कराहल के घने जंगलों से घिरी एक छोटी सी बस्ती में शाम ढल रही थी। पाँच साल के छोटे से 'शिवू' ( काल्पनिक नाम)की आँखों में ढेरों सपने थे, लेकिन वो बाकी बच्चों की तुलना में काफी कमजोर था। जब गाँव के दूसरे बच्चे गोलियाँ खेलते या दौड़ लगाते, शिवू अपनी माँ की गोद में सिर रखकर चुपचाप उन्हें देखता रहता। उसकी माँ कांति अक्सर परेशान रहती, उसकी थाली में सूखी रोटी तो होती थी, पर उस भोजन में वो शक्ति नहीं थी जो शिवू के मुरझाए चेहरे को खिला सके।
एक दिन गाँव में सरगर्मियाँ बढ़ गईं। विवेकानंद शाखा के स्वयंसेवक और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता घर-घर जाकर बच्चों का हाल-चाल ले रहे थे। जब वे कांति के आँगन में पहुँचे और शिवू की जाँच की, तो पता चला कि वह उन 78 बच्चों में से एक था जो कुपोषण और एनीमिया की चपेट में थे। स्वयंसेवकों ने केवल आँकड़े दर्ज नहीं किए, बल्कि समाधान में जुट गये। विवेकानंद शाखा ने तय किया कि वे इन बच्चों को कुपोषित नहीं रहने देंगे।
उन्होंने बच्चों के मां-बाप को समझाया यह कोई बीमारी नहीं जिसकी महँगी दवा दुकान पर मिलेगी ।इसका इलाज हमारी आसपास की प्रकृति में ही छिपा है," एक स्वयंसेवक ने आँगन के कोने में उगे सहजन के पेड़ की ओर इशारा करते हुए कहा। सिर्फ सहजन के उपयोग से ही बच्चे ठीक हो सकते हैं इसके अलावा हरी सब्जियां,भी शरीर के पोषक तत्वों की कमी को पूरा करेंगी।
कांति ने सीखा कि सहजन की पत्तियों और फलियों में कितना पोषण छिपा है। अब रसोई में सार्वजनिक वितरण प्रणाली से मिलने वाला फोर्टिफाइड चावल पकने लगा, जिसमें आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन B12 की ताकत थी। खाने में आयोडीन युक्त वन्या प्लस नमक शामिल किया गया और बच्चों को खाना खाने से पहले हाथ धोने की आदत सिखाई गई।
धीरे-धीरे वक्त बदला। तीन महीने बाद, जब वही स्वयंसेवक दोबारा शिवू के घर पहुँचे, तो उन्हें दरवाज़े पर कोई बीमार बच्चा नहीं मिला। दूर सड़क पर शिवू हाथ में अपनी किताबें लिए गाँव के बच्चों के साथ खिलखिलाते हुए दौड़ लगा रहा था। उसके चेहरे का पीलापन अब एक तरोताज़ा चमक में बदल चुका था।
साभार-https://www.sewagatha.org/ से
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