जब प्राचीन भारतीय आकाश-दर्शन में गणना, ग्रह, नक्षत्र, ग्रहण और धूमकेतु दिखाई देते हैं

भारतीय ज्ञान-परंपरा में ज्योतिष का अर्थ केवल आज प्रचलित जन्मकुंडली या फलित ज्योतिष नहीं था। प्राचीन भारतीय ज्योतिष का एक बड़ा हिस्सा आकाशीय पिंडों, सूर्य-चंद्रमा की गति, नक्षत्रों, ऋतुओं, तिथि, ग्रहण तथा समय-गणना के अध्ययन से संबंधित था। इसी व्यापक परंपरा के संदर्भ में महासलिलम् (Mahāsalilam) का नाम आज विशेष चर्चा में आया है। यह वृद्धगार्गीय ज्योतिष के एक अंश के रूप में प्रस्तुत किया गया है और इसका आलोचनात्मक संपादन तथा अंग्रेजी अनुवाद प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक एवं प्राचीन भारतीय विज्ञान के शोधकर्ता प्रो. आर. एन. अयंगर ने किया है। यह ग्रंथ 2024 में Central Sanskrit University द्वारा प्रकाशित हुआ। अयंगर ने इसे भारत में उपलब्ध 11 पांडुलिपियों के तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर संपादित किया है।

महासलिलम् भारतीय खगोल-विज्ञान के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और अत्यंत रोचक शोध-विषय बनकर सामने आया है।

इसमें हमें ग्रहों की चमक, चंद्र ग्रहण, पूर्णतिथि, नक्षत्र, धूमकेतु/केतु, वर्षा, सौर-चंद्र चक्र, ध्रुव और ब्रह्मांड की उत्पत्ति जैसे अनेक विषय एक साथ दिखाई देते हैं।

इसका सबसे रोचक पक्ष यह है कि यह हमें एक ऐसे काल की कल्पना करने का अवसर देता है जब मनुष्य ने आकाश को केवल देवताओं का निवास न मानकर निरीक्षण करने योग्य प्राकृतिक संसार के रूप में भी देखना शुरू किया था।

महासलिलम् की एक पंक्ति में पूरी शोध-यात्रा को संक्षेप में कहें तो—“आकाश को देखकर समय को समझना और समय को समझकर प्रकृति की व्यवस्था को पहचानना—यही प्राचीन भारतीय ज्योतिष-खगोल परंपरा की मूल जिज्ञासा थी।”

और यदि प्रो. अयंगर की dating आगे के स्वतंत्र अध्ययनों से पुष्ट या संशोधित होती है, तो इसका प्रभाव केवल भारतीय ज्योतिष के इतिहास तक सीमित नहीं रहेगा; यह प्राचीन भारतीय astronomy, calendar science और history of science के अध्ययन में भी महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करेगा।

महासलिलम् क्या है?

“महासलिलम्” संस्कृत के सलिल शब्द से बना है, जिसका सामान्य अर्थ जल है। लेकिन इस ग्रंथ में “सलिल” को केवल भौतिक जल के अर्थ में नहीं लिया गया है। प्रो. अयंगर के अनुसार यहाँ यह सृष्टि की उस आदिम अवस्था की ओर संकेत करता है जिसे पाठ में अन्धं तमः जैसे विचारों से जोड़ा गया है और जिससे आगे सृष्टि तथा आकाशीय पिंडों के उद्भव की कल्पना की जाती है। इस कारण महासलिलम् में ब्रह्मांड-विज्ञान (cosmology) और खगोलीय निरीक्षण (astronomical observation) दोनों के तत्व दिखाई देते हैं।

इस ग्रंथ की एक विशेषता यह है कि इसका बड़ा हिस्सा पद्य में नहीं बल्कि गद्यात्मक प्रश्नोत्तर शैली में है। उपलब्ध विवरण के अनुसार इसमें लगभग सौ प्रश्नों और उनके उत्तर/व्याख्याओं के माध्यम से आकाश तथा प्राकृतिक घटनाओं का वर्णन किया गया है। इसलिए इसे केवल धार्मिक या दार्शनिक पाठ के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा; इसमें प्राकृतिक घटनाओं को समझने और उन्हें संख्यात्मक रूप में व्यक्त करने की कोशिश भी दिखाई देती है।


वृद्धगार्गीय ज्योतिष से संबंध

महासलिलम् को वृद्धगार्गीय ज्योतिष के एक अंग के रूप में प्रस्तुत किया गया है। “गार्ग” नाम भारतीय ज्योतिष और खगोल परंपरा में बहुत प्राचीन है। परंपरा में ऋषि गर्ग को नक्षत्र, ग्रह और खगोलीय संकेतों के अध्ययन से जोड़ा जाता रहा है।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है।

आज हमारे पास जो पांडुलिपियाँ उपलब्ध हैं, वे आवश्यक रूप से उसी समय की लिखित मूल प्रति नहीं हैं जिस काल का दावा पाठ की खगोलीय सामग्री से किया जा रहा है। इसलिए पाठ की वर्तमान पांडुलिपि-तिथि और उसमें संरक्षित खगोलीय परंपरा की संभावित प्राचीनता—दोनों को अलग-अलग देखना चाहिए।

प्रो. अयंगर का अध्ययन इसी समस्या से निपटने के लिए पाठ-समीक्षा और archaeo-astronomical dating का उपयोग करता है।


लगभग 1800–1600 ईसा पूर्व का दावा

महासलिलम् से संबंधित सबसे चर्चित दावा इसकी संभावित प्राचीनता है।

प्रो. अयंगर के अनुसार पाठ में वर्णित खगोलीय स्थितियों को आकाशीय गणना और विषुवों के पूर्वगमन (precession of equinoxes) जैसे खगोलीय सिद्धांतों से मिलाकर देखने पर इसका एक स्तर लगभग 1800–1600 ईसा पूर्व के “मघादि” काल से संबंधित दिखाई देता है। इस काल में ग्रीष्म अयनांत (summer solstice) को मघा नक्षत्र के क्षेत्र से जोड़ा गया है।

यह दावा भारतीय खगोल-विज्ञान के इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रसिद्ध वेदांग ज्योतिष और लगध से भी पहले की खगोलीय परंपरा की संभावना प्रस्तुत करता है।

हालाँकि इसे इस तरह नहीं लिखना चाहिए कि “महासलिलम् की वर्तमान पुस्तक 1800 ईसा पूर्व में लिखी गई थी।” अधिक वैज्ञानिक कथन होगा:

“प्रो. अयंगर ने महासलिलम् में संरक्षित खगोलीय संकेतों के आधार पर इसकी परंपरा/पाठ-स्तर के लिए लगभग 1800–1600 ईसा पूर्व की तिथि प्रस्तावित की है।”

यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।


नक्षत्र : आकाश को देखने की भारतीय पद्धति

महासलिलम् की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसका नक्षत्र-आधारित आकाशीय ढाँचा है।

आधुनिक पश्चिमी खगोल-विज्ञान में हम आकाश को मुख्यतः 12 राशियों, constellations और celestial coordinates के माध्यम से समझते हैं। प्राचीन भारतीय परंपरा में सूर्य, चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंडों की स्थिति को समझने के लिए नक्षत्रों का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण था।

महासलिलम् से संबंधित शोध के अनुसार इसमें आकाश के निरीक्षण की यह नक्षत्र-आधारित परंपरा बहुत प्राचीन रूप में दिखाई देती है। यही कारण है कि इसे भारतीय खगोल-विज्ञान के उस चरण को समझने के लिए उपयोगी माना जा रहा है जो बाद के सिद्धांत-ग्रंथों से पहले का है।


पाँच ग्रहों का वर्णन

महासलिलम् की एक उल्लेखनीय विशेषता है—पाँच ताराग्रहों (tārā-grahas) का वर्णन।

भारतीय परंपरा में सूर्य और चंद्रमा के अतिरिक्त पाँच ऐसे ग्रह दिखाई देते हैं जिन्हें नग्न आंखों से देखा जा सकता है:

बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति और शनि।

आधुनिक खगोल-विज्ञान भी इन पाँचों को naked-eye planets के रूप में पहचानता है।

महासलिलम् से संबंधित अध्ययन में इन ग्रहों की चमक (brightness) के आधार पर पहचान/वर्गीकरण की चर्चा मिलती है। इसका महत्व इसलिए है कि यह केवल ग्रहों के नाम गिनाने के बजाय उनके दृश्य स्वरूप और आकाश में उनकी पहचान पर ध्यान देता है।

यहाँ “brightness” को आधुनिक apparent magnitude की बिल्कुल समान वैज्ञानिक प्रणाली मान लेना उचित नहीं होगा। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि प्राचीन पर्यवेक्षक ग्रहों की दृश्य चमक में अंतर को पहचानते थे।


ग्रहण : छह महीने का चक्र

महासलिलम् में चंद्र ग्रहण के संबंध में छह महीने की अवधि का उल्लेख विशेष ध्यान आकर्षित करता है। आधुनिक खगोल-विज्ञान में भी ग्रहणों की पुनरावृत्ति सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की कक्षाओं तथा eclipse seasons से संबंधित है।

भारतीय परंपरा में ग्रहणों का अध्ययन बहुत पुराना है। महासलिलम् इस परंपरा को एक ऐसे चरण में दिखाने का दावा करता है जहाँ आकाशीय घटनाओं को समय और संख्या के साथ जोड़कर समझने का प्रयास किया जा रहा था।


पूर्णिमा और “पूर्णतिथि”

आज हम पूर्णिमा को चंद्रमा के पूर्ण प्रकाशित दिखाई देने के रूप में समझते हैं। महासलिलम् में “पूर्णतिथि” (pūrṇatithi) की अवधारणा विशेष रूप से चर्चा में आती है।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारतीय कालगणना में तिथि केवल नागरिक तारीख नहीं है। यह सूर्य और चंद्रमा के बीच कोणीय दूरी पर आधारित एक खगोलीय समय-इकाई है।

महासलिलम् पर किए गए अध्ययन में पूर्णिमा के क्षण और तिथि के संबंध पर विशेष ध्यान दिया गया है। यह दर्शाता है कि प्राचीन भारतीय समय-गणना में सूर्य-चंद्र संबंध का कितना महत्व था।


पाँच वर्षीय सौर चक्र और 67 चंद्र चक्र

महासलिलम् का एक अत्यंत रोचक गणितीय पक्ष पाँच वर्षीय सौर चक्र और 67 sidereal lunar cycles के समन्वय से जुड़ा बताया गया है।

यह मूलतः एक कैलेंडर समस्या है।

सौर वर्ष और चंद्र मास की लंबाई समान नहीं होती। यदि चंद्र महीनों को सीधे सौर वर्ष के साथ जोड़ दिया जाए तो कुछ वर्षों में ऋतु और चंद्र मास के बीच अंतर पैदा होने लगता है। इसलिए प्राचीन सभ्यताओं को किसी न किसी प्रकार के lunisolar synchronization की आवश्यकता पड़ती थी।

महासलिलम् में पाँच वर्षीय चक्र और चंद्र चक्र के सामंजस्य का उल्लेख इस बात का संकेत माना जाता है कि उस समय समय-गणना केवल धार्मिक अनुष्ठान की सुविधा के लिए नहीं, बल्कि खगोलीय चक्रों के निरीक्षण और गणना पर भी आधारित थी।


101 धूमकेतु या “केतु”

महासलिलम् से संबंधित सबसे रोमांचक विषयों में से एक है केतुओं/धूमकेतुओं की संख्या और वर्गीकरण।

वृद्धगार्गीय ज्योतिष के एक अन्य हिस्से के अध्ययन में 101 केतु की परंपरा का उल्लेख मिलता है। शोध के अनुसार महासलिलम् में भी 101 केतुओं की संख्या का स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

यहाँ “केतु” को आधुनिक ग्रह Ketu के समान समझना भूल होगी।

प्राचीन संस्कृत खगोलीय साहित्य में धूमकेतु, केतु और आकाश में दिखाई देने वाली असामान्य/क्षणिक घटनाओं की विभिन्न श्रेणियाँ मिलती हैं। इसलिए महासलिलम् का “101 ketus” आधुनिक नवग्रह के केतु से अलग संदर्भ रखता है।

यह संभवतः धूमकेतुओं अथवा अन्य transient celestial phenomena के वर्गीकरण की प्राचीन परंपरा से संबंधित है।


वर्षा का सिद्धांत

महासलिलम् केवल आकाशीय पिंडों तक सीमित नहीं है। इसमें वर्षा के संबंध में भी एक सिद्धांत बताया गया है।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राचीन कृषि समाज के लिए वर्षा केवल मौसम की घटना नहीं थी। कृषि, खाद्य उत्पादन, नदी-जल, पशुपालन और सामाजिक जीवन सभी मानसून और वर्षा पर निर्भर थे।

इसलिए सूर्य, चंद्रमा, बादल और वर्षा के बीच संबंध खोजने का प्रयास प्राचीन भारतीय प्राकृतिक ज्ञान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा होगा। महासलिलम् इसी व्यापक astronomy–meteorology–agriculture संबंध का एक उदाहरण प्रस्तुत करता है।


सूर्य, चंद्रमा और “सोम”

महासलिलम् की सबसे गहरी अवधारणाओं में से एक सोम और रोहिणी से जुड़ी परंपरा है।

प्रो. अयंगर की व्याख्या में सोम को आदिम काल/समय (primal Time) के प्रतीक के रूप में पढ़ने का प्रयास किया गया है, जबकि चंद्रमा को सोम का एक प्रकार का प्रतिनिधि (proxy) माना गया है। इसी संदर्भ में प्रजापति–रोहिणी–सोम कथा को केवल पौराणिक कथा न मानकर खगोलीय अर्थों में पढ़ने का प्रस्ताव किया गया है।

यह व्याख्या अत्यंत रोचक है, लेकिन इसे प्रो. अयंगर की शोध-व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न कि निर्विवाद ऐतिहासिक तथ्य के रूप में।


“108 ग्रह” की रोचक अवधारणा

महासलिलम् से संबंधित आधुनिक व्याख्या में एक और असाधारण संख्या सामने आती है—108।

इस गणना में पाँच ताराग्रह, सूर्य, चंद्रमा, राहु तथा 101 केतु जैसी श्रेणियों को मिलाकर 108 का ढाँचा प्रस्तुत किया जाता है।

आज 108 संख्या भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में माला के 108 दानों, मंत्र-जप और विभिन्न धार्मिक प्रतीकों के कारण प्रसिद्ध है।