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अगर गंगा का होगा पुनर्जन्म तो देश को भी मिलेगा नया जीवन

गंगा को स्वच्छ बनाने की रणनीति बेहद आसान और दो वाक्यों में बयां की जा सकती है। एक तो यही कि नदी को मत मारिए। दूसरा यह कि उसमें गंदगी (ठोस एवं तरल) मत बहाइए। इस पवित्र नदी को बचाने की आधिकारिक योजना 'नमामि गंगे' की सफलता सुनिश्चित करने के लिए यह बेहद जरूरी है, जिसके लिए केंद्र ने अगले पांच वर्षों में खर्च के लिए 20,000 करोड़ रुपये का प्रबंध किया है। इसकी एक सकारात्मक बात यही है कि आधिकारिक सूत्रों का दावा है कि उन्होंने 1985 में पेश किए गए गंगा ऐक्शन प्लान में की गई गलतियों से सीखा है।

बुनियादी सबक यही है कि कार्यक्रम तब तक सफल नहीं हो पाएगा, जब तक कि स्थानीय अंशभागियों को इसमें शामिल नहीं किया जाएगा और इसे इस तरह आकार नहीं दिया जाएगा, जिससे उन्हें इससे लाभ दिखे। इसमें हितों को क्रमवार शामिल करने की योजना है, जिसमें नदी के आसपास वाले अंशभागी, स्थानीय संस्थाएं और राज्य सरकारें भी शामिल हैं। एक हद तक कचरा प्रबंधन भी बेहतर होगा लेकिन फिलहाल नदी को गंभीर खतरा ऊपरी हिस्से में पनबिजली परियोजनाओं के लगातार आकार लेने से है, जहां पहले से ही बांध बनने के बाद तकरीबन प्रत्येक 100 किलोमीटर के दायरे में नदी पर बैराज बनाने की हैरान करने वाली अवधारणा पेश की जा रही है। ऐसी परियोजनाएं नदी की राह रोकेंगी और उसमें प्रवाह को बुरी तरह प्रवाह करेंगी, जो नदी में बैठी गाद को साफ करने के लिहाज से बेहद अहम है।

जब गंदगी और विषैली चीजें नदी के प्रवाह के साथ बह जाती हैं तो पारिस्थितिकीय जीवन लौटता है और नदी भी धीरे-धीरे खुद को बेहतर बनाएगी। वास्तव में इसके पक्ष में कई आवाजें उठ चुकी हैं और यहां तक कि कई धार्मिक नेता भी नदी में अविरल प्रवाह को सुनिश्चित करने की मांग कर चुके हैं। इसके साथ यह भी तय है कि नदी में और कचरा नहीं डाला जाएगा। गंगा को बचाना बहुत बड़ी और दुष्कर कवायद है। समस्या कितनी बड़ी है, इसकी भी कोई स्पष्टï समझ नहीं है। गंगा केवल एक नदी ही नहीं है बल्कि उसमें तमाम सहायक नदियां भी मिलती हैं। इसका अपवाह क्षेत्र केवल 2,500 किलोमीटर तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें सहायक नदियों का 25,000 किलोमीटर का क्षेत्र भी समाहित है। अगर गंगा की सहायक नदियां प्रदूषित रहेंगी तो आप उसे कैसे स्वच्छ बना सकते हैं? आप खेती में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों से कैसे मुक्ति दिलाएंगे, जो सहायक नदियों के जरिये गंगा में आकर मिल जाते हैं। अगर आप पांच वर्षों के दौरान परंपरागत कृषि गतिविधियों में बदलाव की कोशिश करते हैं तो इससे सियासी संकट ही उपजेगा। सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण काम यही है कि नदी के ऊपरी हिस्से में अधिक परियोजनाओं पर रोक लगाई जाए, जो उसकी प्रकृति बदलकर उसे नुकसान पहुंचा रही हैं।

साउथ एशियन नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स ऐंड पीपल के हिमांशु ठक्कर ने दो विशेषज्ञ समितियों का हवाला दिया, जिन्होंने सिफारिश की थी कि अलकनंदा-भागीरथी बेसिन में 70 में से 24 परियोजनाओं को बंद किया जाए क्योंकि उससे जलीय और स्थलीय जैव विविधता के लिए खतरा उत्पन्न होगा लेकिन पर्यावरण मंत्रालय उन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखना चाहता। वास्तव में उत्तराखंड में आई आपदा के बाद यह अहम हो जाता है कि पूरी नदी घाटी में सभी मौजूदा, निर्माणाधीन और प्रस्तावित परियोजनाओं पर नए सिरे से विचार किया जाए ताकि गंगा के उद्गम से निकले जल पर पडऩे वाले बुरे प्रभाव को रोका जा सके।

पनबिजली संयंत्रों से निकला पानी नदी की क्षमता में वृद्घि करता है और यहां तक कि ऊपरी इलाकों में भी उसे खतरों के प्रति मजबूत बनाता है। फरक्का बैराज के निर्माण के रूप में गंगा को एक बड़ा झटका लगा है, जो अपने मूल मकसद (कोलकाता बंदरगाह के कायाकल्प) में कामयाब नहीं हो पाया है और उसने किनारे को काटने के साथ ही लवणता बढ़ाकर लोगों के लिए मुश्किलें पैदा की हैं। फिर भी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने एक खतरनाक सुझाव दे दिया कि नदी के प्रत्येक 100 किलोमीटर के पाट पर बैराज बनाया जाएगा।

नदी में प्रवाह को सुनिश्चित करने का एक और महत्त्वपूर्ण तरीका यह है कि तीन जगहों-भीमगोडा, बिजनौर और नरौरा में मौजूद नहरों में पानी की स्थिति पर पुनर्विचार किया जाए, जहां सिंचाई के लिए लगभग पूरा जल ले लिया जाता है। कम से कम इसमें से कुछ पानी तो नदी में छोड़ा जाना चाहिए। स्थापित कृषि तंत्र में पांच वर्षों में सिंचाई के लिए पानी की कटौती राजनीतिक संकट पैदा करेगी। अगर आप नदी को उसके नाम की प्रतिष्ठïा के अनुरूप लाने में सफल होते हैं तो आपको नदी के लिए एक मार्ग भी तय करना होगा, एक बहाव मार्ग को चिह्नित करना होगा, जिसमें वह बहेगी, जिससे वह बाढ़ के पानी और गाद को अपने साथ बहाने में सफल हो। जब यह हो जाएगा तो नदी किनारे गैरकानूनी ढंग से अतिक्रमण अपने आप गायब हो जाएगा। उचित जल प्रवाह को सुनिश्चित करने के बाद अगला पड़ाव यह आता है कि यह तय किया जाए कि नदी में ठोस या तरल कचरा प्रवाहित न किया जाए। अंतिम आकलन के अनुसार तकरीबन 36 बड़े शहर और 764 औद्योगिक इकाइयां अपने सीवर और औद्योगिक विषैला कचरा नदी में डालते हैं। इनमें से 404 इकाइयों का अध्ययन करने वाले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार उनमें से 23 प्रदूषण नियंत्रण नियमों का अनुपालन नहीं करतीं।

गंगा ऐक्शन प्लान में मुख्य जोर सीवर तंत्र का नया ढांचा बनाना और सीवेज संशोधन संयंत्र लगाने पर रहा ताकि तरल गंदगी को साफ करके नदी में डाला जाए। एक जल संसाधन विशेषज्ञ विजय जगन्नाथन कहते हैं इसका नतीजा केवल सिविल इंजीनियरिंग, सार्वजनिक निर्माण विभाग द्वारा शीर्ष स्तर से संचालित योजनाओं के रूप में ही निकला। मगर इसमें आपको लोगों को भी जोडऩे की जरूरत है ताकि अंतिम संस्कारों में अधजले शरीरों को नदी में न डाला जाए। अगर गंगा का पुनर्जन्म हो जाता है तो देश का भी नया जन्म होगा।

 

साभार- बिज़नेस स्टैंडर्डड से

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