है।

दाऊद के इस ताजा फोटो की जानकारी देते हुए विवेक अग्रवाल बताते हैं, “इनमें अंडरवर्ल्ड के इतिहास के सबसे खतरनाक और बड़े डॉन दाऊद इब्राहिम के कराची में सबसे सुरक्षित पनाहगाह और घर के अंदर लिया सबसे ताजातरीन फोटो है, जो किसी खुफिया अथवा जांच एजंसी तक के पास नहीं है।” विवेक अग्रवाल से हमेशा यह पूछा जाता है कि वे माफिया की खबरों का खतरनाक काम क्यों करते हैं तो हमेशा एक ही जवाब आता है कि चुनौतियों के बिना जीवन अधूरा है। यह काम खतरनाक नहीं है, बशर्ते आप अपने काम के प्रति ईमानदार रहें। किसी गिरोह विशेष के खिलाफ लिखना, या किसी गिरोह सरगना विशेष के पक्ष में लिखना, किसी भी पत्रकार की सेहत के लिए खतरनाक हो सकता है। निष्पक्ष लेखन और पत्रकारिता का सम्मान तो मुंबई अंडरवर्ल्ड भी करता है।

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित खोजी पत्रकार विवेक अग्रवाल की बहुप्रतीक्षित किताब मुं’भाई मुंबई के माफिया जगत के ढेरों अनछुए पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं। ये पुस्तकें ऐसे तथ्य उजागर करती हैं, जिनसे दुनिया वाकिफ नहीं है। यह किताब कई अनदेखी तस्वीरों का खुलासा भी करती है जो प्रेस और मीडिया की पहुंच से अब तक दूर रही हैं। इस किताब में मुंबई के कुख्यात माफिया सरगनाओं, उनकी पत्नियों-प्रेमिकाओं, संबंधियों, साथियों, उनके घरों और अड्डों की जानकारियां और फोटो हैं।

वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिती माहेश्वरी कहती हैं, “मुं’भाई किताब आपसे सामने है। उसके बाद मुं’भाई रिटर्न्स भी आ रही है। इन किताबों के जरिए लोग जान पाएंगे कि मुंबई माफिया में गिरोहों की संरचना कैसी है। पुराने माफिया और नए दौर के सरगनाओं में क्या फर्क है। वे दुनिया और देश में कहां-कहां तक जा पहुंचे हैं। रिटायर होने के बाद वे क्या करते हैं। इन किताबों में इसके आगे और भी बहुत कुछ ऐसा है, जो आज तक मुंबी अंडरवर्ल्ड पर प्रकाशित किसी किताब में नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि मुंबई माफिया के इतिहास और उनके कारनामे समेटने का हिंदी में यह सबसे पहला और अदम्य साहसपूर्ण अभियान है।”

मुं’भाई और मुं’भाई रिटर्न्स के लेखन में किस्सागोई की तकनीक में पत्रकारिता का तड़का लगा कर पेश किया है। यह पुस्तक मनोरंजन का मसाला न होकर मुंबई के गिरोहों और उनके तमाम किरदारों का जीवंत और प्रामाणिक दस्तावेज है। पुस्तक के अंत में गिरोहबाजों, प्यादों, खबरियों, सुपारी हत्यारों, खुफिया व पुलिस अधिकारियों तथा मैच फिक्सिंग में प्रचलित शब्दों व मुहावरों का पूरा जखीरा मौजूद है।

माफिया जगत पर प्रकाशित मुं’भाई दरअसल विवेक अग्रवाल की तीन किताबों वाली श्रृंखला की पहली कड़ी है।

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लेखक का संक्षिप्त परिचय

विवेक अग्रवाल पिछले 3 दशकों से भी अधिक समय से अपराध, कानून, सैन्य, आतंकवाद और कर रहे हैं। वे पत्रकारिता के हर आयाम के लिए काम कर रहे हैं। एकीकृत मध्यप्रदेश में सन 1985 में बतौर स्वतंत्र पत्रकार स्थानीय व राष्ट्रीय अखबारों में सक्रिय हुए थे।

पत्रकार – लेखक विवेक अग्रवाल तीन दशकों से अपराध, रक्षा, कानून व न्याय और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर मीडिया के सभी स्वरूपों के लिए रिपोर्टिंग करते आए हैं। उनकी रिपोर्टिंग अपराध से आतंक तक, न्याय से घोटालों तक विस्तार रखती है। मुख्यधारा के अखबारों में विवेक ने 1992 में मुंबई के हमारा महानगर से काम शुरू किया। सन 1993 में वे राष्ट्रीय अखबार जनसत्ता से बतौर अपराध संवादताता जुड़े और मुंबई माफिया पर दर्जनों खोजी रपटें प्रकाशित कीं। एक दशक बाद वे देश के पहले वैचारिक चैनल जनमत से समाचार जगत के नए आयाम में कदम रखा, जो बाद में लाईव इंडिया बना। महाराष्ट्र के सबसे शानदार चैनल मी मराठी की खबरों के प्रमुख रहे। खोजी पत्रकार के रूप में उन्होंने एक जबरदस्त पारी देश के इंडिया टीवी में भी खेली। महाराष्ट्र व गोवा राज्य प्रभारी के रूप में वे न्यूज एक्सप्रेस की आरंभिक टीम का हिस्सा बने। इन चैनलों में भी विवेक ने खूब खोजी खबरें कीं।

मुंबई माफिया और अपराध जगत पर उनकी विशेषज्ञता का लाभ हॉलैंड के मशहूर चैनल ईओ तथा एपिक भी उठा चुके हैं। कुछ समय वे फिल्म एवं टीवी धारावाहिक लेखन को भी समर्पित कर चुके हैं। विवेक अग्रवाल वर्षों से मुंबई माफिया की खोजी रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं। उनके पत्रकारिता कैरियर की कुछ प्रमुख उपलब्धियों में 1993 के मुंबई में हुए 13 बमकांड, 2008 के 26/11 आतंकी हमले, 2010 के पुणे बमकांड की कवरेज तो हैं ही, अनेक माफिया सरगना, मैच फिक्सिंग, सट्टेबाजी, कालाबाजारी, तस्करी, टैक्स चोरी इत्यादि के सनसनीखेज खुलासे शामिल हैं। वे फिलहाल लेखन के साथ डॉक्यूमेंट्री निर्माण और विभिन्न मीडिया संस्थानों से बतौर सलाहकार जुड़े हैं। वे अब अपनी सेवाएं बतौर विशेषज्ञ, चैनल, अखबार, पत्रिका आरंभ करने और उन्हें स्थापित करने के लिए प्रदान कर रहे हैं।

उनके बारे में विस्तार से जानकारी www.vivekink.com पर प्राप्त हो सकती है।

पुस्तक के बारे में

मुं‘भाई’

लेखक – विवेक अग्रवाल

मुंबई माफिया पर कुछ लिखना, वह भी तब, जब बहुत कुछ कहा-सुना-लिखा-पढ़ा जा चुका हो। एक चुनौती है। उससे अधिक चुनौती यह है कि कितना सटीक और सधा हुआ काम आपके हाथ में आता है। कोशिश की है कि एक ऐसी किताब आपके लिए पेश करूं जिसमें मुंबई के स्याह सायों के संसार के ढेरों राज सामने आएं। पत्रकार होना एक बात है, एक पुस्तक की शक्ल में सामग्री पेश करना और बात।

हर दिन जल्दबाजी में लिखे साहित्य याने खबरों की कुछ दिनों तक ही कीमत होती है। आपके लिए सहेज कर रखने वाली एक किताब में वह सब होना चाहिए, जो उसे संग्रहणीय बना सके। देश का सबसे भयावह भूमिगत संसार पूरे विश्व में जा पहुंचा है। ये तो ऐसे यायावर प्रेत हैं, जिनकी पहुंच से कुछ भी अछूता नहीं है।

सुकुर नारायण बखिया, लल्लू जोगी, बाना भाई, हाजी मिर्जा मस्तान, करीम लाला तक तो मामला महज तस्करी का था। वरदराजन मुदलियार ने कच्ची शराब से जुआखानों तक, चकलों से हफ्तावसूली तक, वह सब किया, जिसे एक संगठित अपराधी गिरोह का बीज पड़ने की संज्ञा दे सकते हैं। उसके बाद मन्या सुर्वे, आलमजेब, अमीरजादा, पापा गवली, बाबू रेशिम, दाऊद इब्राहिम, अरुण गवली, सुभाष ठाकुर, बंटी पांडे, हेमंत पुजारी, रवि पुजारी, संतोष शेट्टी, विजय शेट्टी तक न जाने कितने किरदार अंधियाले संसार में आ पहुंचे, जिनके अनगिनत राज कभी फाश न हो सके।

मुं‘भाई’ में आपको मिलेगी इनकी छुपी दुनिया की ढेरों जानकारी। इस रक्तजीवियों के संसार में कुछ ऐसा घटित होता रहा है, जो संभवतः कभी रोशनी में न आया। मुं‘भाई’ में ऐसे अछूते विषय हैं, जिनके बारे में किसी ने सोचा न होगा। इस खूंरेंजी दुनिया के विषयों पर पढ़ना कितना रुचिकर होगा, यह तो आपकी रुची पर ही निर्भर है। मुं‘भाई’ में समाहित किया है, कुछ ऐसा जो संभवतः पहली बार दुनिया के सामने आया है। किसी को यह पता ही नहीं है कि आखिरकार इन आतंकफरोशों के गिरोह की संरचना कैसी है, पुराने और नए वक्त का फर्क क्या है, वे कहां-कहां जा पहुंचे हैं, उनके अड्डे कैसे हैं, रिटायर होने के बाद क्या करते हैं गिरोहबाज… वगैरह-वगैरह… और भी ठेर सारे वगैरह हैं।

इसका लेखन किस्सागोई की तकनीक में पत्रकारिता का तड़का लगा कर पेश किया है। यह पुस्तक मनोरंजन का मसाला न होकर मुंबई के गिरोहों और उनके तमाम किरदारों का दुनिया का जीवंत दस्तावेज है। विश्वास है कि पाठकों को ये जानकारियां आपके लिए अनूठी होंगी। पुस्तक के मुंबई के गिरोहबाजों, प्यादों, खबरियों में प्रचलित शब्दों व मुहावरों का पूरा जखीरा ही सबसे अंत में है।

ये मुं‘भाई’ श्रृंखला की पहली पुस्तक है। इसके साथ की दो और पुस्तकें हैं, जो बस आगे-आगे प्रकाशित होने जा रही हैं। उसके बाद कुछ और पुस्तकें इसी श्रृंखला में पेश करेंगे।

4e9a463e-7bf0-4ede-b092-810bf2fb54d6मुं‘भाई’ रिटर्न्स

लेखक – विवेक अग्रवाल

मुंबई माफिया पर पहली पुस्तक याने इस किताब का पहला खंड मुं‘भाई’, में मुंबई माफिया के बारे में यह बताने और जताने का प्रयास है कि वह कितना खतरनाक, दुरूह, कठिन और अजाना है। मुं‘भाई’ में आतंकफरोशों के ढेरों राज फाश किए हैं। इसका दूसरा खंड मुं‘भाई’ रिटर्न्स भी साथ ही आ रहा है।

खबरों के आगे बढ़ कर तैयार कुछ ऐसी सामग्री परोसने की जिद ने मुं‘भाई’ रिटर्न्स भी साथ ही तैयार करवाया। तीसरे खंड की तैयारी है। वह भी चंद दिनों में आप तक पहुंचाने का प्रयास होगा। आपके संग्रह के लिए कितनी उपयोगी साबित होगी, आप ही बेहतर बता सकेंगे। इन रक्तजीवी प्रेतों के कुछ और अछूते रहस्यों तक पहुंचने की जद्दोजहद में गुंडों के उन छद्म नामों की कहानियां गुंडों की नाम कहानी विषय में सहेजी हैं, जिनसे वे पहचाने जाते हैं। परिवार के दिए नाम अमूमन ऐसे ओझल होते हैं कि किसी को याद ही नहीं रहते।

मुं‘भाई’ रिटर्न्स में आपको मिलेगी ऐसी महिलाओं और बारबालाओं के किस्से, जिन्होंने भूमिगत संसार को अपनी खूबसूरती, चालाकी व क्रूरता से बदल कर रख दिया। इनमें से कुछ देहजीवाएं थीं, कुछ पारिवारिक। किसी न किसी कारण इस खेल का वे भी हिस्सा बन चलीं। मुं‘भाई’ रिटर्न्स में छोटा राजन के देशभक्ति के शंखनाद के साथ बमकांड आरोपियों को गोलियों से उड़ाने के किस्से हैं, तो दाऊद इब्राहिम – छोटा शकील द्वारा शिवसेना नेताओं को चुन-चुन कर रक्तस्नान करवाने के दिल दहलाते किस्से भी हैं।

मुं‘भाई’ रिटर्न्स में गिरोहों के हथियारों की खरीद-फरोख्त, तस्करी से उनके इस्तेमाल तक की पूरी जानकारियां हैं, तो कैसी-कैसी अत्याधुनिक तकनीक और उपकरण वे उपयोग में लाते हैं, उसकी भी तफसील है। पुलिस मुठभेड़ों ने कैसे रक्तपिपासु प्रेतों के तांडव पर रोक लगाई, कैसे मुठभेड़ों ने पुलिस का इतिहास ही बदल दिया, सब कुछ समेटा है मुठभेड़ों का सच विषय के तहत। टाडा जैसे सख्त कानून के चलते माफिया की कैसे कमर टूटी, उसकी आंकड़ों समेत तफसील भी एक हिस्से में है। कैसे ये गुंडे और अपराधी पुलिस की समझ में न आने वाली कूट भाषा गढ़ते हैं, उसका पूरा सिलसिला है। और हां, यह सब समझने के लिए गिरोहबाजों, प्यादों, खबरियों में प्रचलित शब्दों व मुहावरों का पूरा जखीरा अंत में है ही।

ये अंडरवर्ल्ड श्रृंखला की दूसरी किताब है। इसकी तीसरी पुस्तक का इंतजार अधिक दिनों तक नहीं करना होगा, वह भी तैयार है।

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